कई विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी कारोबारियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाना और उन्हें भारत में निवेश के लिए राजी करना है। मोदी का यह नजरिया उनकी जापान यात्रा के समान ही है, जहां उन्होंने जापानी कंपनियों के भारत आगमन पर 'लालफीताशाही नहीं, लाल कालीन बिछाने' की बात कही थी। मोदी अमेरिकी व्यापारियों से भी यही बात कहना चाह रहे हैं। आज अमेरिकी कंपनियों के पास निवेश के लायक 20.5 खरब डॉलर की पूंजी है। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद से कहीं ज्यादा है। भारत इस रकम का कुछ हिस्सा बुनियादी ढांचे के विकास, स्मार्ट सिटी के निर्माण, रक्षा उद्योग, परमाणु और सौर ऊर्जा आदि के क्षेत्रों में निवेश के रूप में पा सकता है। लेकिन मोदी की असली चुनौती अमेरिकी कारोबारियों का विश्वास जीतने की है, जो भारत की नीतिगत पंगुता से निराश हैं।
मोदी की चुनौती भारत के हितों को दांव पर लगाए बिना अमेरिकियों का भरोसा जीतने की है। 'मेक इन इंडिया' कैंपेन इसी दिशा में उठाया गया कदम है। इस अभियान की घोषणा मोदी की अमेरिका यात्रा के अवसर पर की गई। इसके जरिये मोदी वैश्विक कारोबारियों को यह यकीन दिलाना चाहते हैं कि भारत अब निवेशकों पर भरोसा करने को तैयार है। वस्तुतः हाल के वर्षों में केंद्र और राज्यों में भाई-भतीजावाद की नीतियां हावी रहने के कारण निवेशकों का भरोसा खत्म हुआ था। सरकार, कारोबारी समाज, सिविल सोसाइटी, और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के बीच फिर से विश्वास बहाली कायम करने को मोदी प्रयासरत हैं। 'मेक इन इंडिया' का मूल तत्व भी यही है; जिसके जरिये वह वैश्विक विनिर्माण क्षेत्र में भारत को फिर से स्थापित करना चाहते हैं। पर इसके लिए मोदी को काफी कुछ करना होगा।
शुरुआत उन्हें व्यवस्था में मौजूद उन विसंगतियों को दूर करने से करनी होगी, जो एनडीए की सरकार में भी मौजूद हैं। सर्वोच्च अदालत द्वारा 1993 के बाद से आवंटित 214 कोयला खदानों को रद्द करने का फैसला इसी का एक ज्वलंत उदाहरण है, जिस वजह से प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई और उसके निदेशक की कार्यप्रणाली भी संदेह के घेरे में आ गई है। नरेंद्र मोदी ने सीबीआई का नाम खासतौर से लिया था, जब वह संस्थागत विश्वास को फिर से स्थापित करने की बात कह रहे थे। लेकिन इस क्रम में उन्हें उस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि कुछ हफ्ते पहले ही सीबीआई ने विनिवेश से संबंधित बारह वर्ष पुराने एक मामले को फिर से खोला है। यह मामला पूर्व की एनडीए सरकार से जुड़ा है, जब अरुण शौरी विनिवेश मंत्री थे। कोई इसका जवाब देने को तैयार नहीं कि बारह साल पुराने मामले को सीबीआई ने दोबारा खोलने का फैसला क्यों किया? लिहाजा प्रधानमंत्री विश्वास बढ़ाने की बात भले ही कहते हैं, जमीनी हकीकत इसके उलट है।
