तीस जुलाई, 2019 को भारत की संसद ने तीन तलाक के खिलाफ कानून पास करके इसे दंडनीय अपराध बनाया था। इसे एक अगस्त से लागू भी कर दिया गया था। अब इस कानून को लागू हुए एक साल होने को है। एक टीवी बहस में भाग लेते हुए भाजपा नेता और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि तीन तलाक कानून लागू होने के बाद ऐसे मामलों में बयासी प्रतिशत की कमी आई है। अगर ऐसे मामले सामने आए भी हैं, तो वहां कानून ने अपना काम किया है। इसलिए एक अगस्त को मुस्लिम महिला अधिकार दिवस मनाया जाना चाहिए। अव्वल तो मुस्लिम महिलाओं की तीन तलाक से जुड़ी परेशानियों पर अक्सर राजनीतिक दल बात नहीं करते हैं।
उन्हें लगता है कि जैसे ही वे इस मुद्दे को उठाएंगे, उन्हें वोट नहीं मिलेंगे। राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों, संगठनों को अक्सर महिला सशक्तीकरण की चिंता सताती रहती है। वे अपने-अपने मेनिफेस्टो में इसका जिक्र भी करते हैं, लेकिन सवाल है कि इतनी बड़ी तादाद में परेशान हमारी मुस्लिम औरतों के दुख उन्हें क्यों नहीं दिखते। यहां तक कि बहुत से पढ़े-लिखे लोग भी इस मसले पर यह कहकर बचने की कोशिश करते हैं कि यह उनका निजी मामला है। वे इसे खुद तय करें। इस तरह तो हर कोई अपने निजी मामलों की दुहाई देकर किसी भी कानून को मानने से इन्कार कर सकता है। जबकि बाईस मुस्लिम देशों ने तीन तलाक को समाप्त कर दिया है।
कानून बनने से पहले कमाल फारूकी (जो मुस्लिम विद्वान माने जाते हैं) ने कहा कि एक मामले के लिए इस्लाम के कानून को नहीं बदलना चाहिए। आज औरतें तीन तलाक को खत्म करने की मांग कर रही हैं, कल को जमीन-जायदाद में हिस्सा मांगेंगी। अगर औरतें जमीन-जायदाद में हिस्सा मांगें भी तो क्या गलत है? अपनी ही औरतों को तमाम अधिकारों से वंचित करने से कौन-सा ईश्वर या अल्लाह खुश हो सकता है!
तीन तलाक का मसला उत्तराखंड की सायरा के कारण बहस का विषय बना था। उसे ससुराल में तरह-तरह के अत्याचार सहने पड़े। उसकी इच्छा के बगैर पति ने कई बार उसका गर्भपात कराया। इस्लाम में दहेज की मनाही के बावजूद, दहेज मांगा गया। पर सायरा चुप रही, क्योंकि वह हर हाल में अपनी शादी को बचाना चाहती थी। पति उसे अक्सर तलाक की धमकी देता था। एक बार जब वह अपने मायके गई थी, तो उसके पति ने प्रॉपर्टी के कागजात के नाम पर तलाक के कागजात भिजवा दिए। कोई और रास्ता न देखकर, उसने अदालत की शरण ली, जहां सायरा के पक्ष में फैसला सुनाया गया। पर उसके पति ने कहा कि इन मामलों में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती, यह धर्म का मामला है।
कई दशक पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सईदा हमीद ने मुस्लिम औरतों की हालत पर आयोग के लिए एक रिपोर्ट तैयार की थी- वॉयस ऑफ द वॉयसलेस। देश भर की मुस्लिम औरतों से बात कर यह रिपोर्ट तैयार की गई थी। इसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते थे। उनके पतियों ने उन्हें तलाक दे दिया था। उन्होंने दूसरी शादियां कर ली थीं। ये औरतें बीमार थीं, रोजगार का कोई साधन नहीं था, फिर भी बच्चों को पालने के लिए मजबूर थीं।
जब सरकार ने तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया, तो बहुत-सी मुस्लिम महिलाएं खुशी में मिठाई बांटते दिखी थीं। तीन तलाक पुरुष वर्चस्व की ही निशानी थी, जिसे धर्म के नाम पर डराकर कभी चुनौती देने की कोशिश नहीं की गई थी। कई मुस्लिम पुरुष भी तीन तलाक के खिलाफ कानून से खुश हुए। जिनके घर की बहनों, बेटियों को तीन तलाक की मुश्किलों से गुजरना पड़ा था, वे इससे खुश थे। अब कम से कम आने वाली पीढ़ी की बेटियों को यह डर नहीं सताएगा कि उन्हें बिना कारण तलाक दिया जा सकता है।
जिन लोगों को महिलाओं के अधिकारों की चिंता है, उन्हें इस मसले पर चुप नहीं रहना चाहिए था। मगर उन्होंने खामोश रहना उचित समझा। महिला सशक्तीकरण क्या इसी तरह हो सकता है कि एक समुदाय की औरतों की मुसीबतों से आंखें फेर ली जाएं। एक अगस्त को मुस्लिम महिलाओं के अधिकार दिवस को मनाने की घोषणा सरकार को शीघ्र करनी चाहिए।