हिमालयी क्षेत्रों में पीढ़ियों से रहते संवेदनशील जन समुदायों में यह चिंता व्याप्त हो रही है कि उनकी पर्वतीय विशिष्टता क्षरित होती जा रही है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारी जाना नहीं चाहते। लेकिन बाहरी लोगों द्वारा वहां जमीन-जायदाद खरीदने व व्यवसाय करके लाभ कमाने की होड़ लगी है। यहीं से स्थानीय जनों में असंतोष और आक्रोश पनपता है। नतीजतन हिमालयी राज्यों में यह मांग जोर पकड़ती जा रही है कि बाहरी लोगों के जमीन खरीदने पर रोक लगाई जाए। इसके संभावित सामाजिक, सांस्कृतिक व पर्यावरणीय कारकों की भी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। पहाड़ों में पलायन बढ़ने के साथ पारंपरिक ज्ञान का भी क्षरण हो रहा है।
वर्ष 2017 में हिमालयी विकास के राष्ट्रीय मिशन का विवरण देते हुए कहा गया था कि केंद्र के आठ मंत्रालय इसे अंजाम देंगे। इसके तहत आजीविका, खेती, विकास, दक्षता उन्नयन, जलवायु परिवर्तन, हिमालयी जैव विविधता डाटा बैंक निर्माम, ग्लेशियर व नदी संरक्षण तथा भूस्खलन रोकने पर काम होगा। राज्यों से परियोजनाएं मांगी जाएंगी और स्वीकृत योजनाओं के लिए धन आवंटित किए जाएंगे। ये सब काम पहले भी होते रहे हैं।
हिमालय के नाम पर पहले से ही आधे दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय व वैज्ञानिक संस्थानों में अध्ययन व शोध हो रहे हैं। लेकिन मुख्य विवेचन तो इसका होना चाहिए कि ग्राम सभाओं, जन विज्ञान संस्थानों की भागीदारी व जन ज्ञान के लाभ को लेकर कितनी योजनाएं बनाई गई हैं। केंद्र व राज्य सरकारों को बताना चाहिए कि सामाजिक संपदा कितनी बढ़ी, जन भागीदारी कितनी बढ़ी, नदियों का प्रदूषण कितना कम हुआ, जल स्रोतों व जंगल-जमीन का क्षरण कितना रुका, विकेंद्रित उद्यमिता से कितने परिवारों को लाभ हुआ और पलायन कितना रुका। इस समय पहाड़ों में जो पारिवारिक आर्थिक विकास हो रहा है, वह सरकार के कारण कम, व्यक्तिगत व सामाजिक संबंधों, संपर्कों व संदर्भों के कारण ज्यादा हुआ है।
नीति आयोग के लिए किए गए नवीनतम अध्ययनों में वाडिया हिमालय संस्थान ने पाया है कि हिमालयी राज्यों में 30 प्रतिशत जल स्रोत सूख गए हैं व 45 प्रतिशत सूखने के कगार पर हैं। ऐसे में वहां विस्थापन की समस्या बढ़ सकती है। भूस्खलनों के कारण विस्थापित होने वाले गांवों की संख्या अकेले उत्तराखंड में 400 से ऊपर पहुंच गई है। आज हिमालय के जल स्रोतों का संरक्षण सबसे बड़ी जरूरत है, जो केवल सघन वनीकरण से हल होने वाला नहीं है, क्योंकि सड़क निर्माण के दौरान होने वाले विस्फोटों से भूमिगत जलभंडारों को भारी नुकसान पहुंचा है। इसलिए घरेलू उपयोग, खेती, पशुपालन व जल स्रोंतो के रिचार्ज के लिए ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल संग्रहण जरूरी है। जंगल की आग से भी जल स्रोतों के कुप्रभावित होने की आशंकाएं रहती हैं। जो सैलनी या तीर्थयात्री हिमालय क्षेत्र में पहुंचते हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि हिमालय क्षेत्र में कूड़ा-कचरा न फैलाएं। जैसे गर्म होती धरती को बचाने के लिए हम कार्बन फुट प्रिंट का संदर्भ देते हैं, उसी तरह लोगों व सरकारों को इसका विश्लेषण करना चाहिए कि उनके कदमों व कर्मों के निशान से हिमालय क्षेत्र कितना आगे बढ़ा या कितना पीछे खिसक रहा है।
इन समस्याओं के समग्र समाधान के लिए एक युक्ति यह हो सकती है हिमालयी पारिस्थितिकी के अनुरूप वहां के बाशिंदों की जरूरतों एवं आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उपयुक्त टेक्नोलॉजी का निरंतर अन्वेषण एवं परिचालन हो। इससे पर्यावरणीय एवं सामाजिक असंतुलन के खतरों को भी कम किया जा सकेगा।
-लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व पर्यावरण वैज्ञानिक हैं।