कश्मीर के भारत में विलय के दो दिन बाद 28 अक्तूबर, 1947 को शाम साढ़े आठ बजे पंडित जवाहरलाल नेहरू की ऑल इंडिया रेडियो पर की गई जनमत संग्रह की घोषणा से हमारी आज की कश्मीर समस्या प्रारंभ होती है। सरदार पटेल ने अपने सचिव वी. शंकर को दौड़ाया भी, लेकिन तब तक प्रसारण हो चुका था। नेहरू दरअसल कश्मीर के माध्यम से जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को पटखनी देना चाहते थे।
नेहरू ने सोचा कि जब शेख अब्दुल्ला जैसा लोकप्रिय नेता हमारे साथ है, तो जनमत संग्रह में समस्या कहां से आएगी? शेख के दम पर नेहरू को जनमत संग्रह के पक्ष में होने का भरोसा था, फिर वह इस पर मुहर लगवाने एक जनवरी, 1948 को हमलावरों के विरुद्ध प्रतिवेदन संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए। लेकिन शेख अब्दुल्ला का दोहरा चरित्र तब स्पष्ट हो गया, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सदस्य होने के बावजूद उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि आस्टिन से कश्मीर की स्वतंत्रता के संबंध में अमेरिकी सहयोग की मांग कर डाली।