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पड़ताल: कोली, पंढेर, पुलिस और न्याय; निठारी कांड ने जांच एजेंसियों और न्याय तंत्र पर खड़े किए गंभीर सवाल

हरवंश दीक्षित
Updated Fri, 20 Oct 2023 08:01 AM IST

सार

यह जानने में 18 साल लग गए कि पुलिस व अभियोजन के सभी दावे झूठे हैं और कातिलों का कुछ पता नहीं। इस घटनाक्रम ने पुलिस, अभियोजन और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।  
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Surendra Koli - फोटो : सोशल मीडिया


निठारी कांड के नाम से बहुचर्चित इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी तथा उसकी विशेष अदालत ने 13 फरवरी, 2009 को पंढेर तथा कोली को दुष्कर्म और हत्या का दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई थी। उसके बाद की गई अपील का निर्णय वर्ष 2014 में आया। नौ सितंबर, 2014 को मेरठ जेल में सुरेंद्र कोली को फांसी दी जानी थी, लेकिन अदालत की छुट्टी होने के कारण फांसी टल गई थी। इसी बीच वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने रात को ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश से मिलने का समय मांगा था। रात करीब पौने बारह बजे विशेष अदालत लगी और करीब एक बजे अदालत ने कोली के मामले में दोबारा सुनवाई के लिए वक्त देते हुए फांसी पर एक हफ्ते के लिए रोक लगा दी।


इस पर उच्च न्यायालय ने दोबारा फैसला दिया और अभियोजन की नाकामी पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कोली और पंढेर, दोनों को बरी कर दिया। अदालत का निर्णय दोपहर में नोएडा के आम लोगों तक ज्यों ही पहुंचा, पंढेर के घर के आस-पास लोगों की भीड़ लग गई। पीड़ित परिवारों के लोगों का दर्द साफ दिखाई दे रहा था। लोगों का आक्रोश इस कदर था कि पंढेर की कोठी पर लोगों ने पत्थर फेंककर अपना गुस्सा व्यक्त किया। पंढेर की कोठी पर फेंके गए पत्थर किसी इमारत पर फेंके गए पत्थर भर नहीं हैं। ये वस्तुत: आम नागरिक की अन्याय बोध से पैदा हुई बेचारगी के एहसास की सबसे कमजोर अभिव्यक्ति है। न्यायशास्त्र के विद्वान इस मामले में पुलिस, अभियोजन विभाग और न्यायाधीश की कमियों का विशेषण लंबे समय तक करते रहेंगे। लेकिन इसने जनमानस के भरोसे पर जो गंभीर चोट पहुंचाई है, उसकी भरपाई नहीं की जा सकेगी।


आज से 18 साल पहले नोएडा में जो कुछ हुआ था, वह सामान्य मामला नहीं था। बच्चे एक-एक करके गुम होने लगे थे और पुलिस उसकी तह तक नहीं जा पा रही थी। और जब नाले तथा झाड़ियों में कुछ कंकाल बरामद होने का सिलसिला शुरू हुआ, तब तक समाज का गुस्सा एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन तक पहुंच गया था। उस समय जब लोगों को यह बताया गया कि मासूमों के साथ दुष्कर्म कर हत्याओं के इन मामलों में पंढेर और उसके नौकर कोली की मिलीभगत है, तब क्षुब्ध लोगों को ऐसा लगा था कि दोषियों को उनके जुर्म की सजा मिल जाएगी।


विशेष अदालत ने जब पंढेर और कोली को सजा-ए-मौत दी और उच्च न्यायालय ने उसे बरकरार रखा, तब लोगों का वह भरोसा और भी मजबूत हुआ। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के विशेष निर्देश पर उच्च न्यायालय ने जब पुलिस और अभियोजन की तमाम कमियों को उजागर किया और उसके आधार पर उन दोनों को बरी कर दिया, तो भरोसे की यह दीवार जैसे अचानक भरभराकर गिर पड़ी। इस पूरे घटनाक्रम और अब तक की उसकी परिणति ने पुलिस, अभियोजन और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े कई प्रश्न खड़े किए हैं।


पहला प्रश्न यह कि पुलिस और अभियोजन एजेंसियों की जांच-पड़ताल यदि इतनी कमजोर है, तो भविष्य में उन पर कैसे भरोसा किया जा सकेगा। उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह कहा है कि जांच एजेंसियों ने अंग व्यापार के गंभीर पहलुओं की जांच किए बगैर गरीब नौकर को खलनायक की तरह पेश करके उसे फंसाने का आसान तरीका चुना। अदालत ने इससे भी अधिक गंभीर टिप्पणी करते हुए आगे कहा कि ऐसी गंभीर चूक के कारण मिलीभगत सहित कई निष्कर्ष संभव हैं। अदालत ने इस बात का उल्लेख भी किया कि अभियोजन पक्ष इस बीच अपना रुख लगातार बदलता रहा। पहले मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली पर संयुक्त रूप से आरोप लगाए गए और फिर सारा दोष कोली पर मढ़ दिया गया। यहां इसका उल्लेख किया जाना लाजिमी है कि नोएडा में हत्या का इसी तरह का एक और मामला सामने आया था, जो अभी तक अनसुलझा है। करीब 15 वर्ष पहले 15-16 मई, 2008 की रात पहले आरुषि और बाद में हेमराज का कत्ल कर दिया गया था। दोहरी हत्याओं का आरोप आरुषि के डॉक्टर माता-पिता तलवार दंपत्ति पर लगाया गया। सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें दोषी मानते हुए 2013 में उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 2017 में सीबीआई की जांच में कई खामियों का जिक्र करते हुए तलवार दंपत्ति को बरी कर दिया।


लौकिक जगत में सच के निर्धारण के मामलों में अदालत का निर्णय अंतिम होता है। इसलिए कोली, पंढेर और तलवार दंपत्ति कानून की निगाह में दोषी नहीं है। लेकिन बीते वर्षों में उन्होंने तथा उनके परिजनों ने सामाजिक लांछन का जो दंश झेला है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। तलवार दंपत्ति अब भी सामाजिक तिरस्कार से मुक्त नहीं हो पाए हैं। इसी तरह वर्ष 2005 में सुरेंद्र कोली पर जब आरोप लगाया गया था, उससे पहले ही उसके बेटे का जन्म हुआ था और उसकी बेटी सात साल की थी। उसका परिवार आज कहां और किस दशा में है, यह शायद ही किसी को पता हो, लेकिन यह तय है कि समाज ने उसे चैन से जीने नहीं दिया होगा। हमें हर हाल में इस कमी को दूर करने के पुख्ता तरीके ढूंढने होंगे। कहीं ऐसा न हो कि हाथ से पत्थर फेंककर आक्रोश व्यक्त करने वाला समाज निराश होकर अपने तरीके से न्याय देने के विकल्प पर भरोसा करने लगे। यह सभ्य समाज की सबसे बड़ी विफलता होगी।
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-लेखक मुरादाबाद स्थित तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय में विधि संकाय के डीन हैं।

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