मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने केंद्र में एक महीना पूरा कर लिया है। मोदी जी ने शपथ ग्रहण समारोह में जिस तरह सार्क देशों के शासनाध्यक्षों को बुलाकर चकित कर दिया था, उसी तरह अपने छप्पन इंच के वज्रादपि कठोर सीने में कुसुमादपि भावप्रवण तरल हृदय की विद्यमानता से शत्रु भाव रखने वाले चंद बुद्धिजीवियों को भी उन्होंने हैरान कर दिया है। अपने आलोचकों के प्रति उनके क्षमा भाव को भला और क्या कहेंगे?
हिंदी के एक स्वनामधन्य साहित्यकार ने चुनावी दिनों में मोदी को हराने का फतवा जारी कर अपनी चौधराहट का सुबूत दिया था। उन्होंने यह कहा था कि मोदी अगर इस शहर से जीत गए, तो यहां की संस्कृति हार जाएगी, आदि-आदि। पता नहीं, मोदी की जीत के बाद उस शहर की संस्कृति बदली है या नहीं। यह तो वही बेहतर बता सकते हैं। इसी तरह दक्षिण भारत के एक सुविख्यात, पुरस्कृत उपन्यासकार का कहना था कि यदि मोदी राज आ गया, तो वह भारत छोड़ देंगे। हालांकि भारत छोड़कर वह किस देश में जा बसेंगे, ऐसा उन्होंने नहीं बताया था। यह भी मालूम नहीं कि अब वह भारत छोड़कर सचमुच किसी दूसरे देश में बसने के इच्छुक भी हैं या नहीं। सुना है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने चुनावी नतीजा आने के बाद उन्हें हवाई टिकट भी भेजे थे, ताकि वह अपना वायदा निभा सकें।
ठीक उसी तरह, जैसे मणिशंकर अय्यर की इस टिप्पणी पर, कि एक चायवाला कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता, भाजपा कार्यकर्ताओं ने मणिशंकर टी स्टॉल की सीरीज ही लांच कर दी। राजनीति में ऐसी टिप्पणियां तो फिर भी जब-तब सुनाई पड़ती हैं। पर समाज को दिशा देने वाला लेखक जब जिद्दी या आत्ममुग्ध होकर इस तरह तात्कालिक विरोध की राजनीति करने लगता है, तो उसे रास्ते से भटका हुआ ही मान लेना चाहिए। इच्छा होती है, उनसे यह जानूं कि उनकी इच्छा के विपरीत मोदी सरकार के गठित और सक्रिय हो जाने का आफ्टर इफेक्ट क्या रहा उनके लिए। क्या वे आने वाले अच्छे दिन नहीं चाहते?