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अनुच्छेद 370 का खात्मा करना गॉर्डियन नॉट जैसा समाधान

आर विक्रम सिंह
Updated Sun, 03 Nov 2019 12:29 AM IST
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Article 370

कश्मीर के भारत में विलय के दो दिन बाद 28 अक्तूबर, 1947 को शाम साढ़े आठ बजे पंडित जवाहरलाल नेहरू की ऑल इंडिया रेडियो पर की गई जनमत संग्रह की घोषणा से हमारी आज की कश्मीर समस्या प्रारंभ होती है। सरदार पटेल ने अपने सचिव वी. शंकर को दौड़ाया भी, लेकिन तब तक प्रसारण हो चुका था। नेहरू दरअसल कश्मीर के माध्यम से जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को पटखनी देना चाहते थे।

नेहरू ने सोचा कि जब शेख अब्दुल्ला जैसा लोकप्रिय नेता हमारे साथ है, तो जनमत संग्रह में समस्या कहां से आएगी? शेख के दम पर नेहरू को जनमत संग्रह के पक्ष में होने का भरोसा था, फिर वह इस पर मुहर लगवाने एक जनवरी, 1948 को हमलावरों के विरुद्ध प्रतिवेदन संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए। लेकिन शेख अब्दुल्ला का दोहरा चरित्र तब स्पष्ट हो गया, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सदस्य होने के बावजूद उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि आस्टिन से कश्मीर की स्वतंत्रता के संबंध में अमेरिकी सहयोग की मांग कर डाली।



जूनागढ़ के नवाब मोहम्मद महावत खान ने 15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान में जूनागढ़ के विलय का प्रस्ताव किया था। 80 प्रतिशत हिंदू आबादी का जूनागढ़ तीन ओर से भारत से घिरा है। नवाब का विरोध बढ़ा, फिर 24 अक्तूबर, 1947 को नवाब अपने दीवान, परिवार, धन-संपदा जहाज में लादकर पाकिस्तान भाग खड़े हुए।

अब जनमत संग्रह का कोई औचित्य नहीं बनता था। फिर भी 20 फरवरी, 1948 को जनमत संग्रह कराया गया। यह जनमत संग्रह कश्मीर के लिए एक नजीर बन जाता है। सुरक्षा परिषद में पाकिस्तानी प्रतिनिधि द्वारा इसकी चर्चा जोर-शोर से की जाती है। जनमत संग्रह के नागपाश में बुरी तरह बंधे हुए नेहरू को शेख अब्दुल्ला ही राजनीतिक तारणहार लगते हैं।

उनके दबाव में जम्मू एवं कश्मीर के लिए अलग संविधान की मांग मानी जाती है, फिर अनुच्छेद 306 ए (370) बिना चर्चा के सम्मिलित कर लिया जाता है। फिर एक जनवरी, 1949 को युद्धविराम के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के पयर्वेक्षण में जनमत संग्रह के निर्देश निर्गत किए जाते हैं।

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Article 370
कश्मीर के भारत में विलय के दो दिन बाद 28 अक्तूबर, 1947 को शाम साढ़े आठ बजे पंडित जवाहरलाल नेहरू की ऑल इंडिया रेडियो पर की गई जनमत संग्रह की घोषणा से हमारी आज की कश्मीर समस्या प्रारंभ होती है। सरदार पटेल ने अपने सचिव वी. शंकर को दौड़ाया भी, लेकिन तब तक प्रसारण हो चुका था। नेहरू दरअसल कश्मीर के माध्यम से जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को पटखनी देना चाहते थे।

नेहरू ने सोचा कि जब शेख अब्दुल्ला जैसा लोकप्रिय नेता हमारे साथ है, तो जनमत संग्रह में समस्या कहां से आएगी? शेख के दम पर नेहरू को जनमत संग्रह के पक्ष में होने का भरोसा था, फिर वह इस पर मुहर लगवाने एक जनवरी, 1948 को हमलावरों के विरुद्ध प्रतिवेदन संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए। लेकिन शेख अब्दुल्ला का दोहरा चरित्र तब स्पष्ट हो गया, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सदस्य होने के बावजूद उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि आस्टिन से कश्मीर की स्वतंत्रता के संबंध में अमेरिकी सहयोग की मांग कर डाली।

जूनागढ़ के नवाब मोहम्मद महावत खान ने 15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान में जूनागढ़ के विलय का प्रस्ताव किया था। 80 प्रतिशत हिंदू आबादी का जूनागढ़ तीन ओर से भारत से घिरा है। नवाब का विरोध बढ़ा, फिर 24 अक्तूबर, 1947 को नवाब अपने दीवान, परिवार, धन-संपदा जहाज में लादकर पाकिस्तान भाग खड़े हुए।

