एक पश्तून परिवार में पले-बढ़े होने के कारण हमारी बातचीत की भाषा हमेशा पश्तो थी, हालांकि मेरे पिता अन्य मामलों में एक धर्मनिरपेक्ष पख्तून थे। हम दुनिया के चाहे किसी भी हिस्से में रह रहे हों, लेकिन जैसे ही अपने घर में प्रवेश करते थे, तो कोई दूसरी भाषा नहीं बोलते थे। बचपन की स्मृति याद दिला रही है कि पाकिस्तान में पश्तून को किस तरह चित्रित किया जाता था। पाकिस्तानी सिनेमा में हमेशा उन्हें एक अनपढ़ चौकीदार की भूमिका में पेश किया जाता था, और जैसे ही वे पश्तो उच्चारण के साथ उर्दू बोलने की कोशिश करते, उनका मजाक उड़ाया जाता। पश्तूनों का पाकिस्तान में हर जगह मजाक बनाया जाता था।
एक अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान में चार करोड़ पश्तून हैं, जो इस मुल्क की बीस करोड़ की आबादी का करीब बीस फीसदी हैं। दशकों बाद जब अफगान तालिबान परिदृश्य पर दिखाई दिए, तो जनजातीय इलाकों में रहने वाले हर पश्तून को संदेहपूर्वक तालिबान के रूप में देखा गया। जब कोई मामूली अपराध की घटना होती थी, तो अफगान शरणार्थियों के साथ रहने वाले पश्तूनों को भी पुलिस उठाकर ले जाती थी। संक्षेप में पाकिस्तान में पश्तूनों की छवि एक नाराज और हिंसक व्यक्ति की थी, जो बंदूक उठाने के लिए तैयार रहता था।
किसी न किसी प्रकार से पश्तूनों के इतिहास को भुला दिया गया। सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां के अतीत को भुला दिया गया, जो तब पाकिस्तान के एक प्रांत में रह रहे थे, जब विभाजन के दौरान सभी गैर-मुस्लिम ट्रेन से भारत जाने के लिए सुरक्षित रूप से पंजाब जा रहे थे। किसी भी गैर-मुस्लिम का बाल तक बांका नहीं हुआ था। नरसंहार पंजाब में हुआ था। पख्तून खुदाई खिदमतगार और अंग्रेजों के खिलाफ उनके शांतिपूर्ण प्रतिरोध को कौन भूल सकता है? आज, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नाराज पख्तून की उस छवि को पाकिस्तान में फिर से देखा जा सकता है।
एक नया आंदोलन पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम-पश्तून संरक्षण आंदोलन) उभरा है। जहां पूरे पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं काबुल में सहानुभूति मार्च निकाला गया है और राष्ट्रपति गनी भी पश्तूनों के अधिकारों की लड़ाई के समर्थक हैं। इस हफ्ते पाकिस्तान में सैकड़ों सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं के समर्थकों और विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने जनजातीय इलाकों में पीटीएम नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ लाहौर में प्रदर्शन किया और उत्पीड़न समाप्त करने की मांग की। विरोध प्रदर्शन कई शहरों में हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि आगामी कुछ महीनों में मुल्क में आम चुनाव होने वाले हैं, लेकिन पख्तूनख्वा की कोई भी पारंपरिक राजनीतिक पार्टी पीटीएम के प्रति सहानुभूति नहीं दिखा रही है। पिछले चुनाव के दौरान कई पार्टियों को पाकिस्तान तालिबान ने आतंकित कर दिया था और वे चुनाव प्रचार के लिए नहीं निकल सके थे। इस बार सत्ता प्रतिष्ठान का डर इन्हें पीटीएम के प्रति समर्थन जताने से रोक रहा है। अवामी नेशनल पार्टी, कौमी वतन पार्टी और यहां तक कि पख्तूनख्वा की कई दक्षिणपंथी पार्टियां सब कुछ चुपचाप देख रही हैं, क्योंकि उन्हें सिर्फ सत्ता प्रतिष्ठान का ही डर नहीं है, बल्कि वे पीटीएम की बढ़ती लोकप्रियता से भी घबराए हुए हैं, क्योंकि अगर उसने चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारना शुरू किया, तो वे महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं।
इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से सत्ता प्रतिष्ठान हैरान है, जो केवल अपने अधिकारों को दर्ज करा रहे हैं, जिनमें लोगों को जबरन गुमशुदगी खत्म करने और फर्जी पुलिस मुठभेड़ रोकने की मांग शामिल है। पख्तूनों के समर्थन में पंजाब की सिविल सोसाइटी से आवाज उठ रही है, जो कहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ पीटीएम के रुख की प्रशंसा करने के बजाय सरकार हाशिये के समुदायों की आवाज उठाने के चलते इसके नेताओं की गिरफ्तारी कर रही है। पीटीएम के एक सदस्य कहते हैं, ‘हमें कहा जाता है कि हम बहादुर हैं, क्योंकि हमने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में बलिदान किया है, लेकिन हमने इस युद्ध में तब बलिदान किया, जब हमसे बलिदान करने के लिए कहा नहीं गया।’
पश्तून आंदोलन के नेता छब्बीस वर्षीय मंजूर पश्तीन हैं, जो जनजातीय इलाके के वेटनरी छात्र हैं। उनके उदय को एक नए सीमांत गांधी के रूप में देखा जा रहा है। वह कहते हैं, 'हम अहिंसा में यकीन करते हैं, न तो हम आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हैं और न ही हिंसा का हमारा इरादा है। अब यह सरकार पर है कि वह हमें अपने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के हक का इस्तेमाल करने देती है या हमारे खिलाफ हिंसक तरीका अपनाती है।'
पश्तीन दक्षिण वजीरिस्तान से ताल्लुक रखते हैं, जो पश्तून बहुल संघ प्रशासित जनजातीय इलाके (फाटा) का हिस्सा है। पीटीएम एक महीने पहले तब सुर्खियों में आया था, जब जनजातीय इलाके के हजारों लोगों का नेतृत्व करते हुए कराची में एक युवा पश्तून की सिंध पुलिस द्वारा हत्या का विरोध करते हुए वे इस्लामाबाद पहुंचे थे। तब से जनजातीय इलाकों-खैबर पख्तूनख्वा, पड़ोस के बलूचिस्तान प्रांत में रैलियां हो रही हैं, जिनमें दसियों हजार लोग पहुंच रहे हैं। पश्तीन कहते हैं कि 'सरकार गंभीर नहीं है। हमने अधिकारियों को सूचित किया कि सेना और खुफिया एजेंसी के कुछ लोग हमारे लोगों को आतंकित कर रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के बजाय सरकार और उसकी एजेंसियां हमारे खिलाफ मामला दर्ज कर रही है।'
एक पूर्व सांसद और विश्लेषक ने मीडिया को बताया कि 'पश्तीन के प्रयासों ने एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन को जन्म दिया है, जो राजनीतिक दलों से आगे निकल गया है।' वह कहते हैं कि 'पारंपरिक जनजातीय ढांचे को इस क्षेत्र में हिंसा के जरिये खत्म कर दिया गया है। बहुत से स्थानीय नेताओं को मार दिया गया है और कई अन्य विस्थापित हो गए हैं। मंजूर पश्तीन जैसे युवा कार्यकर्ता इस शून्य को भर रहे हैं।'