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टाइम मशीन: पूंजीवादी अमेरिका में हड़ताल, जब खुद पर आई तो बाइडन के सिद्धांत हुए हवा-हवाई

अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 01 Oct 2023 07:38 AM IST

सार

रेलरोड हड़ताल खत्म करने के लिए अमेरिका की फेडरल सरकार को लेबर डे को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना पड़ा। इन हड़तालों का प्रकोप कुछ इस कदर बढ़ा कि 1922 में अमेरिकी कांग्रेस को रेलवे लेबर बोर्ड बनाना पड़ा, जिसे कर्मचारियों और कंपनियों के बीच मध्यस्थता करने का काम सौंपा गया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1945-46 में अमेरिका में हड़तालों का एक और दौर आया, रेलवे कर्मचारी ही इसका नेतृत्व कर रहे थे। अमेरिका का रेलरोड तब तक अपने श्रम आंदोलनों के लिए कुख्यात हो गया।
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जो बाइडन - फोटो : Social Media


मगर यह वही बाइडन हैं, जो बीते दिसंबर में एक और संभावित हड़ताल से मुखातिब थे और तब उनकी प्रतिक्रिया बिल्कुल दूसरी थी। हुआ यों कि दिसंबर के पहले सप्ताह में अमेरिका में रेलवे कर्मचारी हड़ताल पर जाने वाले थे। उस हड़ताल को रोकने के लिए राष्ट्रपति जो बाइडन को अमेरिकी कांग्रेस से मदद की गुहार लगानी पड़ी। कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने के लिए रेलरोड कंपनियों और कर्मचारियों के बीच समझौते को कानूनी आधार दिया गया। आनन-फानन में एक कानून बनाकर व्हाइट हाउस को दिया गया। राष्ट्रपति बाइडन ने बगैर देर किए इस पर दस्तखत किए।


रेलवे को अमेरिका में रेलरोड कहते हैं। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी कहती है कि रेलरोड शब्द भाप के इंजन के आविष्कार से भी पुराना है। इंजन तो 1800 में आया। अमेरिका के कोयला खनन कर्मी लोहे की पटरियों पर कोयला वैगन चलाते थे। शायद वहीं से आया होगा यह शब्द। हडतालों के घोषित समर्थक डेमोक्रेट जो बाइडन अचानक रेलरोड की प्रस्तावित हड़ताल से क्यों डर गए?


हे टाइम मशीन, यह माजरा क्या है? अपनी सीट पर बैठिए, 145 साल पीछे चलते हैं। दो दिसंबर, 2022 को राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि अमेरिकी कांग्रेस का धन्यवाद। उसने वक्त पर कानून बना दिया, नहीं तो महाविपत्ति आ जाती। यदि रेलरोड बंद होता, तो अमेरिका के उद्योग बंद हो जाते। रोजाना दो अरब डॉलर का नुकसान होने वाला था। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान में अमेरिका का 150 साल का औद्योगिक इतिहास बोल रहा था।  


1870 का दशक। अमेरिका के सिविल वार खत्म हुए कुछ ही साल बीते थे। बैंकिंग उद्योग संकट से उबरकर अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था। रेलरोड या रेलवे दुनिया का सबसे नया-नवेला आविष्कार था। कई कंपनियां रेलरोड में निवेश कर रही थीं। उन्होंने भारी कर्ज लिए थे। यूरोप में भी रेलवे कंपनियों के बॉन्ड में भारी निवेश हुआ था। यूरोप के बैंकों ने अमेरिकी कंपनियों में निवेश किया था।


1873 के आसपास यूरोप में इस निवेश का बुलबुला  फूटा। रेलरोड कंपनियों के शेयरों में बिकवाली शुरू हुई। अमेरिका तक यह संकट पहुंचते देर नहीं लगी। जे कुक ऐंड कंपनी उस वक्त न्यूयॉर्क का सबसे बड़ा बैंक था। रेलरोड को भारी कर्ज दे रखा था इस बैंक ने। यह बैंक चुटकियों में दिवालिया हो गया। न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में कोहराम मच गया। रेलरोड कंपनियां डूबने लगीं। उनके साथ 100 बैंक डूब गए। अमेरिका में मंदी शुरू हो गई।


वह 1877 की जुलाई थी, जब वेस्ट वर्जीनिया में मार्टिंसबर्ग के स्टेशन पर हंगामा हो गया। कर्मचारियों ने इंजनों को बोगियों से अलग कर यार्ड में खड़ा कर दिया। यहां रेलवे चलाने वाली कंपनी ने पगार में 10 फीसदी की कटौती कर दी थी। मंदी के बीच उत्तेजित कर्मचारियों ने हड़ताल का एलान कर दिया।
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मंदी और कर्ज के कारण रेलरोड कंपनियां दिवालिया हो रही थीं। रेलवे में कर्मचारियों के वेतन पहले ही कम थे, ऊपर से पगार में कटौती। आंदोलन खौल उठा। कुछ ही दिनों में हड़ताल शिकागो, पेनसिल्वेनिया, पिट्सबर्ग, फिलाडेल्फिया होते हुए पूरे अमेरिका में फैल गई।


