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रेलवे को भी चाहिए पैसा

Tue, 26 Feb 2013 11:47 PM IST
अशोक भटनागर
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भारतीय रेल को व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त फंड की जरूरत हमेशा महसूस की जाती है। शायद इसलिए भी रेल मंत्री ने बजट भाषण में शुरू में ही जता दिया कि हमारे पास पर्याप्त फंड नहीं है, इसलिए रेल बजट में कम लक्ष्य नजर आए हैं। रेलवे बजट में एक लाख करोड़ रुपये का प्रस्ताव है, जबकि व्यय राशि तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
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जरूरत इस अंतर को नियोजित करने की है। इसकी वजह से ही भारतीय रेल अपनी तमाम सुविधाओं को उपलब्ध कराने में कहीं ठिठक जाती है। आज से नहीं, देश की आजादी के बाद से ही बजट में यात्रियों की सुविधा के लिए बात की जाती रही है, लेकिन रेलवे को बेहतर बनाने की दिशा में एक सीमा तक ही काम हो पाता है।

केंद्रीय मंत्री के बजट भाषण की दुखती रग यही है कि आखिर पैसा कहां से आए। भारतीय रेल अगर किराया बढ़ाए, माल वाहन का भाड़ा बढ़ाए तो जनता की नाराजगी झेलनी पड़ती है। और फिर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में एकाएक किराया बढ़ाकर लोगों को नाराज नहीं किया जा सकता है। लेकिन क्रमिक रूप से किराया बढ़ाने के साथ रेलवे ऐसे पहलुओं पर भी ध्यान दे सकता है, जहां से आमदनी के स्रोत बढ़ सकते हैं।
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मसलन, रेलवे उपकरण भी बनाता है, जिन्हें विश्व बाजार में लाया जा सकता है। इसके अलावा उसके पास खाली जमीन भी है, जिनका व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा सकता है। विज्ञापन और आमदनी के दूसरे स्रोत भी तलाशे जा सकते हैं। इन उपायों से उसे घाटा कम करने में मदद मिल सकती है। ऐसा भी नहीं कि रेलवे को बेहतर बनाने की दिशा में प्रयास ही नहीं हुए। बहुत कुछ हुआ है, लेकिन इसे और बेहतर बनाने के लिए पैसा चाहिए। रेलवे के संसाधन मजबूत होंगे, तो तमाम चीजें अपने आप ही व्यवस्थित होती चली जाएंगी।

जहां तक रेल में पानी, बिजली और सुरक्षा की बात है, तो देश में जिस स्तर पर लोग रेल में सफर करते हैं, उनके लिए पर्याप्त व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। डेनमार्क, नीदरलैंड और बेल्जियम की जितनी आबादी है, उससे ज्यादा लोग अकेले एक दिन में भारत की रेलों में सफर करते हैं। रेलवे अगर अपनी आय के स्रोत बढ़ाता है, तो उसे सबसे पहले यात्री सुविधाओं के साथ ही प्लेटफार्म को बेहतर बनाना चाहिए।

बेहतर का आशय केवल आधुनिकीकरण से नहीं है, बल्कि लोगों को बेहतर सुविधा प्रदान करने से है। इसके अलावा लेबल क्रॉसिंग पर भी ध्यान देना चाहिए। इन दो चीजों के लिए खासा पैसा चाहिए। हमारे देश की परिस्थितियों में 'ग्रेटेस्ट गुड फॉर ग्रेटेस्ट नंबर' का सिद्धांत ही अपनाया जाना चाहिए। यानी आप वह कीजिए, जिससे अधिक से अधिक लोगों को फायदा हो। इस नाते रेल मंत्री को ट्रेन, लोकल डब्बे, दूसरे दर्जे के सफर पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए था, लेकिन सच्चाई है कि यात्रियों को पूरी सुविधाएं नहीं मिल पातीं। इस बार शायद लोग सुरक्षा को लेकर संवेदनशील रहे होंगे, लेकिन बजट में इस बारे में कोई खास उल्लेख नहीं हुआ है। हेल्पलाइन नंबर जरूर दिया गया है, लेकिन जरूरत और बड़े प्रभावी सिस्टम की है।

भारतीय ट्रेन में फिर घाटे की बात कही जा रही है, लेकिन कुछ समय पहले हमें लाभ देने वाले चमत्कार तंत्र की तरह इसे देखा जा रहा था। भारतीय रेल वास्तव में चमत्कार कर सकती है। इसकी प्रक्रिया में काफी कुछ बदलाव की जरूरत है। इसे भारत की जीवनदायी रेखा कहा जाता है। इसके अंदर की जटिलताओं को दूर करने के लिए प्रयास होना चाहिए। यह भी अपेक्षा थी कि लोगों और रेल में सीधा संवाद हो।

यात्रियों को टिकट खरीदने के साथ सफर पूरा कराने तक रेलवे को एक बेहतर आयोजक की तरह प्रस्तुत होना चाहिए। रेलवे ने अपनी सीमाओं और संसाधनों में इस काम को कुछ हद तक किया भी है। रेलवे का पूरा तंत्र इसी बात पर जूझता है कि आखिर कैसे रेल के यात्रियों को एक व्यवस्थित सफर करने को मिले। रेलवे ने कई चीजों में सुधार भी किया है। कई चीजों में आधुनिक तंत्र की मदद से अपनी सेवाओं को व्यवस्थित किया है, लेकिन एकदम उलटफेर की कल्पना नहीं कर सकते।
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