पिछले महीने न्यूजलॉन्ड्री नामक वेबसाइट ने नई दिल्ली के सेंट्रल विस्टा की रूपरेखा बदलने से संबंधित परियोजना की पड़ताल करती अल्पना किशोर की दो खंडों की रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसके पहले खंड में पूछा गया : राजधानी के भयावह वायु प्रदूषण या घटती जीवन प्रत्याशा से निपटने के बजाय राजपथ (सेंट्रल विस्टा) का पुनर्विकास पहली प्राथमिकता क्यों है?
इसका जवाब तलाशते किशोर ने इस परियोजना के एक तत्व पर ध्यान केंद्रित किया; राजपथ पर प्रधानमंत्री के नए भव्य आवास का प्रावधान। वह तर्क करती हैं कि इस तरह की आत्म-संतुष्टि तानाशाही वाली शासन व्यवस्थाओं में तो आम हो सकती है, लेकिन एक गणतंत्र के लिए यह उपयुक्त नहीं है।
किशोर तर्क करती हैं, 'अगर कोई दिल्ली को लंदन या बर्लिन की तरह एक लोकतंत्र की राजधानी के रूप में देखे, तो प्रधानमंत्री के दूसरे आवास के लिए 10,000 करोड़ रुपये खर्च करने से पहले दिल्ली की प्रदूषण जैसी समस्याओं पर, जिसकी वजह से रोजाना लगभग 80 लोग मर रहे हैं और 45 प्रतिशत अकाल मृत्यु हो रही है, ध्यान न देना एक बेहद असंवेदनशील कदम है, जो उस ताकतवर शख्स को लोगों की भलाई के ऊपर रखता है। दूसरी ओर यदि हम बीजिंग-प्योंगयांग-मॉस्को जैसे शहरों में हों, जहां नागरिकों को महज दर्शक समझा जाता है, तो वहां यह आम बात है।'
किशोर के आलेख का दूसरा हिस्सा उस प्रक्रिया पर केंद्रित है, जिसके आधार पर इस परियोजना का आवंटन हुआ : गोपनीय और संदिग्ध तरीके से आगे बढ़ाई गई यह प्रक्रिया गुजरात के आर्किटेक्ट्स की एक ऐसी फर्म को ठेका देने के साथ खत्म हुई, जिसे प्रधानमंत्री के करीबी के रूप में जाना जाता है। किशोर लिखती हैं कि इस फर्म की पिछली परियोजनाएं अपने निष्पादन के लिए नियत प्रक्रिया, परियोजना के कारण पड़ने वाले प्रभाव का आकलन, सार्वजनिक परामर्श और अच्छी तरह से स्थापित श्रेष्ठ वैश्विक प्रथाओं जैसी 'बाधाओं को हटाने' पर निर्भर थीं। कुल मिलाकर फर्म का पिछला रिकॉर्ड निरंतर नागरिक अनादर से जुड़ा हुआ था।
दो भाग के अपने लेख का समापन करते हुए किशोर ने लिखा, 'सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से आए प्रधानमंत्री राजपथ पर एक घर चाहते हैं, ताकि वह व्यक्तिगत महानता और विरासत के अपने दृष्टिकोण को बढ़ावा दे सकें। क्या एमानुएल मैक्रों ऐसी मांग करेंगे और उससे भी अहम यह कि क्या उन्हें शॉन्स एलिजे में कोई मकान मिल पाएगा? क्या ट्रंप कभी माल में अपने लिए दूसरा मकान तैयार करवाने का आदेश दे सकते हैं?' वह लिखती हैं, 'इसने उनके नाम जड़े दस लाख वाले सूट की याद दिला दी, मगर यह दिखावा करदाताओं के खर्च पर होगा।'
किशोर के आलेख में कोविड-19 संकट का कोई जिक्र नहीं है; इत्तफाक से इस संकट का भयावह रूप सामने आने से पहले इसे लिखा गया। मैं इस संकट पर बाद में आऊंगा, मैं पहले यह बताना चाहता हूं कि मैं उनके द्वारा व्यक्त की गई चिंता से पूरी तरह से सहमत हूं। इस परियोजना को जनता के बीच व्यापक विमर्श, यहां तक कि वास्तुकला और शहरी नियोजन के विशेषज्ञों से मशविरे के बिना ही आगे बढ़ाया गया है। वास्तव में अहमदाबाद के आर्किटेक्ट्स की इस फर्म का काम देखने के अनुभव की वजह से मुझे अतिरिक्त चिंता है; वे इतिहास और विरासत से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं।
इसका एक बुनियादी उदाहरण है भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद के दूसरे कैंपस की उनकी डिजाइन। मूल आईआईएम-ए कैंपस की डिजाइन लुइस कहन ने तैयार की थी, जिसमें लाल ईंटों, खुली खिड़कियों और आंगनों के साथ पारंपरिक और आधुनिक परंपराओं का संयोजन किया गया था। इसे देखना, वहां पैदल चलना, पढ़ना और पढ़ाना यह सब आनंददायक है। इसका परिवर्ती नीरस और आत्माहीन है और यह पूरी तरह से कंकरीट से बना है; जिन लोगों को यहां कार्यालय दिए गए हैं, वे मूल परिसर में स्थानांतरण चाहते हैं, जो कि कहीं अधिक लुभावना है।
