दूसरी बात, संख्याबल के खेल ने खुद को दोहराया है, जिसमें सिद्धांतों के लिए कोई जगह नहीं है। नेपाल के लोग राजशाही से लेकर म्यूजिकल चेयर का खेल खेलने वाले राजनेताओं के बीच फंसकर रह गए हैं। नेपाली कांग्रेस के प्रमुख देउबा पांच बार और ओली दो बार प्रधानमंत्री बने हैं, जबकि प्रचंड का यह तीसरा कार्यकाल चल रहा है।
तीसरी बात, जैसा कि एक समय दुनिया भर के समाजवादियों के लिए कहा गया था, वह नेपाली कम्युनिस्टों पर भी सटीक बैठता है कि वे कुछ समय के बाद साथ नहीं रह सकते और ज्यादा दिनों तक अलग भी नहीं रह सकते। विरोधी खेमे के प्रतिद्वंद्वी माओवादी, कम्युनिस्ट एवं समाजवादी अब नए सहयोगी बन गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नेपाली कांग्रेस सिर्फ नेपाल ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभुत्व और सीपीएन-यूएमएल के प्रमुख केपी शर्मा ओली के कदमों से बेखबर थी? इसके अलावा, नेपाली कांग्रेस कुछ मंत्री पदों को लेकर प्रचंड के साथ अपने बढ़ते मतभेदों को दूर करने में क्यों असमर्थ रही?
चौथी बात, जो महत्वपूर्ण है, वह यह कि जिस तरह पाकिस्तान में पर्दे के पीछे सरकार गठन में सेना प्रेरक की भूमिका में थी, क्या नेपाल को वह प्रेरणा चीन से मिली थी? सत्ता से बेदखल हुई नेपाली कांग्रेस ने तो नेपाल के वामपंथियों के बीच सुलह कराने के पीछे चीन के हाथ होने का संकेत दिया ही है। नेपाल में चीन के बेल्ट ऐंड रोड पहल की गति को भी एक कारक के रूप में देखा जाता है।
नेपाल में इस तरह के कई बदलाव हुए हैं और नेपाल का नवीनतम सियासी घटनाक्रम इन सभी कारकों का संयोजन प्रतीत होता है। पुष्प कमल दहल प्रचंड ने, जो दिसंबर, 2022 में ओली के सीपीएन-यूएमएल के समर्थन से प्रधानमंत्री बने थे, कुछ ही महीनों के बाद ओली के साथ गठबंधन तोड़कर नेपाली कांग्रेस से हाथ मिला लिया था। इस बार, कुछ परियोजनाओं के लिए बजट आवंटन के मुद्दे पर माओवादी सेंटर और नेपाली कांग्रेस के नेता और वित्त मंत्री महत और प्रचंड के बीच मतभेद बढ़ गए।
इसके अलावा, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष देउबा चाहते थे कि उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता और नवनिर्वाचित विधायक कृष्णा सितौला को नेशनल एसेंबली का अध्यक्ष बनाया जाए, जबकि प्रचंड अपनी पार्टी के सदस्य को इस पर रखना चाहते थे। लगता है कि ओली ने इसी मतभेद का फायदा उठाया। अपने नए स्वरूप में यह सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चलने वाली है। मौजूदा संसद का कार्यकाल अब मात्र तीन वर्ष बचा है। पिछले चुनाव में त्रिशंकु सदन की स्थिति में सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई और लगातार राजनीतिक अस्थिरता बनी रही।
जहां तक चीन का सवाल है, उसने उसी दिन तुरंत अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, 'बीजिंग नई सरकार के साथ काम करने को इच्छुक है...हमें उम्मीद है कि नेपाल में सभी दल एकजुट होंगे और नई सरकार के गठन, राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक विकास और लोगों की आजीविका में सुधार से संबंधित कार्यों को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिए सहयोग करेंगे।'
नेपाल के दूसरे बड़े पड़ोसी भारत ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। नेपाल का घटनाक्रम तब सामने आया है, जब भारत हिंद महासागर में मालदीव के सख्त रवैये से जूझ रहा है। नेपाल में हुआ बदलाव बिल्कुल आश्चर्यजनक या अचानक नहीं है। नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की पार्टी माओवादी सेंटर के बीच लंबे समय से मंत्रिमंडल में फेरबदल और नेशनल एसेंबली के अध्यक्ष पद को लेकर मतभेद गहरा रहे थे। प्रधानमंत्री प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के प्रति नाराजगी जताते हुए कहा था कि नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष देउबा अच्छा प्रदर्शन न करने वाले मंत्रियों को बदलने की उनकी योजना में सहयोग नहीं कर रहे हैं।
जहां तक नेपाल के साथ भारत के संबंधों की बात है, दोनों देशों द्वारा दीर्घकालिक बिजली साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने बाद भी दोनों पक्ष ऐतिहासिक पंचेश्वर बहुद्देशीय परियोजना (पीएमपी) पर रुकी हुई बातचीत को आगे बढ़ाने में विफल रहे हैं। पिछले महीने भारतीय विदेश सचिव विनय मोह क्वात्रा अपने नेपाली समकक्ष सेवा लम्सल से काठमांडू में मुलाकात के बाद एक प्रेस नोट जारी करते हुए बताया था कि दोनों पक्षों ने बहुआयामी सहयोग पर चर्चा की। हालांकि उसमें पीएमपी का कोई संदर्भ नहीं था, जो दोनों पक्षों के बीच अब तक की सबसे बड़ी द्विपक्षीय बिजली परियोजना है।
आगे की द्विपक्षीय वार्ता से भी कोई मदद नहीं मिली। नेपाल के विदेश मंत्री एनपी सऊद ने रायसीना डायलॉग में हिस्सा लिया और वह अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन में भी पहुंचे थे। इस तरह की भागदारी के साथ सदियों पुरानी सांस्कृतिक निकटता भी कूटनीति में मददगार साबित नहीं हुई। भारत भी नेपाल से और अधिक बिजली खरीदने के लिए तैयार नहीं है। रिपोर्टों से पता चलता है कि दोनों पक्ष लाभ के बंटवारे पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं, इसलिए परियोजना रुकी हुई है।
हालांकि बिजली समान रूप से बांटी जाती है, लेकिन भारत को सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण में बड़ा लाभ मिलता है। दूसरी तरफ नेपाल पानी को 'सफेद सोना' समझता है और चाहता है कि इसके लिए भारत उसे भुगतान करे। भारत इस दावे को स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि यह अन्य जल संधियों की भारतीय अवधारणा को चुनौती देता है। नेपाल पर नजर रखने वाले पर्यवेक्षकों का कहना है कि भारत को नेपालियों को संतोषजनक मुआवजा देने का कोई रास्ता खोजना चाहिए।
दो बड़े पड़ोसियों से सुरक्षित दूरी बनाकर रखने के लिए प्रतिबद्ध नेपाल के पास घरेलू सियासी उथल-पुथल को नियंत्रित रखने के अलावा कोई चारा नहीं है।