राजनीति और समाज की परख कहीं से भी की जा सकती है। दिल्ली के नेहरू प्लेस में जब बिजली नहीं आ रही हो और चारों ओर फेरी वालों और डीजल के पुराने जेनरेटरों का शोर पसरा हुआ हो। ऐसे में, ऊनी जुराबें बेचते एक ऊर्जावान युवक को देखकर साफ महसूस होता है कि हाल ही में शहर की राजनीति ने जो करवट ली है, उससे आम आदमी उत्साहित क्यों है।
बमुश्किल उम्र के तीसरे दशक में पहुंच रहा यह युवक बताता है कि जिंदगी में पहली बार उसने टेलीविजन पर समाचार देखना शुरू किया है। वह कहता है, 'पहले मुझे कोई परवाह नहीं थी कि कौन मुख्यमंत्री बन रहा है, क्योंकि मैं जानता था कि इससे मुझ जैसों की जिंदगी पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन अब हालात बदल गए हैं।
अब मैं जल्द से जल्द अपना काम खत्म करके घर पहुंचना चाहता हूं ताकि समाचार देख सकूं। इससे मुझे उन तमाम तरीकों की जानकारी मिलती है, जिससे मुझ जैसे आम आदमी को धोखे में रखा जा सकता है।' हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार दिल्ली में अपना कार्यकाल पूरा कर पाती है या वह अपने वायदों को पूरा कर पाती है या नहीं, लेकिन यह तय है कि दिल्ली और भारत की राजनीति में आप के उदय ने उन तमाम लोगों को जागरूक बनाया है, जो अब तक खुद को राजनीतिक प्रक्रिया से कटा हुआ महसूस कर रहे थे।
दिल्ली के इस युवा जुराब विक्रेता जैसे तमाम लोगों के मन में सवाल पहले भी उठते थे, लेकिन तब कोई ऐसा व्यवस्थित मंच उपलब्ध नहीं था, जहां वे अपनी शिकायतों को सार्वजनिक कर सकते। राजधानी दिल्ली में हुए इस बदलाव का श्रेय आप के कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों को मिलना चाहिए, जिन्होंने दिल्ली के समृद्ध और पिछड़े इलाकों में सघन जागरूकता अभियान चलाए।
इसी वजह से आज यह जुराब विक्रेता पानी और बिजली के बढ़े हुए बिलों को लेकर न केवल ज्यादा जागरूक बना है, बल्कि जब मूलभूत नागरिक सुविधाओं के लिए पैसे की कमी का हवाला दिया जाता है, तो वह सवाल भी उठाता है। दिल्ली के नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जरिये यही आम आदमी पूछता है कि शहर के कुछ हिस्सों के बार-बार सौंदर्यीकरण के लिए जब पैसे की कोई कमी नहीं है, तो उसी शहर के दूसरे हिस्सों में रह रहे तमाम लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने की राह में पैसा कैसे रोड़ा बन सकता है।
जुराब विक्रेता जैसे लोग अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ भले ही न हों, लेकिन उनके मन में यह सवाल जरूर है कि आखिर किस वजह से पानी के दाम और निजी बिजली कंपनियों का ऑडिट जैसे मुद्दे टेलीविजन पर बहस का केंद्र बने हुए हैं। दूसरी ओर यह जानना भी दिलचस्प है कि दिल्ली की राजनीति में आए इस बदलाव का पूरे देश पर क्या असर होगा। तकरीबन साढ़े बहत्तर करोड़ मतदाता 2014 में अपने वोट का उपयोग करने को तैयार हैं।
लेकिन निश्चित तौर पर इनकी प्राथमिकताएं दिल्ली के मतदाताओं से अलग होंगी। दिल्ली, भारत नहीं है। यहां के वोटिंग पैटर्न में जाति और धर्म का वैसा प्रभाव नहीं दिखता, जैसा कि देश के दूसरे हिस्सों में है। इसके अलावा, यहां से अगली लोकसभा के लिए 543 में से केवल 7 सदस्य ही चुने जाएंगे। लेकिन देखना यह है कि क्या दिल्ली पूरे देश में बदलाव की प्रेरक बनेगी।
इसमें संदेह नहीं कि अगर हाथ खाली हों तो कल्याण अर्थशास्त्र और राजनीति किसी काम की नहीं होगी। लेकिन अब ऐसे नागरिक वर्ग का उदय हो चुका है, जो सरकारी खर्चे के तरीकों में पहले से ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा है। इसके अलावा, सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं पर होने वाली बहस अब केवल बौद्धिक परिचर्चा का विषय नहीं रह गई है। अब यह आम लोगों की रुचि का विषय बन गई है। अब लोग जानना चाहते हैं कि जो कर वह देते हैं, वह किस तरह पूरे समाज की बेहतरी के लिए खर्च होता है।
क्या पानी की न्यूनतम उपलब्धता हर नागरिक का मूलभूत अधिकार होना चाहिए लोगों ने ऐसे सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी ऐसे ही सवाल उठाए जाएंगे। यह वे बुनियादी प्रश्न हैं जो भारत के भविष्य को नया आकार देंगे।
लेकिन अगर दिल्ली में आप की सरकार उन मूल्यों और सिद्धांतों पर बरकरार नहीं रह पाती है, जिनको लेकर वह लोगों का मन जीत पाई है, तो उसे इसके नतीजे भी भुगतने पड़ेंगे।
आगामी लोकसभा चुनावों के नतीजे कुछ भी हों, लेकिन कुल मिलाकर अपने सवाल और मांगें करने वाले नागरिक वर्ग का उदय, भारतीय राजनीति के भविष्य के लिए शुभ संकेत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले महीनों में इसका सकारात्मक असर देश के दूसरे हिस्सों में भी दिखेगा।