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मौत का घर बनते सीवर : सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक और सड़ती व्यवस्था की गंध

पंकज चतुर्वेदी
Updated Fri, 14 Oct 2022 06:46 AM IST

सार

सीवरेज के पानी के संपर्क में आने पर शरीर पर छाले या घाव होना आम है। नाइट्रेट और नाइट्राइड के कारण दमा और फेफड़े का संक्रमण होने की आशंका भी प्रबल होती है, जबकि क्रोमियम से घाव होने, नाक की झिल्ली फटने और फेफड़े का कैंसर होने के आसार होते हैं।
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सीवर - फोटो : अमर उजाला


यह सरकारी आंकड़ा भयावह है कि गत बीस साल में सीवर की सफाई के दौरान देश में 989 लोग जान गंवा चुके हैं। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 1993 से फरवरी, 2022 तक सीवर की सफाई के दौरान सर्वाधिक 218 लोग तमिलनाडु में मारे गए। उसके बाद गुजरात में 153 और दिल्ली में 97 मौत दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश में 107, हरियाणा में 84 और कर्नाटक में 86 लोगों के लिए सीवर मौत का घर बन गया। ऐसी हर मौत का कारण सीवर की जहरीली गैस बताया जाता है। 


पुलिस ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। अब नागरिक भी सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए मजदूरों को बुला लेते हैं, और यदि उनके साथ कोई दुर्घटना होती है, तब न तो उनके आश्रितों को मुआवजा मिलता है, न ही दोषियों को सजा। सरकार व सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे ऐसी मौतों पर ध्यान नहीं देते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाई कोर्ट ने सात साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। 


सरकार ने भी 2008 में एक अध्यादेश लाकर सीवर की सफाई करने वाले मजदूरों को सुरक्षा उपकरण प्रदान करने की अनिवार्यता की बात कही थी। इनकी सुरक्षा के लिए कानून हैं और मानवाधिकार आयोग के निर्देश भी। पर इनके पालन की जिम्मेदारी किसी की नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने तो ऐसी दुर्घटनाओं में मरने वालों को 10 लाख मुआवजे का भी आदेश दिया था, लेकिन कागजों पर ऐसे मजदूरों का कोई रिकॉर्ड होता नहीं, सो मुआवजे की प्रक्रिया ही शुरू नहीं हो सकती। 


भूमिगत सीवरों ने भले शहरी जीवन में कुछ सहूलियतें दी हों, पर इसकी सफाई करने वालों के जीवन में इस अंधेरे नाले ने और भी अंधेरा कर दिया है। देश में दो लाख से अधिक लोग जाम सीवरों को खोलने, मेनहोल में घुसकर गाद, पत्थर को हटाने के काम में लगे हैं और अनुमान है कि सालाना औसतन एक हजार लोग दम घुटने से मरते हैं। महानगरों के सीवरों में महज घरेलू निस्तार ही नहीं होता, कारखानों की गंदगी भी होती है। कई-कई महीनों से बंद पड़े इन गहरे नरक कुंडों में कार्बन मोनो आक्साइड, हाईड्रोजन सल्फाइड, मीथेन जैसी दमघोंटू गैसें होती हैं। 


सीवरेज के पानी के संपर्क में आने पर शरीर पर छाले या घाव होना आम है। नाइट्रेट और नाइट्राइड के कारण दमा और फेफड़े का संक्रमण होने की आशंका भी प्रबल होती है, जबकि क्रोमियम से घाव होने, नाक की झिल्ली फटने और फेफड़े का कैंसर होने के आसार होते हैं। सीवर की सफाई करने वाले 10-12 साल से अधिक काम नहीं कर पाते, क्योंकि उनका शरीर काम करने लायक ही नहीं रह जाता। 


बदबू, गंदगी और रोजगार की अनिश्चितता में जीने वाले इन लोगों का शराब व अन्य नशों की गिरफ्त में आना लाजिमी है, जो उन्हें कई गंभीर बीमारियों का शिकार बना देता है। यह सभी सरकारी दिशा-निर्देशों में दर्ज हैं कि सीवर की सफाई करने वालों को गैस टेस्टर, गंदी हवा को बाहर फेंकने के लिए ब्लोअर, टॉर्च, दस्ताने, चश्मे, कान ढकने का कैप और हैलमेट मुहैया करवाना आवश्यक है। 
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मुंबई हाई कोर्ट का निर्देश था कि सीवर सफाई का काम ठेकेदारों के माध्यम से कतई नहीं करवाना चाहिए। पर अब यह काम ज्यादातर ठेकेदारों द्वारा करवाया जा रहा है। सफाई का काम करने के बाद कर्मचारियों को स्वच्छ पेयजल, नहाने के लिए साबुन व पानी तथा स्थान उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है। पर ये उपकरण और सुविधाएं नहीं मिलतीं।

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