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मंदिर-मस्जिद से परे

तवलीन सिंह Published by: Raman Singh Updated Sun, 03 Feb 2019 07:23 PM IST
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तवलीन सिंह

मेरी राय में राम मंदिर आने वाले आम चुनावों  में मुद्दा ही न होता, अगर मुस्लिम समाज का नेतृत्व समझदार लोग कर रहे होते। बाबरी मस्जिद जब नहीं रही उस जगह पर, जहां हिंदू मानते हैं कि भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, तो उस मस्जिद को बाबर, या किसी और के नाम पर, क्यों नहीं अयोध्या में कहीं और खड़ा कर दिया जाए? क्या जरूरी है  कि उसका निर्माण दोबारा उसी जगह पर हो, जिस जगह के साथ करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है? जब सुब्रमनियम स्वामी जैसे रामजन्मभूमि आंदोलन के महायोद्धा कहते हैं कि मस्जिद सरयू नदी के उस पार बनवाने में वह स्वयं सहायता करेंगे, तो समस्या ही क्या है?



राम मंदिर बनाने की गुहार पिछले दिनों हिंदू समाज के कई वर्गों से उठी है। कुंभ मेला में साधु-संतों से, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर्वसंघचालक से, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से और टीवी चर्चाओं में भाग लेते हुए ऐसे लोगों से भी, जो अपने आप को गर्व से हिंदू कहते हैं। सो एक बार फिर आने वाले चुनावों में राम मंदिर मुद्दा बन गया है। क्यों न बने, जब दिल्ली में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है अपने बल पर? क्यों न बने, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं राजनीति में आए थे रामजन्मभूमि आंदोलन द्वारा?


दशकों से उलझा हुआ मंदिर-मस्जिद का मुद्दा बहुत पहले सुलझ गया होता, अगर मुस्लिम समाज के नेताओं ने समझदारी से अपना पक्ष रखा होता। शुरू में ही तय कर देते कि रामजन्मभूमि और कृष्णजन्मभूमि को वे हिंदुओं को इस शर्त पर देने को तैयार हैं कि इसके बाद जितनी अन्य मस्जिदें हैं भारत में सब सुरक्षित रहेंगी, तो रामजन्मभूमि का आंदोलन शायद शुरू ही न होता। लेकिन वे अड़े रहे इस बात पर कि एक भी मस्जिद की जगह मंदिर नहीं बनेगा, तो मामला तूल पकड़ता गया। इस मुद्दे पर सेंकी हैं कई राजनीतिज्ञों ने अपनी रोटियां और अदालतों में खूब पैसे बने हैं वकीलों के। कीमत चुकाई है बेगुनाह हिंदुओं और मुसलमानों ने दंगों में अपनी जानें देकर।


बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद विराम लगता इस मंदिर-मस्जिद के झगड़े पर, तो आज शायद अयोध्या में राम मंदिर बन गया होता और सारा झगड़ा समाप्त हो गया होता। ऐसा हुआ नहीं है, तो सबसे ज्यादा दोष राजनीतिज्ञों का है। ईमानदारी से नेतृत्व दिखाया होता, तो इस मुद्दे को लेकर इतना तनाव, इतनी नफरत हिंदुओं और मुसलमानों के बीच न फैली होती। लेकिन ऐसा न करके उन्होंने इस मंदिर-मस्जिद के मुद्दे से जी भर के राजनीतिक लाभ उठाया है।


एक तरफ अगर हिंदुत्ववादी राजनेता हैं, जो ऊंची आवाजों में कहते-फिरते हैं कि जो लोग राम मंदिर का विरोध कर रहे हैं, वे देशद्रोही हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के राजनेता हैं, जो मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए कुछ भी कहने को तैयार हैं। राहुल गांधी इसका प्रतीक बन गए हैं। हिंदुओं को लुभाने के लिए स्वयं को जनेऊधारी ब्राह्मण बताते हैं, तो दूसरी तरफ देवबंद में जाकर मुस्लिम टोपी पहन कर कहते हैं कि उनके पिताजी की हत्या न हुई होती, तो बाबरी मस्जिद को गिराए जाने का सवाल ही न उठता।


हिंदुओं और मुसलमानों के लिए असली मुद्दे बहुत हैं। बेरोजगारी, गरीबी और शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं का गंभीर अभाव, लेकिन इन असली मुद्दों का समाधान आसान नहीं है। सो जब भी चुनाव करीब आते हैं, अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा फिर से भारत की राजनीति में प्रथम स्थान पा लेता है। दोष राजनेताओं का तो है ही, लेकिन विनम्रता से कहना चाहूंगी कि सबसे अधिक दोष उन संस्थाओं और व्यक्तियों का है, जिन्होंने इस मुद्दे को लेकर मुस्लिम समाज का नेतृत्व किया है।

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