जो उत्तराखंड यानी उप्र का पर्वतीय इलाके की राजनीति हेमवती नंदन बहुगुणा से प्रभावित रही, उसमें दो ऐसे अवसर आए हैं जहां कांग्रेस के शामियाने को छोड़कर उसे ललकारा गया। दोनो ही बार हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस को छोड़ा था।
और जब वे कांग्रेस को छोड़कर बाहर आए थे तो उन्होंने पहाड़ी जनता को भावना से झकझोरा था कि हिमालय टूट सकता है, लेकिन झुक नहीं सकता। सीधे सीधे वह उस कांग्रेस को चुनौती देकर बाहर निकले थे, जिसकी पार्टी संस्कृति में वह रचे बसे थे। जिससे दूर छिटक कर उनकी राजनीतिक धारा की कल्पना नहीं की जा सकती थी।
लेकिन वे गरजते हुए कांग्रेस से बाहर आए थे। अपनी चुनौतियों के साथ। इससे पहले का वो समय, जब उन्होंने आपात काल के बाद कांग्रेस को छोड़ा था और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई थी। कहना होगा कि दोनों ही बार पहाड़ की जनता ने अपने जननायक का पूरा साथ दिया।
लेकिन इस बार जब उनका बेटा कांग्रेस से बगावती तेवर के साथ है, तो पहाड़ का यही जनमानस राजनीति से छले जाने की ही बात कह रहा है। कांग्रेस से बगावत करने वाले या सिमटे रहने वालों के लिए लोगों में न कोई उत्साह बचा, न कोई उत्सुक्ता।
बहुगुणा परिवार की पहली दो बगावतों से अलग इस बार अगर बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा ने कांग्रेस से अलग होने की बात भले कही हो, लेकिन इसे लेकर पहाड़ों में ठंडी प्रतिक्रिया है। यह हेमवती नंदन बहुगुणा और उनके बेटे की जनमानस पर पैठ के अंतर को साफ करता है। हेमवती नंदन बहुगुणा के लिए पहाड़ के लोगों में गहरा आदर था।
लेकिन विजय अपने डेढ दशक में उत्तराखंड के लोगों से किसी तरह का संवाद नहीं बना सके। उनकी पूरी कार्यशैली केवल राज करने के लिए कोशिशों पर टिकी दिखती है। इसलिए यह तीसरी बगावत में न नगाडा बज रहा है न ढोल।
एक बार फिर बहुगुणा कांग्रेस में वापस लौटे थे
आपातकाल के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा और जगजीवन राम का कांग्रेस को छोडने के बाद उप्र का जनमानस कांग्रेस के विरोध में खड़ा हो गया था। बहुगुणा और जगजीवन राम ने तब कांग्रेस फार डेमोक्रेसी बनाई थी।
और लोकसभा का चुनाव कांग्रेस फार डेमोक्रेसी के तहत ही लड़ा। पहाडों की चारों सीट कांग्रेस फार डेमोक्रेसी को मिली थी। बाद में जब कांग्रेस फार डेमोक्रेसी का जनता पार्टी में विलय होना स्वाभाविक था। हेमवती नंदन बहुगुणा की यह कांग्रेस से यही पहली बगावत थी।
इससे पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि दशकों से कांग्रेसी संस्कृति में पले बढ़े, नेहरूजी को आदर्श मानने वाले बहुगुणा कभी यह घर छोड़कर जाएंगे। इलाहाबाद से ही उनका नाता नहीं था बल्कि वह नेहरू परिवार के साथ गहरे जुड़े थे।
