यह आवश्यक है कि राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई में बार-बार बदलती तिथियों से उपजे नैराश्य के वातावरण को सकारात्मकता की दिशा में ले जाया जाए। केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में 313 एकड़ छोड़कर शेष 67 एकड़ अविवादित परिसर की वापसी का आवेदन इस दिशा में एक संभावनापूर्ण प्रयास है। दरअसल वह संपूर्ण क्षेत्र पौराणिक-सांस्कृतिक रामदुर्ग का ही एक भाग है, जिसके मध्य में यह विवादित 2.77 एकड़ राम जन्मभूमि परिसर स्थित है।
आगरा और अवध के जिला गजेटियर से स्पष्ट होता है कि अयोध्या के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों के चिह्नीकरण का कार्य वर्ष 1902 में फैजाबाद के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट होबर्ट आईसीएस द्वारा संतों-महंतों के निवेदन पर संपन्न कराया गया था। एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के कार्यक्रम के समापन के बाद आयोजन समिति के पास 1,000 रुपये की धनराशि शेष रही। उस अवशेष धन का सदुपयोग करते हुए होबर्ट ने अयोध्या के लुप्त हो रहे तीर्थों, कुंडों को चिह्नित करते हुए कुल 145 शिलालेख लगवाए।
अयोध्या के इन शिलालेखों एवं धार्मिक स्थलों की वर्तमान स्थिति के संबंध में आचार्य रामदेवदास शास्त्री जी ने अपने पुस्तकाकार शोध कार्य में विस्तार से लिखा है। बहुत से शिलालेख उपलब्ध हैं। कई तो ऐसे परिसरों में हैं, जिन पर कब्जा हो चुका है। कुछ प्रस्तर अपने धार्मिक स्थल सहित अत्यंत दीन-हीन दशा को प्राप्त हो गए हैं। कब्जा करने वालों ने बहुत से शिलालेख गायब भी कर दिए हैं। अयोध्या के इन महत्वपूर्ण स्थलों की चिंता किसी भी स्तर पर कुछ संतों, बैरागियों को छोड़कर कभी की गई हो, ऐसा दृष्टिगत नहीं होता।
अयोध्या का सर्वप्रमुख तीर्थस्थल रामदुर्ग है। इसके नाम पर आज मोहल्ला रामकोट बसा हुआ है। श्रीहनुमानगढ़ी रामदुर्ग का पूर्वी प्रवेश द्वार है। राम जन्मभूमि का आंदोलन स्वतंत्र भारत में 1949 से चल रहा है, किंतु आश्चर्यजनक बात यह है कि रामदुर्ग की पुन: स्थापना की चिंता किसी भी स्तर पर नहीं की गई। कभी यह परिसर एक दुर्भेद्य किले के समान मजबूत प्राचीरों से घिरा रहा था। बताते हैं कि मीर बाकी ने तोपें लगाकर जन्मस्थान मंदिर को ध्वस्त किया था। फिर रामदुर्ग को पूर्णतः तहस-नहस करते हुए इसे सूबे का मुख्यालय बना दिया गया। मुगल और नवाबों के काल में यह परिसर उनके सूबेदारों का कार्यालय व निवास बना रहा। शिलालेखों द्वारा प्रदर्शित 43 स्थल इस रामदुर्ग में ही स्थित हैं। रामदुर्ग भारतीय पौराणिक इतिहास का वह अध्याय है, जो सामान्य परिदृश्य से ओझल रहा है। अयोध्या के स्थानीय जन भी इन शिलालेखों के संबंध में विशेष कुछ नहीं जानते, अन्यथा कलेक्टर होबर्ट द्वारा 1902 में स्थापित किए गए बहुत से शिलालेख आज गायब न होते। अयोध्या की 80 प्रतिशत भूमि नजूल है। नजूल राजकीय भूमि होती है, जिसका अस्थायी स्वामित्व वार्षिक कब्जे द्वारा नियत होता है। रामदुर्ग की भूमि पर नजूल व राजस्व कर्मियों द्वारा मनमाना भौमिक अधिकार दर्ज कर देने की बातें सामने आई हैं। दुर्ग की दक्षिणी भुजा की, जो सुग्रीव किले से लेकर कुबेर नवरत्न टीले तक जाती है, लंबाई लगभग 500-600 मी. होनी चाहिए। इस अनुमान से रामदुर्ग के वर्गाकार परिसर का क्षेत्रफल 100 एकड़ से अधिक होता है। 