इस परियोजना को जायज ठहराने के लिए प्रधानमंत्री का अपना तर्क है कि इसके पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं है, बल्कि एक राष्ट्रीय उपलब्धि है और वह है भारतीय स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ। यह अपमानजनक है, क्योंकि अतीत में आईं वर्षगांठों में पूर्व प्रधानमंत्रियों ने ऐसा भव्य प्रदर्शन नहीं किया। स्वतंत्रता की 25 वीं और 50वीं वर्षगांठ के समय उचित ही संसद के विशेष सत्र आयोजित किए गए थे। जाहिरा तौर पर इंदिरा गांधी और आई के गुजराल ने जिसे पर्याप्त माना, नरेंद्र मोदी के लिए काफी नहीं है।
मोदी सरकार नई दिल्ली की रूपरेखा में जो बदलाव कर रही है, वह मेरी समझ से जीवित कम्युनिस्ट तानाशाहों के बजाय कुछ दिवंगत अफ्रीकी तानाशाहों जैसा है। यह एक तरह से दिखावे वाली परियोजना है, जिसे शासक की अमरता को चिरस्थायी बनाने के लिए डिजाइन किया गया है, जैसा कि आइवरी कोस्ट के फेलिक्स हाउफोउट-बिओगनी और सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक के ज्यां बीदेल बोकासा ने कभी अपने देशों में किया था। (इसके लिए वी एस नॉयपाल का निबंध द क्रोकोडाइल्स ऑफ यामोसुकरो पढ़ा जा सकता है)
कोरोना वायरस की महामारी के हमले से पहले से राष्ट्रीय राजधानी के केंद्र में यह महंगी परियोजना फिजूलखर्ची और आत्म-संतुष्टि की कवायद ही लग रही थी। और अब तो यह और अधिक वैसी लग रही है। अर्थव्यवस्था पहले से ही गिरावट की ओर थी, महामारी के कारण और संकट में आ गई है। पर्याप्त तैयारी के बिना लगाए गए लॉकडाउन से लोगों की तकलीफें बढ़ गईं। कामकाजी भारतीय पहले ही मुश्किल से गुजर-बसर कर रहा था, उसे अब और अधिक अभावों का सामना करना पड़ रहा है।
जैसा कि अनेक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस संकट ने लाखों गरीबी भारतीयों को और गरीब बना दिया है, उन्हें तुरंत केंद्र सरकार से वित्तीय मदद की जरूरत है। आखिर क्यों नहीं सेंट्रल विस्टा योजना के लिए आवंटित धन- अभी अनुमानित 20,000 करोड़ रुपये और इसमें और धन आएगा- को उनकी हालत सुधारने के लिए परावर्तित किया जाता है?
राजनीतिक रूप से, इस आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकट का बोझ राज्य उठा रहे हैं। उन्हें तत्काल धन की जरूरत है, कम से कम वह धन तो उन्हें चाहिए ही, जितना केंद्र का बकाया है। जीएसटी राजस्व के हिस्से के रूप में राज्यों का 30,000 करोड़ रुपये केंद्र को उन्हें देना है। आखिर अब तक इसका भुगतान क्यों नहीं किया गया, जबकि सेंट्रल विस्टा परियोजना को मंजूरी दी गई है और उसके टेंडर की घोषणा की गई है।
अर्थव्यवस्था को पटरी में आने में कम से कम एक वर्ष लगेंगे, संभवतः अधिक भी लग सकते हैं। सामाजिक ताने-बाने की बहाली में तो और भी लंबा वक्त लग सकता है। कुल मिलाकर, देश को उस स्थिति में पहुंचने में कम से कम पांच वर्ष लग सकते है, संभवतः दस वर्ष भी लग जाएं, जहां हम कोविड-19 के दस्तक देने से पहले थे। निश्चित रूप से हमारे नेताओं की नैतिक, राजनीतिक और बौद्धिक ऊर्जा को इस आर्थिक और सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए सबसे ऊपर समर्पित होना चाहिए।
महामारी के आने के बाद से प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में भारतीयों से बार-बार त्याग करने के लिए कहा है। समय, नौकरियों, जीवन शैली और मानवीय तथा सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का त्याग। अब नागरिकों को प्रधानमंत्री से देश के लिए कुछ त्याग करने के लिए कहना चाहिए। सेंट्रल विस्टा की रूपरेखा बदलने की उनकी परियोजना शुरू से विवादों में है। इसका अब किसी तरह समर्थन नहीं किया जा सकता। उन्हें इसे त्याग देना चाहिए।