इस बार का रेल बजट डेढ़ दशक से भी अधिक समय के बाद किसी कांग्रेसी नेता ने पेश किया, इसलिए उनसे यह उम्मीद थी कि वह बजट के माध्यम से आम आदमी का 'हाथ' थामने की कोशिश करेंगे, लेकिन विपक्ष के शोरगुल के बीच जब रेल मंत्री पवन बंसल ने बजट समाप्त किया, तो वह बहुत कुछ सामान्य ही दिखा। उसमें कुछ ऐसे खास कदम उठाने की बात नहीं है, जो रेल क्षमता बढ़ाने में मददगार हों।
यह निर्विवाद है कि रेल की सबसे बड़ी दिक्कत उसकी क्षमता को लेकर है। नई रेल लाइनों और फ्रेट कॉरिडोर की तरफ अगर ध्यान दिया जाता, तो निस्संदेह रेलवे की क्षमता में वृद्धि होती, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। हर बजट की तरह इस बार नई रेल लाइन को लेकर घोषणा तो की गई, लेकिन उसे किस तरह पूरा किया जाएगा, उसकी रूपरेखा बजट में नहीं खींची गई।
असल में रेल को महज एक परिवहन साधन की तरह देखने से सरकार को बचना चाहिए, और इसे राजनीति की दुधारू गाय नहीं बनाना चाहिए। यह देश की लाइफ लाइन है, और इसका विकास न सिर्फ देश और सरकार के लिए फायदेमंद है, बल्कि अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को भी इससे काफी लाभ है। लेकिन आजादी के बाद से ही हमारा ज्यादा जोर नई रेलगाड़ियां चलाने पर रहा, उसकी क्षमता बढ़ाने की तरफ हमने ध्यान नहीं दिया।
इस बार भी 100 के आसपास नई रेलगाड़ियां चलाने की घोषणा रेल मंत्री ने की है। हर वर्ष नई रेलगाड़ियां चलाने का ही नतीजा है कि भारतीय रेल का संचालन सालाना आठ से दस फीसदी की दर से बढ़ रहा है, जिससे रेलवे को थोड़ी-बहुत कमाई तो हो रही है, लेकिन इससे उसकी आधारभूत संरचना के विकास के लिए जरूरी संसाधनों की पूर्ति नहीं हो रही। इससे देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला यह क्षेत्र कई मोर्चों पर कमजोर होता जा रहा है।
विजन-2020 के अनुसार, रेलवे को विकास के लिए 10 साल में 14 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। यानी हर वर्ष उस पर 1.40 लाख करोड़ रुपये व्यय होते हैं। इन खर्चों में अत्याधुनिकीकरण, नई रेल लाइनों का विस्तार, यात्री सुविधाओं की बेहतरी, रेलवे कर्मचारियों का जीवन-यापन आदि शामिल है। लेकिन यात्री किराये और माल भाड़े से भारतीय रेल को करीब एक से सवा लाख करोड़ रुपये तक की ही कमाई हो रही है। ऐसे में उसका घाटे में जाना स्वाभाविक है।
इस बजट में भी करीब 25 हजार करोड़ रुपये के घाटे का आकलन किया गया है, जिसकी भरपाई परोक्ष रूप से रेल किराये बढ़ाकर की जा रही है। हालांकि बंसल साहब ने सीधे तौर पर किराया नहीं बढ़ाया, लेकिन ईंधन चार्ज और टिकटों पर अन्य सरचार्ज लगाकर उन्होंने लोगों की जेब हल्की जरूर की है।
हम रेल से सफर करने वाले यात्रियों को दो वर्गों में बांट सकते हैं। इसमें एक वर्ग यात्री सुविधा में विस्तार चाहता है। उसे अत्याधुनिक सुविधाएं चाहिए और इसके लिए वह अधिक रुपये देने को भी तैयार है, जबकि दूसरा वर्ग उन लोगों का है, जो सामान्य कोच में यात्रा करता है और रेलयात्रा के दौरान अपने लिए बुनियादी सुविधाओं की इच्छा रखता है। इन दोनों वर्गों की परेशानियों का अंत मात्र किराया बढ़ाने से नहीं हो सकता।
'अनुभूति' जैसे अत्याधुनिक कोच भी इन परेशानियों का अंत नहीं हैं। जब तक रेलवे की क्षमता में गुणोत्तर वृद्धि नहीं होगी, रेल यात्रियों की दिक्कतें दूर नहीं हो सकतीं। ऐसे में यह आकलन भी गलत है कि किराया बढ़ा देने से रेलवे अपना घाटा खत्म कर सकता है। यह उपाय रेलवे के घाटे को पाटने के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही है। इसे खत्म करने के लिए हमें इसकी बुनियादी संरचना की तरफ ध्यान देना होगा।
ऐसे में भारतीय रेल पटरी पर तभी लौटेगी, जब केंद्र सरकार का उसे साथ मिलेगा। हालांकि यह भी कहा जाता है कि रेलवे विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से भी मदद मांग सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि अगर सरकार इसे आर्थिक सहयोग देने के विषय में गंभीरता से सोचे, तो हालात बदल सकते हैं। इसकी मांग देश के विभिन्न कोनों से बराबर उठती भी रहती है।
नई रेल लाइनों का निर्माण अथवा रेलवे के अत्याधुनिकीकरण का जिम्मा अगर केंद्र सरकार उठा लेती है, तो रेलवे की कई मुश्किलों का अंत हो जाएगा। अगर संभव हो, तो रेलवे के विकास संबंधी कार्यों में रकम का बंटवारा 25 अनुपात 75 का हो, जिसमें केंद्र 75 फीसदी हिस्से का वहन कर ले। अगर ऐसा होता है, तो निस्संदेह रेलवे अपने घाटे को न सिर्फ जल्दी ही पाट लेगा, बल्कि उसकी क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
इसके अतिरिक्त बजट में मेट्रो रेल प्रोजेक्टों को लेकर भी ठोस बात नहीं हुई, जो फिलहाल शहरी विकास मंत्रालय के अधीन है। अभी देश के कई हिस्सों में मेट्रो कार्य प्रगति पर है और इन सभी कार्यों की निगरानी के लिए एक केंद्रीयकृत मेट्रो रेल प्राधिकरण की जरूरत है। चूंकि यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में है, इसलिए रेल मंत्री को इसके लिए बजट में अलग से प्रावधान करना चाहिए था। पवन बंसल ने हालांकि लोकलुभावन अथवा राजनीतिक बजट से बचने की जरूर कोशिश की है, लेकिन वह ऐसी बुनियाद रखने में भी पूरी तरह सफल होते नहीं दिख रहे, जिससे रेलवे आने वाले वर्षों में फायदे की पटरी पर दौड़ सके।