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण 1993 में केंद्र सरकार द्वारा किया जा चुका है। रामदुर्ग की सीमाओं का सर्वेक्षण कर इसकी सीमा में स्थित धार्मिक मठों को छोड़कर अन्य जो भी अवशेष भूमि है, उनका अधिग्रहण कर इसके पौराणिक पूर्व स्वरूप को फिर से स्थापित करने की दिशा में चला जा सकता है।
वाल्मीकि रामायण, स्कंद पुराण, अयोध्या महात्म्य के आधार पर हेंस बेकर और आचार्य रामदेवदास शास्त्री द्वारा किए गए शोध कार्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि रामदुर्ग एक चौरस, वर्गाकार परिसर रहा है। दुर्ग के ईशान कोण पर वानरवीर मयंद का स्थान, अग्निकोण पर महाराज सुग्रीव का किला, नैऋत्य कोण पर नवरत्न कुबेर जी का स्थल व वायव्य कोण पर वानरवीर शरभ का स्थान है। दुर्ग का मुख्य प्रवेशद्वार पूर्व में हनुमान गढ़ी से है, जिसे राजद्वार कहा जाता था। पश्चिम में दुर्गेश्वर द्वार के रक्षक हैं और उत्तर में विभीषण जी। दक्षिणी द्वार नल-नील के स्थान के मध्य से है। दुर्ग के प्राचीरों पर अंगद, सुषेन, गवाक्ष, शतबली, गंदमादन, जामवंत, द्विविद, मत्गजेंद्र, केसरी, पनस आदि वानर, रीछ व राक्षस वीरों के स्थान हैं। उत्तर दिशा में विभीषण जी के स्थान के साथ ही सरमा का भी स्थान है। सरमा अशोक वाटिका में माता सीता की अंगरक्षिका थीं, जिन्हें रामदुर्ग में अत्यंत सम्मानित स्थान दिया गया है। तात्पर्य यह कि पौराणिक आख्यानों और ग्रंथों के संदर्भों के अतिरिक्त स्थलीय सत्यापन से भी अयोध्या में रामदुर्ग के अस्तित्व पर कभी कोई सवालिया निशान नहीं रहा है।
रामचरितमानस की चौपाई है, रामकाज कीन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम। रामदुर्ग की पुनः स्थापना एक बड़ा सांस्कृतिक रामकाज है। जन्मभूमि के 2.77 एकड़ विवादित क्षेत्र को, जो उसके मध्य में है, यदि छोड़ दें, तो दुर्ग परिसर, दुर्ग की प्राचीरों, प्राचीरों के स्थानों से संबंधित किसी भी प्रकार का कोई विधिक-न्यायिक विवाद किसी न्यायालय में लंबित नहीं है।
दुर्ग की पुनः स्थापना विवाद के समापन की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगा। अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि ही नहीं, उनकी कर्मभूमि भी है। वीरों द्वारा रक्षित यह रामदुर्ग श्रीराम जन्मभूमि ही नहीं, राम का दरबार भी है और भारत की शक्ति व संस्कृति का अपूर्व स्थल भी। यह परिसर आज उजाड़ है। प्राचीरों के आज अवशेष मात्र रह गए हैं। मत्गजेंद्र का यह टीला रामदुर्ग प्राचीर का उत्तरी भाग है। रामदुर्ग की प्राचीरों, किलों का पुनर्निर्माण धर्म संस्कृति के प्रेमियों को इस कार्य से जुड़ने की महत प्रेरणा देगा। रामदुर्ग परिसर की पुनः स्थापना का कार्य भविष्य में जन्मभूमि संबंधी विवाद के समाधान की भूमिका भी स्वतः ही लिख देगा, इसमें संदेह नहीं है।