लालू जी राजनीतिक प्रहसन के विदूषक वर्ग में बेनी बाबू से बेहतर राजनेता हैं। पिछले दिनों वह फिर से जेल में वक्त काटकर जमानत पर बाहर आए हैं। जेलखाने से निकल जनता के बीच आते ही उन्होंने सगर्व घोषित किया कि वह यदुवंश-शिरोमणि, भगवान श्रीकृष्ण के जन्मगृह, कारागार, से अवतरित हुए हैं और उन्हें राज्य के हर क्षेत्र में कंस ही कंस नजर आ रहे हैं। कंस बिरादरी का सफाया करना उनका आनुवांशिक दायित्व है।
वह ठीक कह रहे हैं। चारा घोटाले को तो यों ही बदनाम किया गया है। यशोदानंदन कृष्ण क्या कम नटखट थे? माखन चुराने और माखन खाकर मुकर जाने को सिर्फ बाललीला नहीं कह सकते। माखन का स्रोत दुधारु गाएं होती हैं। वे चारा खाती हैं, फिर दूध देती हैं। ऐसे में सिर्फ लालू जी पर निशाना क्यों? और लालू जी के जेल से बाहर आने पर कुछ स्वघोषित ईमानदार किस्म के लोग नाराज क्यों हो गए हैं?
लालू जी लोगों के मनोरंजन का विषय बने हैं, तो अच्छा ही है। इससे व्यंग्यकारों को विषय मिल जाता है, तो कार्टूनिस्टों को मसखरी वाले रेखांकनों का मसाला और टेलीविजन चैनलों को टीआरपी बढ़ने से चैन मिल जाता है। लालू जी खबरीले नेता बनने के वास्ते कैसा भी पहनावा शिरोधार्य कर लेते हैं। कभी चश्मे की लंबी चेन का कंठहार, तो कभी सिर पर अंगोछे का मुरैठा, तो कभी पसलियों पर घर की सिली गंजी और कमर में तहमद, तो कभी पायजामा। सर्दी में सिर पर फरदार टोपी, कंधे पर लोई, तो कभी रंगीन आड़ी धारियों वाला युवकोचित स्वेटर। होठों के बीच वह खैनी दबा लेते हैं, तो कभी पान के जोड़ा बीड़ों से गाल फुलाए दिख जाते हैं।
लालू जी जानते हैं कि भ्रष्टाचार के कारण उनकी छवि कितनी भी खराब हो, राजनीति को उनकी जरूरत है। वह इतने धार्मिक हैं कि छठ पर, पत्नी के साथ पर्व में भाग लेते दिखते हैं। त्योहारों पर कुर्ते की लंबी आस्तीन के मुहाने से झांकती कलाई पर लाल-पीला कलावा बंधवाते हैं, माथे पर रोली का अंगूठेदार टीका ठुकवाते हैं। होली के समय बिंदास होकर कुर्ताफाड़ होली खेलते हैं। इसी तरह चुनावी मौके पर जिन्ना कैप शिरोधार्य कर पक्के मुसलमान बन जाते हैं। मुजफ्फरनगर के शिविरों में दंगा प्रभावितों को कह आते हैं कि जेल में होने के कारण वह उनकी मुश्किलें दूर करने नहीं आ सके! सचमुच उनके जैसा कोई नहीं है।