समाज की किसी भी हलचल, गतिविधि या घटना का सबसे तीव्रगामी, सीधा व प्रत्यक्ष प्रभाव जिस स्थायी घटक में दिखाई देता है, वह भाषा है। इसीलिए कहा जाता है कि समाज ही भाषा की प्रयोगशाला और उसका कार्यस्थल है। कोरोना महामारी भी अपने साथ बदलाव के जो दृश्य लेकर उपस्थित हुई है, उसकी दुखभरी स्मृतियां जहां लंबे काल तक मानव मस्तिष्क में जिंदा रहेंगी, वहीं भाषा के स्तर पर भी यह महामारी अपना स्थायी प्रभाव दर्ज करा रही है।
‘क्वारंटीन’ जैसा शब्द आया तो कोरोना के साथ ही, पर इस बीमारी के चंगुल में आए लोगों को अलग रहने की हिदायत देते हुए। यदि इसकी जगह हमने एकांतवास शब्द का प्रयोग किया होता, तो आम आदमी स्वतः समझ लेता कि यह बीमारी रोगी को छूने या पास जाने पर लग जाती है, इसलिए रोगी के लिए एकांतवास का प्रावधान किया गया है।
इससे किसी यंत्रणा या प्रताड़ना का भ्रम भी नहीं फैलता। अर्थ या भाव के स्तर पर ‘आइसोलेट’ क्वारंटीन का सहोदर लगता है। इसमें स्वयं को दूसरों से अलग कर लेने की बात है। आइसलेट के लिए निर्धारित अवधि तक अलग रहना या अलगाव जैसा पद पहले से प्रचलित है, जिसका प्रयोग करना चाहिए था।
इसी तरह एक पद है ‘इम्यूनिटी पावर’। ‘इम्यूनिटी’ शब्द का कोशगत अर्थ रोग से प्रतिरक्षा (संज्ञा) है और क्रिया में रूपांतरित होकर यह ‘इम्यूनाइज’ अर्थात प्रतिरक्षित हो जाता है। इसके साथ पावर शब्द की आवश्यकता नहीं है।
मुझे लगता है कि जिस भाव को व्यक्त करने के लिए इम्यूनिटी शब्द का व्यवहार चल पड़ा, उसकी जगह प्रतिरोधक क्षमता या प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाए या बनाए रखने की सलाह ज्यादा संप्रेषित और सहज ग्राह्य होती।
‘कैन्टिमिनेट एरिया’ दूसरा ऐसा पदबंध है, जो अपने आशय में स्पष्ट है, किंतु जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते, उनके लिए यह क्षेत्र बेहद खतरनाक और डरावना है। अंग्रेजीदां लोग जानते हैं कि इसका अर्थ गंदा, अपवित्र, रोग-युक्त और दूषित है। पर यह अपमानजनक लगता है, इसलिए इस रोग से चिह्नित रहवासियों के स्थान को विशेष संसूचित, सुरक्षित या प्रदूषित क्षेत्र कहकर इंगित कर सकते थे।
‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ का सीधा अभिप्राय सामाजिक दूरी है। यह पदबंध किसी भी रूप में व्यक्तियों की आपसी दूरी का अर्थ नहीं देता, जबकि कोरोना की संक्रामकता के विशेष लक्षण के कारण इसका मूल अभिप्राय यही है। हिंदी में इसे परस्पर दूरी या आपसी दूरी कहकर व्यक्त किया जा सकता था।
वायरस शब्द से हमारे यहां के लोग कमोबेश परिचित हैं; और कोरोना एक वायरस है-यह समझने में लोगों को कोई दिक्कत नहीं हुई होगी, किंतु यदि हमने इसे विषाणु के रूप में समझा और समझाया होता, तो भाषिक ध्वनि में ही इसका विष से युक्त होना व्यक्त होता, जो लोगों पर ज्यादा असर डालता। डॉक्टर, नर्स, सिपाही, प्रहरी, सफाई-कर्मी और अन्य किसी भी रूप में इस महामारी से लड़ने के लिए अपने प्राणों को संकट में डालने वालों को ‘वॉरिअर’ न कहकर कोरोना योद्धा या कोरोना सैनिक ही कहा जाता, तो बेहतर अर्थ प्रकट होता।
अंग्रेजी शब्द ‘पॉजिटिव’ सकारात्मक (गुण, दृष्टि या विकास आदि के लिए) ज्यादा माना जाता है। ‘नेगटिव’ इसका विपरीतार्थी शब्द है। पर कोरोना की भयावहता इस कदर हावी हुई कि चिकित्सकीय परीक्षण में पॉजिटिव पाया जाना यानी प्राणों पर बन आने जैसा हो गया और नकारात्मक ध्वनि वाला नेगटिव सबका चहेता हो गया। अगर ‘इतने लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए’ की जगह ‘इतने लोग कोरोना संक्रमित पाए गए’, लिखा जाता, तो पॉजिटिव शब्द की रचनात्मक साख बची रहती।
इस कोरोना काल में एकाएक प्रचलन में आए 'वेबिनार' का जन्म बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हो गया था। हालांकि इसमें संगोष्ठी जैसी जीवंतता नहीं मिलती, किंतु हमारे यहां अचानक इसके व्यापक प्रचलन का श्रेय कोरोना को ही है। इसी तरह लॉकडाउन के बजाय तालाबंदी या संपूर्ण बंद जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता, तो बेहतर होता।
ऐसा शायद इस सोच के चलते हुआ है कि भाषा भी कोई मुद्दा है क्या! मेरा आशय और मेरी चिंता प्रत्येक नई घटना और नए विचार-प्रवाह को अपनी भाषा में देखने-समझने की है और यह मंशा शिखर नेतृत्व के ग्लोबल बनाम लोकल की महत्वाकांक्षा की पूर्ति की दिशा में ही पहला चरण है।