किसान आंदोलनों की क्या दशा है? क्या समस्याएं हैं, और क्या संभावनाएं हैं? पहली बात तो यह कि राजनीति ने सब गड्ड-मड्ड कर दिया है। सबसे बड़ा किसान धरना 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत ने 35 मांगों, पांच लाख किसानों के साथ दिल्ली बोट क्लब पर दिया था। गन्ने की कीमतें, बिजली, पानी और कर्ज माफी मुख्य मांगें रहीं। सीमित सफलताएं और ढेर-सी राजनीति, यही हमारे किसान आंदोलनों की पहचान रही है। बहरहाल उस ऐतिहासिक आंदोलन की याद में एक किसान भवन जरूर सिसौली में बन रहा है। संगठन की शक्ति के उपयोग की सोच से पहले ही हम सरकार के सामने याचक बन जाते हैं। नेता घोषणा करने लगता है कि वह कर्जे माफ करा देगा। सवाल कृषक समाज के सशक्तीकरण का है, सरकारी उपकार या दया का नहीं। बढ़ रही अर्थव्यवस्था में कृषि की भागीदारी कम होती जा रही है, जीडीपी में कृषि का शेयर गिरता हुआ 61 से 19 प्रतिशत पर आ पहुंचा है। औद्योगिकीकरण के बावजूद 58 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के सामने भोजन की समस्या है। उपज का सही मूल्य नहीं मिलता। आलू दो रुपये किलो है। सहकारिता की बात दिवास्वप्न हो चुकी है। नेतृत्व का अभाव है। अगर कोई नेता कहीं से निकला भी, तो वह तुरंत राजनीति के हाथों बिक जाता है। सार्थक सोच से पहले ही राजनीति प्रारंभ हो जाती है।
'प्रगतिशील किसानों का कोई संगठन है क्या?' मेरे इस सवाल के जवाब में उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसानों में बड़ा सम्मान रखने वाले बाराबंकी के रामसरन वर्मा ने जवाब दिया, 'न कोई संगठन है न चल पाने की संभावना है।' रामसरन जी प्रगतिशील कृषि के सिरमौर हैं। हम लोग दौलतपुर में उनके फार्म पर थे। अपने करीब 100 एकड़ के फार्म में वह मुख्य रूप से केला, टमाटर और आलू की खेती करते हैं। इस 100 एकड़ में उनकी अपनी जमीन कुल 12 एकड़ ही है। शेष उन्होंने अन्य ग्रामवासियों से लीज पर ले रखी है। उनके घर की छत से देखने पर बहुत बडे़ क्षेत्र में केले की फसल दिखती है। उन्होंने आसपास के कृषकों को प्रगतिशील कृषि के लिए प्रेरित किया है। यह मॉडल सहकारिता की दिशा में इशारा करता है। जिस किसान ने लीज पर भूमि दी है, वह श्रम भी तो दे सकता है। आसान बैंक ऋण की सुविधा हो जाए, तो यह व्यवस्था सहकारी कृषि सोसाइटी में तब्दील हो सकती है। अब सहकारिता की बात जो इतनी स्वाभाविक नजर आ रही है, कभी किसान आंदोलनों का लक्ष्य नहीं रही। रामसरन जैसे लोग आर्थिक समृद्धि के इस आंदोलन का बिना जुलूस धरने के नेतृत्व कर रहे हैं। वे किसानों की नई पीढ़ी के मार्गदर्शक हैं। लेकिन नई पीढ़ी हीन-भावना का शिकार है। श्रावस्ती के परेवपुर गांव में आप जाएंगे, तो देखेंगे कि किस तरह केले की खेती ने किसानों की जिंदगी बदल दी है, लेकिन उन किसानों का कोई संगठन नहीं है। संगठन के अभाव में केलों को मंडी पहुंचाने, मूल्य नियत करने में उनकी भूमिका नहीं बन पाती। यही स्थिति आलू और टमाटर के किसानों की है।
