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परिदृश्य: यह लोकसभा का सेमीफाइनल नहीं, कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य की पटकथा लिखेंगे चुनावों के नतीजे

नीरजा चौधरी
Updated Tue, 10 Oct 2023 07:44 AM IST

सार

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की बिसात बिछ गई है, जिसके नतीजे निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेंगे, लेकिन इन चुनावों को लोकसभा चुनाव का सेमी फाइनल नहीं कहा जा सकता है। निश्चित रूप से, इन चुनावों के नतीजे कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य की पटकथा लिखेंगे।
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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला


दूसरी बात, भाजपा ने किसी भी राज्य में अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और उसने कलेक्टिव लीडरशिप (सामूहिक नेतृत्व) की बात की है, जबकि कांग्रेस के पास तीन राज्यों-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में क्रमशः कमलनाथ, भूपेश बघेल और अशोक गहलोत जैसे बहुत स्पष्ट और दमदार चेहरे हैं। तेलंगाना में भी केसीआर बहुत दमदार नेता हैं। विडंबना देखिए, कि जो भाजपा राष्ट्रीय चुनाव में विपक्षी दलों की इस बात के लिए आलोचना करती है कि उनके पास मोदी से मुकाबला करने के लिए चेहरा नहीं है, वही विधानसभा चुनाव में सामूहिक नेतृत्व की बात करती है और उसके पास राज्यों में मुकाबले के लिए कोई दमदार चेहरा नहीं है। लेकिन असली बात यह है कि इन चुनावों में लड़ाई मोदी बनाम कमलनाथ, मोदी बनाम बघेल, मोदी बनाम गहलोत, मोदी बनाम केसीआर ही होने वाला है।


तीसरी बात यह है कि इन विधानसभा चुनावों का परिणाम मिला-जुला हो सकता है। फिलहाल मध्य प्रदेश में कांग्रेस आगे नजर आ रही है, क्योंकि शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ मतदाताओं में भारी आक्रोश है और सबसे ज्यादा सत्ता विरोधी रुझान इस बार सभी क्षेत्रों में विधायकों के खिलाफ है। कांग्रेस के प्रति लोगों में यह सहानुभूति भी है कि उसकी सरकार भाजपा ने गिरा दी थी।


छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल की स्थिति बेहतर कही जा सकती है। उन्होंने न केवल पार्टी के अंदरूनी असंतोष को खत्म किया, बल्कि टीएस सिंहदेव को उप मुख्यमंत्री बनाकर सरगुजा संभाग की 14 सीटों पर भी अपनी स्थिति मजबूत बना ली। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में उन्होंने नरवा, गरुवा, घुरवा बाड़ी योजना के जरिये विकास का जो मॉडल पेश किया, उससे लोग खुश हैं। इसमें कई योजनाएं हैं, जो लोगों द्वारा पसंद की गई हैं। सरकार द्वारा गोबर खरीदने की योजना से महिलाओं की जिंदगी पर असर पड़ा है और उनके हाथों में पैसा आया है।


अपनी कद्दावर छवि, ग्रामीण जनता से संपर्क, महिलाओं का भरोसा और संस्कृति से जुड़ाव के साथ-साथ बघेल के पक्ष में एक यह बात भी जाती है कि उनके सामने कोई कद्दावर नेता नहीं है, जो उन्हें चुनौती दे सके। राजस्थान में भी विधायकों के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान है। लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछले वर्षों में जो सामाजिक कल्याण योजनाएं चलाई हैं, उसका असर पड़ा है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के हस्तक्षेप के बाद अब सचिन पायलट भी शांत हो गए हैं। अब सवाल यह है कि क्या इसका उस हद तक फायदा होगा कि सरकार बनाने लायक सीटें निकाली जा सकें। मुझे यह मुश्किल लग रहा है। हालांकि दूसरी तरफ कोई स्पष्ट चेहरा नहीं है।


भाजपा का चेहरा राजस्थान में कौन होगा, इसको लेकर चर्चा तो है, लेकिन वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा का चेहरा तो नहीं ही होंगी। उसी तरह मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान भाजपा का चेहरा नहीं होंगे। इसका संकेत तो भाजपा हाई कमान ने दे ही दिया है। शिवराज चौहान मेहनत कर रहे हैं और उन्हें टिकट भी मिला है, लेकिन भाजपा नेतृत्व उन्हें वहां चेहरा नहीं बना रहा। उसी तरह छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सामने नहीं आए, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। राज्यों में भाजपा के पास लीडरशिप की कमी है, लेकिन कहा जा रहा है कि अंतिम क्षण में ध्रुवीकरण का खेल खेला जाएगा।


पाठकों को याद होगा कि राजस्थान में कन्हैया लाल नामक एक दर्जी की हत्या हुई थी, जिसका हाल में प्रधानमंत्री ने भी अपनी एक सभा में जिक्र करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। उसी दिन से ऐसा लग रहा है कि राजस्थान में अंदर ही अंदर ध्रुवीकरण चल रहा है। अब यह किस हद तक काम करेगा और कई चुनौतियों को पार करने वाले अशोक गहलोत इससे कैसे निपटेंगे, यह देखने वाली बात होगी।
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पांच-छह महीने पहले जब मैं तेलंगाना गई थी, तो लोग बीआरएस बनाम भाजपा की बात कर रहे थे, लेकिन पिछले दिनों तेलंगाना में बीआरएस बनाम कांग्रेस की बातें हो रही थीं। यानी कांग्रेस ने वहां अपनी जमीन मजबूत की है, तो भाजपा चर्चा से बाहर हो गई है। केसीआर के खिलाफ भी सत्ता विरोधी रुझान है, पर क्या कांग्रेस खुद को इतना मजबूत कर पाएगी कि केसीआर को सत्ता से हटा दे, क्योंकि उन्होंने भी सामाजिक कल्याण योजनाएं खूब चलाई हैं, जिन्हें फ्रीबी कहा जाता है और जिसका जिक्र चुनाव आयोग ने भी किया है। मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) की सरकार है, जो एनडीए में शामिल है। लेकिन वहां मुख्य लड़ाई एमएनएफ और कांग्रेस के बीच है, हालांकि एक नई पार्टी जोरम पीपुल्स मूवमेंट का राज्य में प्रवेश हुआ, जो युवाओं को लुभा रहा है।


ऐसे में, देखने वाली बात होगी कि कांग्रेस मिजोरम में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाती है या नहीं। हालांकि मणिपुर की अशांति का मिजोरम के चुनाव पर असर पड़ना लाजिमी है, क्योंकि कुकी जनजाति के बहुत से लोग वहां से भागकर मिजोरम पहुंचे हैं। अब यह देखना भी दिलचस्प होगा कि मणिपुर की घटनाओं का असर इन चुनावों पर कितना पड़ता है।


एक और बात है, विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में शामिल आम आदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पूरे दम-खम के साथ चुनाव लड़ने की बात की है, जो जाहिर है, कांग्रेस के लिए परेशानी पैदा करेगी। इससे ‘इंडिया’ गठबंधन के भविष्य पर भी असर पड़ सकता है।


बहरहाल, विधानसभा चुनावों की बिसात बिछ गई है, जिसके नतीजे निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेंगे, लेकिन इन चुनावों को लोकसभा चुनाव का सेमी फाइनल नहीं कहा जा सकता है। निश्चित रूप से, इन चुनावों के नतीजे कई राजनेताओं के राजनीतिक भविष्य की पटकथा लिखेंगे।

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