इसके अलावा उनकी राजनीति के तेवर शैली उस राजनीति के ही करीब थी, जिसमें कांग्रेस के उच्च शिखर से निचले कार्यकर्तांओं को दिक्षित किया जाता था। बहुगुणा और जगजीवन राम ने उस घर को छोड़ा था। कांग्रेस के साथ डेमोक्रेसी शब्द जोड़ने का भाव ही यह था कि जिस कांग्रेस में वे अब तक थे, उसमें डेमोक्रेसी नहीं रही।
इसलिए आपातकाल के बाद एक नए दल को बनाने की जरूरत हुई। उस उद्वेग में माहौल ऐसा था कि जनसंघ को भी जोड़कर जिस जनता पार्टी को बनाया गया उसमें तमाम उलझने वाले सवाल पीछे छूट गए थे।
केवल दक्षिण के कुछ इलाकों को छोड़ कर पूरे भारत में कांग्रेस खासकर इंदिरा गांधी को एक सबक देने की तैयारी थी। गाय बछिया का चिन्ह हलधर किसान से हार गया था। हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ वामपंथी धारा और पार्टियां अपना स्वाभाविक रिश्ता रखती थी। साथ ही मुस्लिम बिरादरी में वह स्वीकार्य़ नेता थे। आगे अलग इतिहास है कि किस तरह 18 महीने में ही जनता पार्टी बिखर गई। एक बार फिर बहुगुणा कांग्रेस में वापस लौटे ।
दोनों बगावतों में पहाड़ी जनमानस उनके साथ था
बहगुणा वापस कांग्रेस में लौटे और कहा गया कि भांजे (संजय गांधी ) ने मामा को मना लिया। लेकिन बहुगुणा की दूसरी बगावत के लिए कुछ दिन बाकी थे। बहुगुणा कांग्रेस में तो लौटे लेकिन इंदिराजी के मंत्रिमंडल में प्रणव मुखर्जी, बसंत साठे, शिवशंकर शंकरानंद, बूटा सिंह आदि के नाम लिए जा रहे थे, वहां हमेवती नंदन बहुगुणा का नाम शामिल नहीं था। उन्हें कहने के लिए महासचिव बनाया गया लेकिन कार्यालय को महज दिखावटी रह गया।
हेमवती नंदन बहुगुणा ने यह स्थिति स्वीकार नहीं की। और हिमालयी संवेदना जगाते नारों के साथ फिर कांग्रेस को छोड़ा । लेकिन इस बार तुरुप के पत्ते की तरह उस लोकसभा सीट को भी त्याग दिया, जिससे वह सांसद बने। उसी सीट पर जब उपचुनाव हुआ तो वह ऐतिहासिक चुनाव कहलाया। कांग्रेस ने अपने सात मुख्यमंत्रियों को यहां चुनाव प्रचार के लिए भेजा था। स्वयं इंदिराजी ने यहां तावड़तोड़ तीन चार सभाएं की थी।
14 जून 1980 को मतदान नहीं हो सका था। बहुगुणा ने चुनाव आयु्क्त श्या लाल शकधर से शिकायत की थी कि बूथ लूटे गए हैं। बाद में जब चुनाव हुए तो बहुगुणा ने चंद्रमोहन सिंह नेगी को हराया था। हेमवती नंदन बहुगुणा इसके बाद कांग्रेस में गए। चार साल बाद जब वे इलाहवाद से चुनाव लड़े तो कांग्रेस ने उनके खिलाफ अमिताभ बच्चन को लड़ाया था।
हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस में रहे हों या उससे बाहर वे पहाड के जनमानस में उनके लिए निष्ठा का भाव था। वह जब कभी इन पहाड़ी क्षेत्रों के दौरे में आते थे तो राजनीतिक विरोधी भी डाकबंगलों में उनसे मिलने आया करते थे। पहाड़ों की हर छोटी बड़ी बातें उनकी जानकारी में रहती थी। इसलिए उनकी दोनों बगावतों में पहाड़ी जनमानस उनके साथ खड़ा हुआ था।
विजय बहुगुणा की बगावत तीसरी बगावत
