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सिर्फ मशीन ही काफी नहीं

Wed, 05 Feb 2014 01:05 AM IST
डेविड ब्रुक्स
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हम उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी के दौर से गुजर रहे हैं। बात चाहे बगैर चालक की कारों के नियंत्रण की हो या शतरंज जैसे खेलों में इन्सान को मात देने की, कंप्यूटर पहले ही अपनी योग्यता साबित कर चुका है। मेसाच्यूसेट इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एरिक ब्रिजोफ्सन और एंड्रयू मैक्फी की किताब दि सेकेंड मशीन एज कंप्यूटर के इसी महत्व की तस्दीक करती है। इस किताब के मुताबिक, उपयुक्त निवेश संबंधी फैसले, रोगों की पहचान और अपराधियों को जमानत देने संबंधी कार्यों में भी आज कंप्यूटर की भूमिका बढ़ती दिख रही है।
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लेकिन इस स्थिति ने कई आशंकाओं को भी जन्म दिया है। कंप्यूटर की वजह से कई तरह के मानसिक कौशलों की मांग घटने लगेगी। याद्दाश्त अच्छी होने का गुण भी अपना महत्व खोने लगेगा। इतना ही नहीं, परीक्षाओं में अव्वल आने वाले और ज्ञान का भंडार माने जाने वाले कई विद्यार्थियों के प्रति लोगों का नजरिया भी बदलेगा। कुल मिलाकर निश्चित नियमों का पालन करते हुए की गई किसी भी मानसिक गतिविधि का मूल्य नहीं होगा।

फिर ऐसे कौन से मानवीय कौशल हैं, जिनकी पूछ बढ़ेगी? खबरों की दुनिया में ऐसे कौशल पहले से मौजूद हैं। चाहे फर्राटा दौड़ में माहिर धावकों की तरह खबर को पहचान कर तुरंत उसे ट्वीट करने की योग्यता रखने वाले हों या फिर मैराथन में हिस्सा लेने वाले धावकों जैसे गहराई में जाकर लंबी खबर लिखने वाले हों, तकनीक की प्रगति से दोनों को फायदा पहुंचा है। लेकिन इससे नुकसान पहुंचा है उन मध्यम दूरी के धावकों को, जो एक दिन पहले हुई प्रेस कांफ्रेंस से संबंधित बासी खबर लिखते हैं। ग्राफिक का काम करने वालों को भी तकनीक की उन्नति से फायदा पहुंचा है। मगर जो लोग अपनी लिखित रिपोर्ट्स का दृश्यांकन नहीं कर सकते उन्हें नुकसान हुआ है।
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हालांकि उत्कृष्ट मशीनी युग की अपनी विलक्षणता है। यह लोगों को उत्साही बनाता है। इसके जरिये अनंत ज्ञान के दरवाजे हमारे सामने खुल जाते हैं। लोगों में मौजूद ज्ञान की भूख को मिटाने का यह एक जरिया है। लेकिन यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह इस भूख को शांत करने के लिए जानकारियों के इस महासागर का उपयोग कैसे करता है।

क्लाइव थॉम्पसन अपनी किताब स्मार्टर देन यू थिंक में देब रॉय नाम के सज्जन का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने अपने घर में वैज्ञानिक उपकरणों का जाल बिछा रखा था, ताकि अपनी टीम के साथ वह अपने पुत्र के बोलना सीखने की प्रक्रिया समझ सकें। भाषा सीखने की प्रक्रिया को जानने की यह अद्भुत कोशिश थी। इसके अलावा समय और रणनीतिक अनुशासन के मद्देनजर भी इस तकनीकी युग के फायदे हैं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। विख्यात शतरंज खिलाड़ी गैरी कॉस्परोव एक बार फ्री-स्टाइल शतरंज प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे थे। उसमें उन्हें एक कंप्यूटर के साथ जोड़ी बनाकर खेलना था। उनके सामने भी एक खिलाड़ी और कंप्यूटर की जोड़ी थी। उस दौरान कॉस्परोव ने महसूस किया कि तेजी और तीक्ष्णता के मामले में उनकी सहयोगी मशीन उनसे कहीं आगे थी, पर इस तेजी का उपयोग किस दिशा में किया जाए, यह समझ उनमें (कॉस्परोव) कहीं ज्यादा थी।

इसे समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। एक कंप्यूटर अनगिनत गणनाएं कर सकता है, लेकिन इन गणनाओं का किस दिशा में उपयोग करना है, ऐसी समग्र सोच मनुष्य के पास ही हो सकती है। दरअसल ऑनलाइन की यह दुनिया बेशक ज्ञान का भंडार है, लेकिन इसमें उलझनें भी कम नहीं हैं। वह व्यक्ति, जो अपने उद्देश्य को लेकर निश्चित नहीं है, उसके लिए कंप्यूटर की दुनिया भ्रमों से भरपूर है। लेकिन इसके उलट, जिसकी निगाह हमेशा अपने लक्ष्य पर है, और जिसमें अपने लिए उपयोगी जानकारी को छांटने का नीर-क्षीर विवेक है, उसके लिए तकनीकी प्रगति एक वरदान है।

इसके अलावा यह भी समझना होगा कि इंटरनेट क्षेत्र केवल एक ढांचे का प्रतिनिधित्व करता है। फिर चाहे वह फेसबुक हो, ट्वीटर या फिर विकिपीडिया। इंटरनेट जगत की ये दिग्गज कंपनियां ढांचा उपलब्ध कराती हैं। इन्हें विचारों से समृद्ध करने का कार्य दूसरे लोग करते हैं। जो यह कार्य रचनात्मक ढंग से कर सकें, उनके लिए इंटरनेट तकनीक जगत का एक तोहफा है। यह ढांचा न केवल सूचनाओं के केंद्र की भूमिका निभाता है, बल्कि अलग-अलग अपनी डफली बजाने वालों को भी यह एक संयुक्त मंच प्रदान करता है।

जो सोच इस मंच को सबसे अद्भुत बनाती है, वह यह है कि औपचारिक ढंग से बनाए गए समूह की सोच सबसे रचनात्मक हो, यह जरूरी नहीं, बजाय इसके कि बिखरे हुए स्रोतों से छनकर आने वाले विचार ज्यादा रचनात्मक साबित हो सकते हैं। दरअसल यह मंच लोगों को यह सुविधा प्रदान करता है कि अकेले में भली-भांति विचार कर अपनी सोच को समूह के सामने पेश किया जाए। ऐसे में कहा जा सकता है कि एक स्पष्ट सवाल के चारों ओर विकेंद्रित सोच के जाल को खड़ा करने की जिसमें कुव्वत हो, उसके लिए इंटरनेट लाभकारी है।

रचनात्मकता के दृष्टिकोण से देखें, तो कंप्यूटर क्रांति मनुष्य की सभ्यता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। रचनात्मकता का मतलब ही है कि विभिन्न विचारों के सार को मिलाकर एक नए विचार का सृजन किया जाए। 1950 के दशक में नौकरशाही वह भूमिका निभा रही थी, जो आज कंप्यूटर की है। सूचनाओं को परिष्कृत करने का काम नौकरशाह ही कर रहे थे, लेकिन आज इसके लिए कंप्यूटर है। यहां यह समझना भूल होगी कि इससे मानवीय प्रयासों की भूमिका सीमित हुई है। इसमें संदेह नहीं कि इंटरनेट क्रांति ने मनुष्य को भावनात्मक फायदा पहुंचाया है, पर अब भी यह केवल एक उपयोगी सहयोगी है, जिसकी डोर मानवीय विवेक के हाथ में है।
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