इसके अलावा मेक इन इंडिया की शुरुआत करते हुए 50 मिनट के अपने भाषण में मोदी ने उन कुछ बुनियादी समस्याओं पर बात नहीं की, जो निवेशकों को भारत आकर कारोबार करने से रोकती हैं। ये हमारी सामूहिक शासन संस्कृति का हिस्सा बन गई हैं। अगर मेक इन इंडिया की उड़ान ऊंची करनी है, तो इन समस्याओं का क्रमवार समाधान जरूरी है। अब तक प्रधानमंत्री अपने विचारों को एक विशिष्ट शैली में पेश करते दिखे हैं। विचारों को प्रभावी बनाने के लिए वह इंच टू माइल्स, लुक ईस्ट ऐंड लिंक वेस्ट, जीरो डिफेक्ट-जीरो इफेक्ट, एफडीआई मतलब फर्स्ट डेवलप इंडिया, हाई-वे टू इंफो-वे, स्वच्छ भारत जैसे कुछ नारों का भी इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन उन्हें अब इन 'अच्छे' नारों से पार जाने की जरूरत है।
हाल ही में विश्व व्यापार संगठन के पूर्व उप महानिदेशक और वर्तमान में अनुसंधान संगठन आईसीआरआईईआर के प्रोफेसर अनवर उल होदा ने अपने अध्ययन में इसके बारे में बताया है कि चीन, मलयेशिया, दक्षिण कोरिया या थाईलैंड जैसे देशों की तरह भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग को आकर्षित क्यों नहीं कर पाता। होदा के मुताबिक, 'विश्वास' की कमी की वजह से भारत काफी पीछे है। मसलन, भारत वैश्विक कंपनियों पर यह भरोसा नहीं करता कि वे ईमानदारी से कर चुकाएंगी ही। इसलिए भारतीय कर अधिकारी देश में कारोबार कर रहीं वैश्विक कंपनियों द्वारा किए गए मुनाफे की घोषणा पर सवाल उठाते रहते हैं। नतीजतन कराधान व्यवस्था में पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं होता। भारतीय कंपनियों के लिए कर की दर 33 फीसदी है, लेकिन वैश्विक कंपनियों के लिए यह दर 40 प्रतिशत है। मोदी लोगों और कंपनियों से स्व-प्रमाणन यानी खुद ही प्रमाणित करने की वकालत करते हैं, लेकिन ज्यादातर नियामक अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के स्व-प्रमाणन पर विश्वास नहीं करते।
होदा के मुताबिक, इसके अलावा बंदरगाहों पर कर्मचारियों और माल के रख-रखाव की खराब व्यवस्था और बुनियादी ढांचागत समस्याओं की वजह से भी वैश्विक विनिर्माण में भारत नहीं ठहरता। इन वजहों से आयातित कच्चे माल पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क बढ़ जाता है। इसके अलावा 60 फीसदी भारतीय कारोबारी कैप्टिव पावर प्लांट (ग्रिड नहीं, बल्कि अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए खुद बिजली बनाना) से मिलने वाली बिजली पर निर्भर हैं, जो कोयला आधारित ग्रिड से मिलने वाली बिजली से दो से तीन गुनी महंगी है। जबकि चीन में महज 18 फीसदी कारोबारी ही कैप्टिव पावर प्लांट पर निर्भर हैं।
कई स्थानीय कर भी देश में व्यापार लागत बढ़ाते हैं। प्रस्तावित जीएसटी में इस समस्या के समाधान की उम्मीद है। मगर कई वर्षों से जीएसटी राजनीतिक फुटबॉल ही रहा है। खुद नरेंद्र मोदी भी पिछले वर्ष तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में इसका विरोध करते रहे हैं। अगर भाजपा इस मुद्दे पर यूपीए के साथ रही होती, तो निश्चय ही आज मोदी बहुत मजबूत बुनियाद पर खड़े होते। हालांकि सिंगल विंडो के लिए सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक साथ लाने की बड़ी चुनौती से भी मोदी को जूझना होगा, जो उनकी 'मेक इन इंडिया' योजना की राह का बड़ा रोड़ा है। उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों के साथ औपचारिक वार्ता का वायदा तो किया था, लेकिन अब तक इसकी शुरुआत नहीं हो सकी है।