अभी हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के भारत विद्या भवन के एक सेमिनार में एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा,'हम कब तक अंग्रेजों और वामपंथियों की आलोचना करते रहेंगे कि उन्होंने हमारे इतिहास को विकृत किया। अब यह हमारे सामने चुनौती है कि हम अपना इतिहास लिखें, जिसमें राष्ट्रवाद का एहसास मौजूद हो।'
इस वक्तव्य में उन्होंने एक तरफ बार-बार सारा दोष अंग्रजों एवं वामपंथियों पर मढ़कर गंभीर बौद्धिक प्रयासों से बचने की प्रवृत्तियों से बचते हुए अपने को दक्षिणपंथी एवं राष्ट्रवादी कहने वाले बौद्धिकों के सामने एक महती कार्य योजना पर काम करने की चुनौती रखी। दूसरी तरफ भारतीय एवं राष्ट्रवादी इतिहास एवं चिंतन के संस्रोतों की तलाश कर बौद्धिकों के सामने वैकल्पिक इतिहास लेखन करने का भी प्रस्ताव रखा है।
वस्तुतः समस्या यह है कि हम लोग भारतीय ज्ञान परंपरा, बौद्धिक चिंतन एवं अपने मूल अर्थों में भारतीय प्रतीत होने वाले इतिहास की बात तो करते हैं, परंतु उस पूरी ज्ञान एवं बौद्धिक परंपरा पर गहन शोध कर एवं उनके आधार पर इतिहास एवं बौद्धिक लेखन की जिम्मेवारी से बचते रहते हैं। 'भारतीय' होने का दावा किए जाने वाले ऐसे किसी विमर्श की हम रचना भी करते हैं, तो वह बहुत गहन एवं दृढ़ नहीं हो पाता। भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास लेखन परंपरा एवं बौद्धिक परंपरा में ऐसे कुछ महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं, जिन पर केंद्रित करके हम आज के संदर्भ में भारतीय ज्ञान, चिंतन एवं इतिहास परंपरा का विकास कर सकते हैं।
इस संदर्भ में भारतीय ज्ञान विमर्श के परंपरावादी स्कूल को याद किया जाना जरूरी है। जिनमें रेनेग्योनॉन, आनंद कुमार स्वामी एवं गोपीनाथ कविराज जैसे ज्ञानी आते। इनमें रेनेग्योनॉन फ्रेंच गणितज्ञ एवं दार्शनिक थे। उनका देहावसान 1951 में हुआ। उन्होंने इन्ट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ हिंदू डॉक्ट्रिन, तथा मैन ऐंड हिज विकमिंग एकॉर्डिग टू वेदांत जैसी दुलर्भ कृतियों की रचना की। आनंद कुमार स्वामी श्रीलंका के निवासी थे। इंग्लैंड में पढ़े थे, और अमेरिका के विभिन्न संग्रहालयों में उन्होंने कार्य किया था। वह अपने समय में भारतीय विद्या के एक प्रखर विमर्शकार होकर उभरे थे। परसेप्सन ऑफ वेदा, द डांस ऑफ शिवा, व्हाट इज सिविलाइजेशन तथा अन्य अनेक महत्वपूर्ण कृतियों की उन्होंने रचना की थी। गोपीनाथ कविराज बनारस में रहते थे एवं उन्होंने भारतीय ज्ञान चिंतन के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
इस परंपरावादी स्कूल से प्रभावित गोविंद चंद पांडेय, ए के सरन, बी एस पाठक एवं विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वानों एवं चिंतकों ने भारतीय विद्या पर शोध एवं विमर्श को आगे बढ़ाया। भारतीय परंपरा के मूल स्वर, भारतीय समाज की भारतीय अवधारणा, भारतीय इतिहास के भाव एवं स्वरूप, भारतीय प्राचीन शासन पद्धतियों का मूल्याकंन, भारतीय दर्शन की व्याख्या जैसे अनेक बौद्धिक निष्पादन इस संवर्ग के चिंतकों के लेखन में पाया जा सकता है। इसी संदर्भ में वासुदेवशरण अग्रवाल जो स्वयं उसी बीएचयू के उसी भारतीय विद्या अध्ययन से जुड़े थे, जहां अमित शाह ने यह बात कही कि चर्चा महत्वपूर्ण है, को याद किया जा सकता है।
वासुदेवशरण अग्रवाल ने भारतीय लोक ज्ञान की अंतःदृष्टि, परंपरा, विवेक, मेधा, पर काम तो किया ही, साथ ही प्राचीन भारतीय समाज के ज्ञानकोष से आधुनिक विमर्शों को भी जोड़ने की कोशिश की। देश का अर्थ, राष्ट्र का अर्थ, राष्ट्र का स्वरूप, जैसे विषयों पर गहन चिंतन करते हुए इन ज्ञानियों ने महान ज्ञानकोष खड़ा किया है। जिस पर केंद्रित कर राष्ट्रवादी भाव से जुड़ा इतिहास एवं ज्ञानकोष विकसित करने वाले हमारे समकालीन मित्र काम कर सकते हैं। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, ऐसे ज्ञान परंपरा एवं ज्ञानियों पर केंद्रित देशज संस्रोतों की तलाश, की दीर्घकालिक परियोजना पर काम भी कर रहा है।
भारतीय ज्ञान परंपरा के निर्माण में हम देख रहे हैं कि किस प्रकार एक फ्रेंच एवं श्रीलंका के एक विद्वान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में राहुल सांकृत्यायन जैसे ज्ञानी के लेखन एवं उनके द्वारा पैदा किए गए विमर्श भी हमारी मदद कर सकते हैं। भारतीय लोक विमर्श को राहुल जी ने गहरे प्रभावित तो किया ही था, साथ ही प्राचीन भारतीय एवं बौद्ध इतिहास, परंपरा एवं हेरिटेज पर भी उन्होंने गहन काम किया था। उनके ही समकालीन काशी प्रसाद जायसवाल ने भी भारतीय पुरातात्विक इतिहास परंपरा एवं मैनस्क्रिप्ट की दिशा में महत्वपूर्ण शोध एवं संकलन कार्य किया था।
इसी क्रम में प्रोफेसर क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय, गंगा नाथ झा, बलदेव उपाध्याय तथा अनेक ज्ञानियों की एक लंबी शृखंला है, जिन पर शोध, अध्ययन, उनके वैचारिक तत्वों की व्याख्या कर गंभीर चिंतनपरक एवं अकादमिक विमर्श खड़ा कर के ही हम भारतीय भाव बोध का ज्ञान विकसित कर सकते हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा में भारतीय भाव बोध के विकास में हमें शांति निकेतन विमर्श के स्कूल के ज्ञानियों रवीन्द्रनाथ टैगोर, क्षीति मोहन सेन, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का लेखन भी मार्ग दिखा सकता है एवं हमें अंतःदृष्टि प्रदान कर सकता है। जरूरत है, इन्हें जानने, समझने एवं इनके द्वारा दिए ज्ञान तथा अंतःदृष्टियों के विकास की।
आलोचनाएं तो की जा सकती हैं पर जिसकी हम आलोचना करते हैं, उसका विकल्प भी हमें खड़ा करना होगा। यह तभी संभव होगा जब अकादमिक संस्थानों में ऐसे शोधों एवं ज्ञान रचना के लिए अनुकूल माहौल बने।
-लेखक, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान,इलाहाबाद में निदेशक हैं