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पासपोर्ट का दूसरा नाम आजादी

Sun, 29 Jun 2014 06:34 PM IST
तस्लीमा नसरीन
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बीते दिनों पेरिस में मैंने एक शानदार आयोजन में भाग लिया। वह आयोजन सार्वभौमिक नागरिकता से जुड़ा था। हम वर्षों से दुनिया के सभी नागरिकों के लिए सार्वभौमिक पासपोर्ट का स्वप्न देखते आए हैं। यह पासपोर्ट पृथ्वी की किसी भी जगह में घूमने और जहां मन वहां बसने की आजादी देता है। इस पासपोर्ट का दूसरा नाम आजादी है। इस दस्तावेज में पासपोर्ट नंबर, व्यक्ति का नाम और उनकी उम्र छोड़कर और कोई तथ्य नहीं है। इसमें इसका भी जिक्र नहीं है कि व्यक्ति का जन्म किस देश में हुआ, वह कहां रहता है, किस धर्म में उसकी आस्था है, पिता का नाम क्या है या उसका रंग कैसा है। यह पृथ्वी धनी-दरिद्र, श्वेत-श्याम, नारी-पुरुष-सबकी है।
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यह सार्वभौमिक पासपोर्ट मुझे पिछले साल मिला। यूनेस्को भवन में पासपोर्ट वितरण से जुड़ा आयोजन था। कुछ स्वप्नजीवी, स्वाधीन चेतना वाले लोगों को ये पासपोर्ट दिए गए हैं। यह असाधारण पासपोर्ट पाकर मैं खुद को बेहद गौरवान्वित महसूस कर रही हूं। ऐसा लगता है कि इतने दिनों तक अपनी जान जोखिम में डालकर भी मानवाधिकार के पक्ष में मैं जो कहती आई हूं, इस पृथ्वी में समता का जो स्वप्न मैं देखती आई हूं, नस्लवाद, मनुष्य-मनुष्य में भेद, कांटेदार तारों से सीमा को बांटने की प्रवृत्ति का जो विरोध करती आई हूं, उसकी स्वीकृति जिंदा रहते ही मुझे मिल गई। नहीं तो मानवता की बेहतरी का सपना देखने वाले लोगों को आम तौर पर आलोचना और निंदा छोड़कर कुछ हासिल नहीं होता। मैं भी क्या कोई कम लांछित हुई हूं? पूर्व (बांग्लादेश) और पश्चिम बंगाल के बीच धर्म और राजनीति के तार से जो विभाजक रेखा बनाई गई है, मैं उसके विरुद्ध किशोरावस्था से ही लिख रही हूं। इस कारण मुझ पर भारत के दूत होने का आरोप लगाया गया। मैंने यूरोपीय महिलाओं की स्वाधीनता के बारे में लिखा, तो मुझे पश्चिम का दलाल कहा गया। मुस्लिम कट्टरवाद का प्रतिरोध करने के कारण मुझे अमेरिकी जासूस बताया गया। सार्वजनिकता, समानाधिकार, समता, सहधर्मिता-ये शब्द सामान्य मनुष्य के शब्दकोश में नहीं हैं। नस्लवाद मनुष्य को छोटा बनाता है। अकारण का अहंकार मनुष्य को संवदेनहीन बना देता है। दुनिया में ऐसे ही संवेदनहीन मनुष्यों का राज है और हम स्वप्नजीवी कारागार में हैं, देश से बाहर हैं या मार डाले गए हैं!

