ऐसा ही एक प्रयास ललितपुर जिले, तालबेहट प्रखंड (उत्तर प्रदेश) के तेरई गांव में देखा जा सकता है। यहां भुनिया देवी और पजन लाल कुशवाहा के परिवार के पास मात्र सवा दो एकड़ भूमि है, जिसके अधिकांश हिस्से पर इनका पूरा परिवार प्राकृतिक खेती कर रहा है। शेष भूमि पर भी वे शीघ्र ही प्राकृतिक खेती करेंगे। इस तरह रासायनिक खाद व कीटनाशक आदि पर होने वाला खर्च उन्होंने बचा लिया है। गोबर की खाद व गोमूत्र, जैविक कीटनाशक आदि का उपयोग करके उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि उत्पादन पहले के मुकाबले बेहतर हो। मक्के के साथ वे बैंगन, रतालू, अदरक, खीरा, फलों आदि की मिश्रित खेती करते हैं।
खेत के शेष 300 वर्ग मीटर क्षेत्र में वे बहुस्तरीय पद्धति से सब्जी व कुछ फलों उत्पादन कर रहे हैं। बांस, तारें, फैंसिंग आदि लगाकर ऊपर में तुरई, खीरा, लौकी आदि की फसले लेते हैं, और जमीन की सतह पर टमाटर, मिर्ची, धनिया आदि तथा तीसरे स्तर पर जमीन के भीतर उगने वाली फसलें जैसे, मूली, गाजर, प्याज, हल्दी, अदरक, अरबी, रतालू आदि की खेती करते हैं। इसके आसपास उन्होंने मेड़ पर नींबू, अमरूद, आम, पपीता व कटहल के पेड़ भी लगाए हैं। इस तरह एक तरफ जहां उन्होंने अपने घर की पोषण व्यवस्था को मजबूत किया है, वहीं नकद आमदनी भी सुनिश्चित की है।
प्राकृतिक खेती से उपजे फल व सब्जी की बाजार में अच्छी मांग रहती है व सही मूल्य मिलता है। खेती के साथ पशुपालन करके वे परिवार के बेहतर पोषण के साथ लगभग डेढ़-दो लाख रुपये की वार्षिक आय भी प्राप्त करते हैं।
पजन लाल की सफलता को देख उनके तीन भाइयों ने भी प्राकृतिक खेती शुरू की है। छोटे भाई जगदीश के खेत का एक हिस्सा अनुपजाऊ था, जहां की मिट्टी में न के बराबर फसल होती थी। पर गोबर व गोमूत्र की खाद में कुछ बेसन, गुड़ आदि मिलाकर इस भूमि को पोषित किया, तो इस पर भी हरी-भरी फसल लहलहाने लगी।
कोमल प्रसाद अहरवार के पास भी इतनी ही कम जमीन है, पर उन्होंने भी ऐसे ही भूमि के बेहतर उपयोग व विविध फसलों के उत्पादन से पोषण व आय बढ़ाई है। इसके अतिरिक्त वह बकरी पालन से भी कमाते हैं। उनकी पत्नी शीला प्राकृतिक खेती केंद्र का संचालन करती हैं।
तेरई गांव के कई किसान बताते हैं कि प्राकृतिक खेती अपनाने से खेत में फिर अधिक संख्या में केंचुए नजर आने लगे हैं, जो मिट्टी को नम रखते हैं और उसे भुरभुरा बनाते हैं। इसी तरह किसानों के मित्र अन्य जीव भी बढ़ रहे हैं। यहां प्राकृतिक खेती को बढ़ाने में सृजन व कार्ड संस्थाओं ने बिवाल प्रोजेक्ट के तहत महत्वपूर्ण योगदान दिया। पहले 10 प्रमुख किसानों ने पूर्ण या आंशिक तौर पर प्राकृतिक खेती को अपनाया। जब अन्य किसानों ने देखा कि प्राकृतिक खेती से कम खर्च में अच्छा उत्पादन हो रहा है, तो वे भी इसे बड़ी संख्या में अपनाने लगे।
तेरई जैसे गांव में सिंचाई की स्थिति अच्छी है, पर जिन गांवों में सिंचाई की स्थिति कमजोर है, वहां इन संस्थाओं ने जल-संरक्षण उपायों से प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए अनुकूल स्थितियां उपलब्ध कराईं। प्राकृतिक नालों में ‘दोहा’ विधि के गड्ढा बनाकर जल-संरक्षण बढ़ाया गया व इससे कुओं का जल स्तर भी बढ़ा। तालाबों से मिट्टी हटाकर उसकी जल-संरक्षण क्षमता बढ़ाई गई, जबकि हटाई गई मिट्टी-गाद खेतों में डलने से खेतों की उर्वराशक्ति बढ़ी।
हमारे देश के छोटे किसान अगर अपनी छोटी जोत के बेहतर उपयोग से खुशहाली हासिल कर रहे हैं, तो यह बहुत आशाजनक खबर है। प्राकृतिक खेती अपनाने से मिट्टी, जल और पर्यावरण में सुधार तो हो ही रहा है, आजीविकाएं भी मजबूत हो रही हैं। यह एक टिकाऊ सुधार है, जिससे न केवल ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों की प्रतिकूल मौसम का सामना करने की क्षमता भी बढ़ती है।