भारत का इस बार का प्रदर्शन भले अब तक का सर्वश्रेष्ठ है, पर पदक तालिका में स्थिति अब तक की सर्वश्रेष्ठ नहीं है। एशियाई खेलों की शुरुआत 1951 में दिल्ली से हुई थी। तब भारत पदक तालिका में दूसरे स्थान पर रहा था। हालांकि तब सिर्फ 11 देशों ने भाग लिया था और खेलों की संख्या भी सीमित थी। वर्ष 1962 में जकार्ता में हुए खेलों में भी भारत तीसरे स्थान पर रहा था। पर अब खेलों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है और प्रतिभागी भी बढ़े हैं। हांगझोऊ में ही 45 देशों के खिलाड़ियों ने भाग लिया था।
भारतीय दल की सफलता में इस बार जिन तीन खेलों ने अहम भूमिका निभाई, वे हैं-एथलेटिक्स, निशानेबाजी और तीरंदाजी। इन तीनों खेलों में भारत के 60 पदक आए। इससे लगता है कि हमने यदि कुश्ती व मुक्केबाजी में और बेहतर प्रदर्शन किया होता, तो स्थिति और बेहतर हो सकती थी। इन दोनों खेलों में ओलंपिक पदक विजेता बजरंग पूनिया और दो बार की विश्व चैंपियन निकहत जरीन शामिल थे। पर ऐसा लगता है कि तैयारी के लिए घर में माहौल सुधारने की जरूरत है।
भारत के लिए एक संस्करण में सबसे ज्यादा चार स्वर्ण जीतने का रिकॉर्ड पीटी उषा के नाम दर्ज है। उन्होंने यह प्रदर्शन 1986 के एशियाई खेलों में किया था। इन 37 वर्षों में उनके इस रिकॉर्ड को तो नहीं तोड़ा जा सका, पर उनके आईओए अध्यक्ष रहते भारत अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में जरूर सफल हो गया है। इस बार तीरंदाज ज्योति सुरेखा वेन्नम और ओजस प्रवीन देवताले तीन-तीन स्वर्ण पदक जीतकर ऊषा के करीब जरूर पहुंचे हैं। हालांकि सबसे ज्यादा चार-चार पदक जीतने का गौरव निशानेबाज ऐश्वर्य प्रताप तोमर और ईशा ने हासिल किया।
कुछ भारतीय खिलाड़ियों ने हांगझोऊ में ऐसे प्रदर्शन किए हैं, जिन्हें याद रखा जाएगा। इसमें शटलर सात्विक और चिराग की जोड़ी का बैडमिंटन में पुरुष युगल का स्वर्ण पदक जीतना है। इसी तरह सुतीर्था मुखर्जी और अहिका मुखर्जी का टेबल टेनिस में भारत को कांस्य पदक के रूप में पहला पदक दिलाना तथा भालाफेंक प्रतियोगिता में नीरज चोपड़ा और किशोर जेना के स्वर्ण और रजत पदकों को इसमें शामिल किया जा सकता है। एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतना ओलंपिक से भी ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि एशियाई खेलों में सभी टीमों को दो-दो टीमें उतारने की छूट होती है, जबकि ओलंपिक में किसी देश को दो टीमें उतारने की अनुमति कभी मिलती है, जब वे दोनों टॉप आठ रैंकिंग में शामिल हों। एशियाई खेलों में चीन, जापान, इंडोनेशिया, मलयेशिया और दक्षिण कोरिया की मौजूदगी के कारण पहले ही जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा है।
भारत का खेलों में इस मुकाम तक पहुंचना कोई एक दिन में नहीं हुआ है। वर्ष 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स का भारत में आयोजन होने पर देश में खेल सुविधाओं का विकास हुआ और खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं उपलब्ध कराने के बाद से भारतीय प्रदर्शन सुधरा। करीब दो दशक पहले तक खिलाड़ियों और टीमों को अनुभव के लिए विदेशी दौरे करने या विदेशी कोच लाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
अलबत्ता एशियाई खेलों में हासिल उपलब्धि के आधार पर अगले साल पेरिस में होने वाले ओलंपिक खेलों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि हांगझोऊ में जीते गए 28 स्वर्ण पदकों में से 16 स्वर्ण पदक वाली स्पर्धाओं का ओलंपिक में आयोजन ही नहीं होता। वहीं बाकी 12 स्वर्ण पदक जीतने वालों में से कुछ ही हैं, जो विश्व स्तर पर ठहरते हैं। हां, एक अच्छी बात जरूर है कि देश के लिए सफलता दिलाने वाले तमाम खिलाड़ी युवा हैं, जिन्हें अच्छे ढंग से तैयार कर ओलंपिक में पोडियम तक पहुंचाया जा सकता है।