पेरिस में इस बार उत्सव वहां के टाउन हॉल में था। मेरे हिसाब से पेरिस का टाउन हॉल विश्व का सबसे खूबसूरत टाउन हॉल है। उस टाउन हॉल में करीब बीस साल पहले भी मेयर जैक शिरॉक के आमंत्रण पर मैं गई थी। तब उन्होंने मुझे वोल्टेयर की पांच किताबें उपहार में दी थीं। 1917 में प्रकाशित वे किताबें आज की किताबों की तुलना में बहुत छोटी हैं। वे किताबें मेरी अमूल्य संपत्तियों में हैं। उसके बाद भी कुछ साल पहले मैं वहां गई थी, जब टाउन हॉल के एक सौ अस्सी सदस्यों की सहमति पर पेरिस के मेयर ने मुझे वहां का सम्मानित नागरिक घोषित किया था। इस बार उसी टाउन हॉल में सार्वभौम नागरिकता का आयोजन था, जिसमें मेरे ही हाथ से जर्मन राजनीतिज्ञ डेनियल कॉन बेंडिट को पासपोर्ट दिलवाया गया।
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यूटोपिया में विश्वास करने वाली मैं अकेली नहीं हूं। मेरे जैसे अनेक स्वप्नजीवी लोग हैं, जिन्होंने अपनी कोशिशों से कई संस्थाएं बना डाली हैं। ये लोग भी किसी देश की सीमा या वीजा-पासपोर्ट में यकीन नहीं करते। ये मानते हैं कि पृथ्वी के हर नागरिक को अबाध ढंग से चलने-फिरने, स्थानांतरित होने और अपनी पसंदीदा जगह पर बसने का अधिकार है। इस मामले में किसी को यह बताने की जरूरत नहीं कि वह क्यों जगह बदल रहा है। जगह बदलने के कारण ही होमोसैपियन नाम की मनुष्य की यह प्रजाति आज भी बची है, जगह न बदलने के कारण ही नियानडार्थल नामक मानव प्रजाति आज अस्तित्व में नहीं है। मैं यह नहीं कहती कि चलने-फिरने की स्वतंत्रता के अभाव में हम भी विलुप्त हो जाएंगे। हमारी विलुप्ति के तमाम दूसरे कारण हैं। खुद को विलुप्त कर देने के लिए हमने परमाणविक हथियार बनाए हैं, और कुछ की भला जरूरत ही क्या है! सभ्यता के नाम पर हमने अपनी मौलिक स्वाधीनता को विसर्जित किया है, अधिकारों को बेड़ियों में जकड़ा है। होना तो यही चाहिए कि उत्तरोत्तर सभ्य होते हुए हम अपनी क्षुद्र परिधियों से निकल आएं। छोटी से छोटी परिधियों में खुद को शारीरिक-मानसिक रूप से बांधे रखने से दिनोंदिन खुद के छोटे होने का खतरा रहता है। और यह आशंका बार-बार सच साबित हो रही है।

शांति की उम्मीद में भारत को विभाजित हुए कितने दशक हुए। शांति नहीं आई। भारत और पाकिस्तान की सीमा पर अशांति बनी ही हुई है। सरहद पर गोलियां चलती हैं, लोग मरते हैं, अशांति और बढ़ जाती है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सीमा पर भी हत्याएं होती हैं। मनुष्यों के बीच विभेद की कृत्रिम दीवार बनाई जाती है। इस विभेद को बनाए रखने के लिए वर्णवाद, जातिवाद, धनी-दरिद्र, नारी-पुरुष और गोरे-काले का फर्क बनाए रखा जाता है। सुना है कि बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा पर भी गोलियां चल रही हैं, लोग मर रहे हैं। म्यांमार के अधिकांश लोग बौद्ध हैं। बौद्ध धर्म को शांति का धर्म माना जाता है। लेकिन म्यांमार के बौद्ध ही रोहिंग्या मुसलमानों का खून कर रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस तरह के अत्याचार पर आंग सान सू की भी चुप रहती हैं। जबकि उन्हें शांति के लिए नोबल पुरस्कार मिला है! उनके जीवन पर बनी फिल्म द लेडी देखकर मैं मुग्ध हो गई थी। शेख हसीना भी उनसे कम नहीं हैं। दक्षिण एशिया में शायद ऐसा कोई राजनेता हो, जिसे निर्लोभ, ईमानदार, निर्भीक और जनता का सच्चा सेवक कहा जा सके। ऐसे में बहुत अकेला महसूस होता है। यूटोपिया आंदोलन के हमारे दूसरे साथी भी यही कहते हैं कि वे खुद को अकेला महसूस करते हैं।
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