देश की राजधानी में हुई हिंसा, आगजनी और वीभत्स सांप्रदायिक उन्माद ने एक बार फिर कर्तव्य, अधिकार और राजधर्म पर बहस छेड़ दी है। स्मरणीय है कि 26 नवंबर को, संविधान दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने आह्वान किया था कि समस्त देशवासी संविधान के आदर्शों और मूल्यों को आत्मसात करें और मौलिक कर्तव्यों का निर्वहन करें। संविधान के आदर्श और मूल्य क्या हैं? यह प्रश्न जटिल है, क्योंकि हमारा संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान है, जिसमें 395 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं और जो 104 बार संशोधित हो चुका है। सांविधानिक मूल्यों एवं आदर्शों का निर्वहन एक बड़ी चुनौती है, हमारे संविधान की विशालता, जटिलता तथा देश में व्याप्त सांविधानिक निरक्षरता। नागरिकों और यहां तक कि गैर नागरिकों की सुरक्षा राजधर्म है, राज्य का परम दायित्व है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है, जिसे विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया से ही छीना जा सकता है, अन्यथा नहीं।
संविधान के मूल आदर्श संविधान की उद्देशिका में निहित हैं, जो भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्रदान करने तथा व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए आश्वस्ति प्रदान करते हैं। 1975 में, 42वें संविधान संशोधन के द्वारा नागरिकों के मूल कर्तव्यों संबंधी एक नए अनुच्छेद (51क) को संविधान में समाहित किया गया। संक्षेप में नागरिकों के मूल कर्तव्य हैं – संविधान का पालन, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर; स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले आदर्शों को हृदय से संजोना; भारत की एकता को अक्षुण्ण रखना; आह्वान करने पर देश की सेवा; भारत के सभी लोगों के प्रति समरसता और सद्भाव; संस्कृति और पर्यावरण का संरक्षण; वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानववाद की भावना का विकास करना, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और हिंसा से दूर रहना, इत्यादि।
नागरिकों द्वारा मूल कर्तव्यों का निर्वहन समसामयिक परिस्थितियों में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जब दंगे, आगजनी और हिंसा हो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचे और नागरिकों का जीवन संकट में हो। ऐसी परिस्थिति में सभी नागरिकों का संविधान साक्षर होना और सभी हितधारकों द्वारा सांविधानिक आदर्शों और मूल्यों का अनुपालन नितांत आवश्यक है। वाक्स्वातंत्र्य एवं शांतिपूर्वक बिना अस्त्र-शस्त्र के एकत्रित होने का मौलिक अधिकार देश की एकता और अखंडता, शिष्टता और सदाचार की परिधि से परिसीमित है। अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक प्रदर्शन या धरना करना मौलिक अधिकार है, परंतु प्रदर्शनकारियों द्वारा अन्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण भी हमारे गणतंत्र की आधारशिला पर कुठाराघात है।
उल्लेखनीय है कि 1975 में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य भारतीय लोकतंत्र के स्याह पक्ष-आपातकाल- के दौरान संविधान में समाहित किए गए। पूर्व सोवियत संघ के संविधान से उक्त प्रावधान लिया गया था। अब तो श्रीलंका और नेपाल के संविधानों में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का विवरण है, हालांकि वे इतने व्यापक नहीं हैं।
दुनिया के कई अन्य देशों यथा जर्मनी, स्पेन, पुर्तगाल, दक्षिण कोरिया, इटली आदि के संविधान में भिन्न-भिन्न प्रकार के नागरिकों के मौलिक कर्तव्य समाविष्ट हैं। समाजवादी और सुल्तानशाही देशों के संविधानों में तो ये कर्तव्य सर्वत्र हैं। पाश्चात्य उदार लोकतांत्रिक देशों में विशेषकर अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, कनाडा आदि देशों के संविधानों में ऐसे प्रावधान नहीं हैं, परंतु वहां भी कई कानून एवं उद्घोषणाएं हैं, जो नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की ओर संकेत करते हैं, जैसे परिवार एवं वृद्ध माता-पिता की सेवा-सुश्रुषा। उन देशों में ऐसे कठोर कानून हैं, ताकि प्रदूषण फैलाने या ऐसे खतरनाक कृत्य जिससे नागरिकों को नुकसान हो या उनके मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण हो, रोका जा सके। यही कारण है कि उन परिपक्व गणतांत्रिक देशों में ‘कानून का राज’ वास्तविक मायनों में है, क्योंकि नागरिक प्रबुद्ध हैं, अपने कर्तव्यों का बेहतर निर्वहन करते हैं, सरकारें राजधर्म बखूबी निभाती हैं और न्याय प्रशासन प्रणाली स्वतंत्र और प्रभावी है।
भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में अपने अंतिम वक्तव्य में कहा था कि लोकतंत्र भारतीय जमीन पर एक ऊपरी परत है, अत: आवश्यकता है सांविधानिक नैतिकता को समृद्ध करने की। जहां संविधान में निहित राज्य के नीति-निर्देशक तत्व सरकार का राजधर्म सुस्पष्ट करते हैं, वहीं मौलिक कर्तव्य नागरिक धर्म के निर्वहन की कुंजी हैं। संविधान की उद्देशिका में व्यक्त प्रथम वाक्य ‘हम भारत के लोग’ स्पष्ट करता है कि यह संविधान भारत के लोगों द्वारा निर्मित और उन्हें ही आत्मार्पित है। अतः अधिकार और कर्तव्य और राजधर्म सहचर हैं, एक दूसरे के प्रतिपूरक हैं। अक्सर प्रश्न उठता है कि क्या राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों की तरह नागरिकों के मूल कर्तव्यों की अवहेलना होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। इस संबंध में संविधान में कोई प्रावधान तो नहीं है परंतु निःसंदेह भारतीय दंड संहिता और अन्य विभिन्न अधिनियमों में व्यवस्था है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रध्वज, राष्ट्रीय प्रतीकों का और सांस्कृतिक धरोहर का अपमान करता है, उन्हें नुकसान पहुंचाता है, तो वह दंड का भागी है।
राष्ट्रीय संपत्ति, पर्यावरण और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाना भी दंडनीय है। अपराधियों को न्यायोचित और अकारण विलंब के दंड मिले यह मुख्यतः न्यायपालिका का उत्तरदायित्व है, परंतु अपराध न्यूनतम हों, गणतंत्र सशक्त और समृद्ध हो, प्रत्येक नागरिक का ‘योग - क्षेम’ सुनिश्चित हो, यह निर्भर है सभी हितधारकों द्वारा सांविधानिक दायित्वों के निर्वहन पर।
-लेखक लोकसभा के सेवानिवृत्त अपर सचिव और संविधान तथा संसदीय विषयों के जानकार हैं।