वे दोनों प्यार से एक-दूसरे को निहार रहे थे। प्रेम साधारण नहीं था। आखिर पच्चीस वर्षों का साथ जो था।
मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं। जब से चुनाव आने की बात हुई है। मेरा प्यार और बढ़ गया है। देखो, जब तुम लोकसभा वैतरणी पार कर रही थी, तो मैंने तुम्हारा कितना साथ दिया था।
नहीं, मैं तो हमेशा से तुम्हारे साथ हूं। हमारा प्यार भौतिकवादी तीसरे मोर्चे की तरह नहीं है, जो पच्चीस कदम चलकर ही टूट जाता है। अब तो लगता है कि हमारे प्यार के अच्छे दिन आने वाले हैं। एक दिन बस सब जगह मैं ही मैं हूंगी।
वह चौंक गया, कैसी बात कह रही हो। मैं यानी तुम, केवल तुम। मैं कहीं भी नहीं।
वह हंसी, तुम भी बस, अर्थ का अनर्थ ले जाते हो। मेरे साथ तुम भी, तुम हमेशा मेरे सहयोगी रहोगे।
वह चौंक गया, सहयोगी! देखो तुम पहेलियां मत बुझाओ। अब तो तुम दिल्ली के महलों में रहने लगी हो। मेरे पास तो महाराष्ट्र की झोपड़ी ही है। तुम दिल्ली के महल संभालो। मेरी झोपड़ी में पांव मत पसारो। महाराष्ट्र में दखल मत दो।
तुम फिर बेकार की बात कर रहे हो। देखो, अगर मैं महाराष्ट्र भूमि पर अधिक जमीन की बात कह रही हूं, तो इसका कारण है कि लोग मुझे अधिक चाहते हैं। देखो, कैसी लहर है। सब मेरी ही बात करता है।
वह गुस्सा हो गया, काहे की लहर! अभी देखा नहीं कि राजस्थान, उत्तरप्रदेश और तो और तुम्हारे घर की सौंदर्य प्रतियोगिता में तुम्हारा क्या हाल रहा। लोग तो यहां तक कह रहे थे कि कोई सौंदर्य नहीं है, केवल मेकअप का कमाल है।
अब वह भी भड़क उठी, नहीं रहना तुम्हारे साथ।
उसे भी गुस्सा आ गया, मुझे भी नहीं रहना तुम्हारे साथ। तुमने चांदी की दीवार न तोड़ी, प्यार भरा गठबंधनीय दिल तोड़ दिया। सभी लोगों को हमारा जोड़ा कितना सुंदर लगता था।
मगर अब वह कुछ नहीं सुन रही थी। उसने तो बस अकेले रहने का फैसला कर लिया था। वह भी क्या करता। चुपचाप अपनी छोटी-सी महाराष्ट्र झोपड़ी के कोल्हू ठीक करने लगा।