एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच बहस छिड़ गई कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। समाधान न निकलने पर भगवान शिव को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने स्वयं को एक विशाल अग्नि-स्तंभ में परिवर्तित कर लिया। उन्होंने ब्रह्मा व विष्णु से कहा कि स्तंभ के छोर का पता लगाने में जो सफल होगा, वही विजयी माना जाएगा।
विष्णु वराह का रूप धारण करके अग्नि-स्तंभ का निचला छोर खोजने निकले और ब्रह्मा ने स्वयं को हंस में परिवर्तित करके अग्नि-स्तंभ का शीर्ष खोजने के लिए ऊपर की दिशा में उड़ान भरी। कुछ समय बाद विष्णु ने लौटकर बताया कि उन्हें स्तंभ का छोर नहीं मिल पाया। तभी ब्रह्मा भी आ गए। परंतु उन्होंने शिव से झूठ बोला और कह दिया कि उन्होंने स्तंभ के ऊपरी छोर का पता लगा लिया। शिव ने प्रमाण मांगा, तो ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प को साक्षी बनाकर प्रस्तुत किया। पुष्प ने भी मिथ्या गवाही दी कि ब्रह्मा ने उसके सामने अग्नि-स्तंभ का सिरा खोजा है। इस पर शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने दोनों को शाप दे दिया।
शिव बोले, ‘ब्रह्मदेव, आपने स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए झूठ का सहारा लिया है, इसलिए अब से आपकी पूजा ही नहीं होगी और केतकी ने आपका साथ दिया। इसलिए इसे भी पूजा में अर्पित नहीं किया जाएगा!’ इसी शाप के चलते ब्रह्मा की पूजा नहीं होती और केतकी को पूजा में अर्पित नहीं किया जाता।
एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा ने एक महान यज्ञ करने का विचार किया।
ब्रह्मा ने एक कमल का पुष्प पृथ्वी पर गिराया और तय किया कि वह पुष्प जहां गिरेगा, वहीं यज्ञ किया जाएगा। वह पुष्प, वर्तमान अजमेर (राजस्थान) के एक स्थान पर गिरा। चूंकि पुष्प ब्रह्मा के कर (हाथ) से गिरा था, इसलिए उस स्थान का नाम ‘पुष्कर’ पड़ गया।
ब्रह्मा ने कार्तिक मास (शुक्ल पक्ष) की एकादशी को पुष्कर में यज्ञ आरंभ करने का निश्चय किया। उन्होंने समस्त देवी-देवताओं के साथ अपनी पत्नी सावित्री को भी उपस्थित रहने को कहा। यज्ञ के दिन सावित्री को आने में विलंब हो गया। मुहूर्त बीत रहा था, तो ब्रह्मा ने वेदों की ज्ञाता गायत्री से विवाह करके उन्हें अपने साथ यज्ञ में बैठा लिया।
कुछ देर बाद सावित्री पहुंची तो ब्रह्मा के साथ गायत्री को देखकर उन्हें ब्रह्मा पर क्रोध आ गया। उन्होंने ब्रह्मा से कहा, ‘आपने यज्ञ के विधि-विधान का उल्लंघन किया है। मैं आपको शाप देती हूं कि धरती पर कहीं भी आपकी पूजा नहीं की जाएगी।’
शाप सुन ब्रह्मा दुखी हुए। तब देवताओं के आग्रह पर सावित्री ने केवल यज्ञ-स्थल (पुष्कर) में ब्रह्मा की पूजा की अनुमति प्रदान की। तब सावित्री को यह वरदान मिला कि पुष्कर में ब्रह्मा से पहले सावित्री की पूजा होगी। कालांतर में इसी स्थान पर शंकराचार्य ने ब्रह्मा की प्रतिमा स्थापित की। फिर यहां मंदिर का निर्माण हुआ। इसीलिए ब्रह्मा का एकमात्र प्रमुख मंदिर केवल पुष्कर में स्थित है। चूंकि ब्रह्मा का यज्ञ कार्तिक मास (शुक्ल पक्ष) की एकादशी से आरंभ होकर पूर्णिमा तक चला, इसलिए इन्हीं चार दिनों में पुष्कर में एक विशाल मेला भी लगता है, जो विश्व भर से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।