बहुगुणा परिवार की तीसरी बगावत इस बार होली के करीब एक हफ्ते पहले हुई है। कसमसाहट तो बहुत दिन से थी। विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद कांग्रेस में कई बातों की मांग कर रहे थे। कहा जाता है कि वह अपने तीन खास लोगों को मंत्री पद दिलाना चाहते थे। उनकी कोशिश राज्यसभा में जाने की भी रही। लेकिन कांग्रेस ने राज बब्बर को टिकट दिया। हालांकि इससे पहले उनकी बातें हाइकमान पूरी करता रहा।
यहां तक कि पुराने अनुभवी तजुर्बेकार नेताओं को नजरअंदाज कर उनके बेटे साकेत को लोकसभा का टिकट दिया गया था। लेकिन बदले हालात में सत्ता पर अकुंश मुख्यमंत्री हरीश रावत का है। और इन परिस्थितियों में दिल्ली का हाईकमान भी इस स्थिति में नहीं कि हरीश रावत की इच्छाओं के ज्यादा विपरीत चलता।
विजय बहुगुणा ने लगातार कोशिश की कि वे भले सत्ता में नहीं हो लेकिन पहाड़ों की राजनीति में उनका वर्चस्व बना रहे। जोड़तोड उठापटक का दौर यहां तक चला कि विजय बहुगुणा बगावत के लिए तैयार हुए।
यह अलग बात है कि इस बागवत का मुख्य सूत्र कहां है। सियासी जानकार कहते हैं कि सतपाल महाराज ने जिस रोज कांग्रेस छोडी उसी दिन से इस थियेटर की कहानी बुननी शुरू हो गई थी। कुछ कयास है कि राज्य के मंत्री हरक सिंह अपने को इन हालातों में कमजोर पा रहे थे। वह कुछ खास विभाग चाहते थे,। कारण जो भी हों विजय बहुगुणा की बगावत तीसरी बगावत है।
विजय बहुगुणा ने अपने पारिवारिक पुराने संबंधों का जमकर फायदा उठाया। उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा को पहाड़ों का जितना ज्ञान था, जितनी समझ थी, विजय और उनके बेटे साकेत में उतना ही अभाव। पहाड़ की जनता ने पाया था कि वह उत्तराखंड के पहाड़ी भाषा में एक संवाद भी नहीं कर पाते हैं।
यही नहीं एचएन बहुगुणा में विभिन्न जातियों, क्षेत्र और धर्म के लोगों को जोड़ने का जो कौशल था, जिस तरह वह सबसे संवाद बना लेते थे, घटनाओं पर जिस तरह संवेदनशीलता दिखाते थे, उसकी दूर दूर तक कोई कल्पना विजय बहुगुणा से नहीं हो सकती थी।
विजय बहुगुणा की राजनीति बहुत सपाट रही है। लोगो से उनका का कोई संवाद नहीं रहता। बेशक वह बहुगुणा परिवार के हों लेकिन आम लोगों के बीच वह एक रूखे नेता रहे जो बात बात पर अप्रिय संवाद बोल देते हैं। यही नहीं अपने पिता की तरह उन्होंने मैदानी क्षेत्र में भी लोगों को साथ लेने की ठोस कवायद नहीं की।
उन्हें पारिवारिक परंपरा में राजनीति ने बहुत कुछ दे दिया। इस राज्य का मुख्यमंत्री तक बनाया। वह सांसद भी रहे। उन्हें हमेशा यही लगता रहा कि बहुगुणा के बेटे होने के नाते उन्हें हमेशा कुछ न कुछ पाने का विशिष्ट हक है।
इसलिए उन्हें टिहरी के क्षेत्र से एकदम अंजान साकेत को लोकसभा चुनाव लड़ाने में संकोच नहीं हुआ। विजय बहुगुणा ने अपने पिता के नाम के प्रभाव का फायदा तो उठाया लेकिन राजनीति की वो आंच महसूस नहीं की जिसमें तपकर एच एन बहुगुणा राष्ट्रीय नेता बने।