अब जनमत संग्रह का कोई औचित्य नहीं बनता था। फिर भी 20 फरवरी, 1948 को जनमत संग्रह कराया गया। यह जनमत संग्रह कश्मीर के लिए एक नजीर बन जाता है। सुरक्षा परिषद में पाकिस्तानी प्रतिनिधि द्वारा इसकी चर्चा जोर-शोर से की जाती है। जनमत संग्रह के नागपाश में बुरी तरह बंधे हुए नेहरू को शेख अब्दुल्ला ही राजनीतिक तारणहार लगते हैं।

उनके दबाव में जम्मू एवं कश्मीर के लिए अलग संविधान की मांग मानी जाती है, फिर अनुच्छेद 306 ए (370) बिना चर्चा के सम्मिलित कर लिया जाता है। फिर एक जनवरी, 1949 को युद्धविराम के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के पयर्वेक्षण में जनमत संग्रह के निर्देश निर्गत किए जाते हैं।

महाराजा के भारत में विलय के निर्णय को नेहरू ने स्वीकार नहीं किया

सवाल यह है कि सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान को हमलावर मानते हुए उसे 22 अक्तूबर, 1947 के कबायली आक्रमण के बाद कब्जा किए गए कश्मीरी हिस्से को खाली करने का निर्देश क्यों नहीं दिया? आश्चर्यजनक है कि अनुच्छेद 35 के तहत प्रेषित प्रतिवेदन में सिर्फ यह कहा गया कि वे हमलावरों का सहयोग करना बंद कर दें, अन्यथा दोनों देशों में युद्ध की स्थितियां बन जाएंगी।

जो युद्ध 26 अक्तूबर, 1947 से चल रहा था, शहादतें हो रही थीं, वह जैसे कोई युद्ध था ही नहीं। प्रस्ताव के छठे पैरा में कहा गया है कि भारत जम्मू-कश्मीर राज्य की मजबूरियों का फायदा नहीं उठा रहा है, अतः हमलावरों से जब राज्य खाली हो जाएगा, तो आम जनता जनमत संग्रह द्वारा अपना भविष्य तय करेगी।

स्पष्टतः हमारी सेनाओं की विजय का कोई अर्थ नहीं था। महाराजा के भारत में विलय के निर्णय को नेहरू ने स्वीकार नहीं किया। पैरा सात में कहा गया है कि वह जम्मू-कश्मीर की सशस्त्र सहायता इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वह अपने मित्र पड़ोसी राज्य (जम्मू-कश्मीर) को आंतरिक या बाह्य मामलों में मजबूर किए जाने की अनुमति नहीं दे सकते।

ध्यान देने योग्य है कि यहां जम्मू-कश्मीर की तुलना एक पड़ोसी राज्य की तरह गई है। विलय की बात बाद में कही गई है कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय ने भारत को उसकी रक्षा की जिम्मेदारी दे दी है।

पैरा 13 में कहा गया है कि हमलावर, भारत के विरूद्ध युद्ध में पाकिस्तान से सहायता प्राप्त कर रहे हैं। परिणामस्वरूप पाकिस्तान से युद्ध की आशंका हो सकती है। अतः सुरक्षा परिषद, पाकिस्तान से कहे कि- 1. वह अपने कर्मचारियों, सैन्य या सिविल को जम्मू-कश्मीर पर हमले में भाग लेने से या सहयोग देने से रोकें।

2. वह अपने नागरिकों से कहे कि वे जम्मू-कश्मीर की जंग में भागीदारी न करें। 3.वह हमलावारों को अपने क्षेत्र का उपयोग न करने दे और किसी प्रकार के साजो-सामान की आपूर्ति न करें।

गॉर्डियन नॉट जैसा समाधान

पाकिस्तान हमलावर नहीं है, फिर भी वह (पाक अधिकृत) कश्मीर के दस जिलों के 13 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके को कब्जा कर चुका था। गिलगित-बालटिस्तान का 72 हजार वर्ग किलोमीटर भी उसके कब्जे में जा चुका था। फिर इस प्रस्ताव की मंशा क्या है? दरअसल यह प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर के विभाजन का मार्ग प्रशस्त करता है।

युद्धविराम और संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में जनमत संग्रह की घोषणा के बाद शेख नेहरू की मजबूरी बन गए थे। अनुच्छेद 370 उसी मजबूरी का प्रतिफल था। इस अनुच्छेद ने भारत की आंतरिक राजनीति व विदेश नीति को भी अस्वाभाविक व दिशाहीन बना दिया। जनमत संग्रह, संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव, युद्धविराम और अनुच्छेद 370 ने ऐसी उलझनें पैदा कर दीं, जिनसे निकलने का कोई रास्ता ही नहीं था।

यह ग्रीक कथाओं की गॉर्डियन नॉट जैसी, न खुलने वाली गांठ बन गई थी। सिकंदर ने इस गांठ को अपनी तलवार से काटकर समाधान किया था। अनुच्छेद 370 का खात्मा कर बनाया गया केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर, इस उलझी समस्या का सिकंदर जैसा ही समाधान है।
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