पेनसिल्वेनिया में इस हड़ताल में दूसरे उद्योगों के मजदूर भी कूद पड़े। मैरीलैंड में हालात बेकाबू हो गए। ट्रेन रोक रहे कर्मचारियों से निपटने के लिए प्रशासन ने हथियार बंद दस्ता भेजा। हिंसा भड़क उठी। करीब दस लोग मारे गए। इसके बाद हड़ताल विकराल हो गई। करीब एक लाख रेलवे कर्मचारी काम बंदकर सड़क पर आ गए। अमेरिका में लगभग आधा माल परिवहन बंद हो गया। हड़तालियों से निपटने के लिए फेडरल सरकार को बाल्टीमोर में सेना उतारनी पड़ी।

 

उत्तेजित श्रमिकों ने इंजन, बोगियों, इमारताें में आग लगा दी। नेशनल गार्डस और कर्मचारियों के बीच भारी हिंसा हुई। करीब सौ जानें गईं। सेना की सख्ती के कारण यह हड़ताल लंबी नहीं चली, लेकिन यहां रेलरोड कर्मचारियों के आंदोलन का एक सिलसिला शुरू हो गया। 1894 में शिकागो की पुलमैन कंपनी के 25,000 कर्मचारियों ने वेतन में 25 फीसदी कटौती के विरेाध में चक्का जाम कर दिया। शिकागो से पश्चिम को जाने वाला पूरा रेल नेटवर्क बंद कर दिया गया।  


कहते हैं कि इस हड़ताल को खत्म करने के लिए अमेरिका की फेडरल सरकार को लेबर डे को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना पड़ा। इन हड़तालों का प्रकोप कुछ इस कदर बढ़ा कि 1922 में अमेरिका की कांग्रेस को रेलवे लेबर बोर्ड बनाना पड़ा, जिसे कर्मचारियों और कंपनियों के बीच मध्यस्थता करने का काम सौंपा गया।  


यही वह साल था, जब एक और बड़ी रेलरोड हड़ताल हुई। पहले विश्व युद्ध के बाद वेतन को लेकर कर्मचारी उत्तेजित थे। वे सैन्य पोशाक पहनकर सड़कों पर उतर आए। अंतत: अमेरिकी सरकार को 1926 में रेलवे लेबर कानून बनाना पड़ा।  

1928 में फिर पुलमैन कंपनी के अश्वेत कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। यह हड़ताल अमेरिका के इतिहास का महत्वपूर्ण मुकाम था। यहां शोषण के खिलाफ अमेरिका में पहली अश्वेत लेबर यूनियन खड़ी हो गई। अमेरिकी अश्वेत आंदोलनों की प्रमुख शख्सियत फिलिप रैंडोल्फ इस हड़ताल के मुखिया थे।  


दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1945-46 में अमेरिकी हड़तालों का एक और दौर आया, रेलवे कर्मचारी ही इसका नेतृत्व कर रहे थे। अमेरिका का रेलरोड तब तक अपने श्रम आंदोलनों के लिए कुख्यात हो गया। अब सरकार हड़तालों से आजिज आ गई। 1947 में अमेरिकी कांग्रेस ने टफ्ट हर्टले कानून पारित किया, जिससे हड़तालों के अधिकार सीमित किए गए। अलबत्ता अमेरिका के श्रम आंदोलनों ने इस कानून की कोई फिक्र नहीं की। 1966, 1980, 1992 में हड़तालें हुईं और 2005 में तो न्यूयॉर्क के लोकल ट्रेन नेटवर्क कर्मचारियों ने चक्का जाम कर दिया।  


यही वजह थी, दिसंबर, 2022 में जब रेलरोड कर्मचारियों ने हड़ताल की चेतावनी दी, तो व्हाइट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस थर्रा उठी। बाइडन लेबर यूनियन के कट्टर समर्थक हैं। वह रेलवे  कर्मचारियों और कंपनियों के बीच विवाद में संसद और सरकार के दखल का विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क हुआ करता था कि इस दखल से कर्मचारियों को अच्छे वेतन मिलने की संभावनाएं कम हो जाती हैं। लेकिन अब खुद पर बन आई, तो सिद्धांतों पर भारी पड़ा अमेरिका का डरावना हड़ताली अतीत। खौफजदा बाइडन को महाविपत्ति की आहट सुनाई पड़ने लगी।


अमेरिका में जारी महंगाई के बीच रेलरोड की यह हड़ताल डेमोक्रेट्स की राजनीति के लिए बड़ा संकट बनने वाली थी। इसलिए सब काम छोड़कर संसद और राष्ट्रपति ने मिलकर कानून बनाया, जिसमें कर्मचारियों को वेतन में 25 फीसदी की बढ़ोत्तरी मिलेगी।


रेलरोड की हड़ताल तो टल गई, लेकिन ऑटो कर्मचारी नहीं रुके। सितंबर के अंत तक अमेरिका का ऑटो उद्योग इस आंदोलन से 16 खरब डॉलर का नुकसान उठा चुका था। वही अमेरिका है, वही बाइडन हैं, मगर हड़ताल दूसरी है, जिसमें राष्ट्रपति बाइडन को राजनीतिक फायदा दिख रहा है। टाइम मशीन उवाच - वक्त का पहिया बार-बार घूमता है मगर आवाजें बदल जाती हैं। मिलते हैं अगले सफर पर..
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