किसान आंदोलनों के लक्ष्य क्या हैं? समझना जरूरी है कि कृषक वर्ग के हित और कृषक जातियों के हितों में फर्क है। कृषि, कृषि आधारित उपक्रम पशुपालन, बागवानी, उपज भंडारण, मंडी व्यवस्था, संपर्क मार्ग, भूमि संबंधी समस्याएं, कृषि शिक्षण प्रशिक्षण, कृषि रोजगार, सहकारिता आदि को लिए हुए अभाव का एक क्षेत्र है, जो हमारे कृषक आंदोलनों का एजेंडा नियत कर सकता है।
ग्रामीण भारत अपना महत्व खो रहा है। नगर शक्तिशाली हो रहे हैं। ग्रामीण समाज में एक सुविधाजीवी वर्ग विकसित हो रहा है, जो खेत बेचकर भी मामूली किस्म की सरकारी नैाकरियों के पीछे दौड़ता है। मूल समस्या कृषि के प्रति व्यावसायिक सोच के अभाव की है। उपज के मूल्यों की अनिश्चितता बहुत क्षति पहुंचाती है, गेहूं, धान, गन्ने की सरकारी कीमतें नियत होती हैं। अन्य दलहनों, आलू, प्याज आदि की कीमत का आधार मांग-आपूर्ति है। अब यहां आकर वैज्ञानिक सोच और सहकारिता की कमी आडे़ आती है। किसानों को सरकारों से सहयोग चाहिए। कृषकों का भविष्य तो प्रगतिशील सोच में है, पर जमाना मोर्चेबंदी का है। इसलिए दबाव की राजनीति शुरू हो जाती है, जो किसान हित के विपरीत जाती है।
एक बात समझना जरूरी है, किसानों का भाग्य बदलने में सरकारों की सीमित भूमिका है। अगर कोई उम्मीद है, तो वह प्रगतिशील किसानों से ही है। सरकारें तो वोट की गुलाम हैं। वे कर्जमाफी से आगे नहीं सोच पाएंगी। सही दिशाओं में सरकारों को ले जाना उन प्रगतिशील किसानों का काम है, जो भविष्य के रास्ते बना रहे हैं।
आज से पच्चीस वर्ष पहले रामसरन वर्मा अपनी बस्ती से बाहर आ गए। अपने खेतों को गतिविधियों का केंद्र बनाया। एक आर्थिक मॉडल बनकर खड़ा हो गया। गांव में ही रहते, तो गंवई राजनीति और झगड़ों में ही खर्च हो गए होते। अगर विकास करना है, तो गांव की बस्ती छोड़ो, खेत पर आओ। वहीं निवास हो, वहीं पशु रखे जाएं, वहीं खेती-बागवानी का पूरा काम हो। आबादी में रह गए, तो वहां न मुर्गी पालन होगा, न मछली पालन। सरकारी योजनाओं का कोई लाभ भी मिलना संभव नहीं होगा। अब सरकारें यह कर सकती हैं कि किसान को अपने खेत पर आवास बनाने में सहायता दें। ग्रामवासी यदि अपनी सुविधा से स्वयं अपनी जोतों को एकत्रित करने की सोचें, तो ऐसी खरीद-बिक्री को सरकारें रजिस्ट्री शुल्क से मुक्त कर सकती हैं। कृषि भूमि को व्यक्तिगत लीज पर लिए जाने की सरल-सी व्यवस्था बना दी जाए। कृषि विद्यालयों को किसानों की गतिविधियों का केंद्र बनाया जाए। किसानों की आकांक्षाओं की दिशा में राजनीतिक सहयोग के क्षेत्र क्या हो, यह चिह्नित करने की जरूरत है। अपने खुद के विकास के एजेंडे व आंतरिक शक्ति के अभाव के कारण बिखराव ही कृषक आंदोलनों की नियति रहा है। बदलता मौसम अब नए किस्म का अभियान चाहता है, जो अनायास के विवादों से दूर विकास का मार्ग प्रशस्त कर सके।
-लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य हैं