हालांकि विजय बहुगुणा में इच्छाशक्ति और पिता की तरह योग्य नेता बनने की चाह होती तो उनके लिए अच्छे अवसर थे। ऊंचा राजनीतिक संपर्क था, वह लोगों से जुड़कर पिता के पदचिन्हों पर चल सकते थे। उत्तराखंड में वह पहाड़ और मैदान के जनमानस के बीच उभर सकते थे।
लेकिन कहीं न कहीं उनके दिमाग में यही था कि टिकट दिल्ली से मिलते हैं और चुनाव प्रबंधन चुनाव जिताता है। और पिता की विरासत का उनके पास एक ढर्रा है। इसलिए उत्तराखंड की राजनीति ही उनका विषय रहा, उत्तराखंड के जीवन को समझने के लिए उन्होंने कोशिश नहीं की। न जरूरत समझी।
विजय बहुगुणा की बगावत का पहाडों में नहीं है कोई शोर
इसलिए जहां एच एन बहुगुणा की कांग्रेस से बगावत के समय पहाड़ों में हूंकार मच गई थी, युवाओं की टोलियां घर घर से प्रचार के लिए निकली थी, उसके बजाय इस बार विजय बहुगुणा के बगावती स्वरों पर बीस पच्चीस तैयार किए हुए लड़के नारे लगाते हुए नजर आते हैं।
बेशक कांग्रेस की राजनीति में कुछ नेता वर्तमान सरकार और संगठन से नाराज हो सकते हैं। छोटे प्रदेशों में नाराजगी दो विधायकों के नाराज होने पर भी ज्यादा दिखने लगती है। लेकिन स्वीकार्यता के स्वर विजय बहुगुणा के लिए भी नहीं है।
वह यहां की राजनीति में केवल तीन चार विधायकों को ही साध पाए हैं। इसलिए अगर डा हरक सिंह और छह दूसरे विधायक बगावती तेवर के साथ है , तो यह विजय बहुगुणा का करिश्मा नहीं, बल्कि इनकी अपनी रणनीतिय़ां है। विजय बहुगुणा और इनका मिलना महज राजनीतिक संयोग है।
यह राजनीतिक स्तर और सोच का फर्क है। हेमवती नंदन बहुगुणा ने जब कांग्रेस छोड़ी तो यह कहने वाले कम थे कि उन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कांग्रेस को छोड़ा है। बेशक उनके राजनीतिक हित रहे हों। लेकिन उसकी आंच अलग थी। आपातकाल की परिस्थितियां और दूसरी बार कांग्रेस के उच्च स्तर पर उनका अपमान को उप्र के पर्वतीय क्षेत्र ने अपनी संवेदना से जोड कर देखा। एचएन बहुगुणा को साथ मिला था।
लेकिन विजय बहुगुणा इस बार कांग्रेस से अलग हो रहे हैं तो इसे कोई संवेदना से जोड़ कर नहीं देख रहा। इसे कोई स्वीकार नहीं कर रहा कि विजय बहुगुणा के साथ कुछ गलत हुआ है। बल्कि पहाड़ों में कहा जाता है कि भाग्य ने और राजनीति ने विजय बहुगुणा को इतना दिया जिसके वह हकदार नहीं थे। आज भी जब केदारनाथ में गांव के गांव डूब गए। घर बर्बाद हुए, तब विजय बहुगुणा को देहरादून में मिला किले नुमा आवास कई लोगों को चुभता है।
उत्तराखंड इस स्थिति में नहीं है कि अपने हर पूर्व मुख्यमंत्री को ऐसे भव्य आलीशान महल हमेशा के लिए रहने के लिए दे। बहुगुणा परिवार की तीसरी बगावत को बजाय संवेदना के घोर स्वार्थ, तिकड़मबाजी, और कलाबाजी के रूप में देखा जा रहा है।