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कट्टरपंथ को सख्त संदेश: जिन महिलाओं ने बुर्का पहनने का विरोध किया, उन पर तेजाब फेंके गए

तवलीन सिंह Published by: तवलीन सिंह Updated Mon, 12 Aug 2019 01:02 AM IST
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Jammu kashmir - फोटो : PTI

कश्मीर घाटी में आगे क्या होगा, कहना मुश्किल है। लेकिन एक चीज जो अभी से साफ दिखने लग गई है, वह यह कि अब वहां इस्लामी खिलाफत की स्थापना के बारे में सोचना असंभव है। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने का और कोई लाभ मिले या न मिले, इतना बहुत है कि देश के अंदर एक इस्लामी राज्य नहीं बन सकेगा।

बुरहान वानी ने अपने हर वीडियो में स्पष्ट किया था कि उसकी लड़ाई कश्मीर की आजादी के लिए नहीं, कश्मीर में शरीयत लाने के लिए, इस्लाम के लिए है। वानी जिस जेहादी संस्था का सरगना था, उस हिज्बुल मुजाहिदीन को पाकिस्तान ने कश्मीर में ‘आजादी’ के आंदोलन का चरित्र बदलने के मकसद से बनाया था।



यासीन मलिक के जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने सिर्फ कश्मीर में ‘आजादी’ हासिल करने के लिए आंदोलन शुरू किया था। पर आंदोलन शुरू होने के कुछ ही महीने बाद उसका नेतृत्व हिज्बुल मुजाहिदीन ने अपने हाथों में लिया और यह साबित किया कि उसके पास न सिर्फ बेहतर हत्यारे और जेहादी सिपाही हैं, बल्कि पाकिस्तान की छत्रछाया भी है। हिज्बुल मुजाहिदीन की अगुवाई में कश्मीर घाटी की शक्ल पूरी तरह बदल गई है।

जिस कश्मीर में कभी बुर्के नहीं दिखते थे, वहां आज एक भी औरत बेनकाब नहीं दिखती। शुरू में जिन महिलाओं ने बुर्का पहनने का विरोध किया, उन पर तेजाब फेंके गए। साथ में सिनेमा घर, शराब की दुकानें और पांच सितारा होटलों में बार जबर्दस्ती बंद किए गए। धीरे-धीरे कश्मीरी इस्लाम का उदार चेहरा कट्टरपंथी बनता गया। कश्मीर के स्कूलों में बच्चियां भी अब नकाबपोश दिखती हैं।

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Jammu kashmir - फोटो : PTI
कश्मीर घाटी में आगे क्या होगा, कहना मुश्किल है। लेकिन एक चीज जो अभी से साफ दिखने लग गई है, वह यह कि अब वहां इस्लामी खिलाफत की स्थापना के बारे में सोचना असंभव है। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने का और कोई लाभ मिले या न मिले, इतना बहुत है कि देश के अंदर एक इस्लामी राज्य नहीं बन सकेगा।

बुरहान वानी ने अपने हर वीडियो में स्पष्ट किया था कि उसकी लड़ाई कश्मीर की आजादी के लिए नहीं, कश्मीर में शरीयत लाने के लिए, इस्लाम के लिए है। वानी जिस जेहादी संस्था का सरगना था, उस हिज्बुल मुजाहिदीन को पाकिस्तान ने कश्मीर में ‘आजादी’ के आंदोलन का चरित्र बदलने के मकसद से बनाया था।

यासीन मलिक के जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने सिर्फ कश्मीर में ‘आजादी’ हासिल करने के लिए आंदोलन शुरू किया था। पर आंदोलन शुरू होने के कुछ ही महीने बाद उसका नेतृत्व हिज्बुल मुजाहिदीन ने अपने हाथों में लिया और यह साबित किया कि उसके पास न सिर्फ बेहतर हत्यारे और जेहादी सिपाही हैं, बल्कि पाकिस्तान की छत्रछाया भी है। हिज्बुल मुजाहिदीन की अगुवाई में कश्मीर घाटी की शक्ल पूरी तरह बदल गई है।

जिस कश्मीर में कभी बुर्के नहीं दिखते थे, वहां आज एक भी औरत बेनकाब नहीं दिखती। शुरू में जिन महिलाओं ने बुर्का पहनने का विरोध किया, उन पर तेजाब फेंके गए। साथ में सिनेमा घर, शराब की दुकानें और पांच सितारा होटलों में बार जबर्दस्ती बंद किए गए। धीरे-धीरे कश्मीरी इस्लाम का उदार चेहरा कट्टरपंथी बनता गया। कश्मीर के स्कूलों में बच्चियां भी अब नकाबपोश दिखती हैं।

घाटी में जब इस्लाम का रूप राजनीतिक हो गया, तो कभी न कभी शरीयत नाफिस करने की मांग तो आनी ही थी। यह पहली बार बुरहान वानी के जरिये आई। उसकी मुठभेड़ में मौत के बाद हिज्बुल मुजाहिदीन के नए कमांडरों से और पिछले महीने पहली बार ओसामा बिन लादेन के उत्तराधिकारी ऐमन अल जवाहिरी ने भी कश्मीर में इस्लाम का ध्वज फहराने की बात की। इस जेहादी षड्यंत्र को पाकिस्तान का पूरा समर्थन इस हद तक मिलता रहा है कि बुरहान वानी की हत्या का जिक्र हमारे पड़ोसी देश ने संयुक्त राष्ट्र में भी किया है।

आज अगर अनुच्छेद 370 हटाए जाने का दुख कश्मीर से ज्यादा पाकिस्तान में दिखने लगा है, तो वह इसलिए कि इसके हटाए जाने से उस षड्यंत्र का खात्मा हो गया है। मोदी सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि देश के किसी भी राज्य में इस्लामी खिलाफत की नींव डालने के हर प्रयास को कुचल दिया जाएगा।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पिछले सप्ताह अपनी संसद में जो भाषण दिया था, उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर उन्होंने गुस्सा जताया। उन्होंने कहा कि आरएसएस की कोशिश भारत के मुसलमानों को मार डालने की है और अनुच्छेद 370 हटाने का यही मुख्य कारण था।

इमरान खान गलत समझ रहे हैं। भारत में मुसलमान पूरी तरह सुरक्षित हैं। बिल्कुल वैसे, जैसे पाकिस्तान बन जाने के बाद सुरक्षित रहे हैं। पर यह सच है कि भारत की सीमाओं के अंदर इस्लामी राज्य की कोई जगह नहीं है। न कभी पहले थी और न भविष्य में कभी होनेवाली है।

आज कश्मीर घाटी में जो कट्टरपंथी जेहादी संस्थाएं हैं, उनको यह संदेश अगर मिला नहीं है, तो जल्दी मिलने वाला है। जो आम कश्मीरी हैं, जिनको जेहादी सोच पसंद है या जिनका इरादा अपने मजहब को राजनीतिक हथियार बनाने का है, उनको भी यह संदेश मिल जाना चाहिए कि उनके साथ अगर सरकार सख्ती से पेश आती है, तो उनको देश के लोगों से जरा भी सहानुभूति नहीं मिलने वाली है।
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