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पर्यावरण: हिमालय में कम बर्फबारी के मायने, संकट के समाधान पर कारगर काम की जरूरत

पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 10 Feb 2024 07:19 AM IST

सार

इस बार पहाड़ों पर बर्फ न गिरने से हिमालयी राज्यों समेत देश भर में संकट खड़ा हो गया है। इसके लिए हमें स्थानीय मूल कारकों पर ध्यान देना होगा।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


कश्मीर के बाशिंदों के लिए जीवकोपार्जन का मूल आधार है-जाड़े का मौसम। यहां जाड़े के कुल 70 दिन गिने जाते हैं। सत्तर दिन की बर्फबारी 15 दिन में सिमटने से दिसंबर और जनवरी में हुई लगभग 80-90 फीसदी कम बर्फबारी की भरपाई तो हो नहीं सकती। उसके बाद गर्मी शुरू हो जाने से जो थोड़ी-सी बर्फ पहाड़ों पर आई है, वह जल्दी ही पिघल जाएगी। अर्थात आने वाले दिनों में एक तो ग्लेशियर पर निर्भर नदियों में बाढ़ आ सकती है और फिर अप्रैल में गर्मी आने पर वहां पानी का अकाल हो सकता है।


देश में हिमालयी क्षेत्र का फैलाव 13 राज्यों व कई केंद्रशासित प्रदेशों में है, जो करीब 2,500 किलोमीटर में फैले हुए हैं। भारत के मुकुट कहे जाने वाले हिमाच्छादित पर्वतमाला की गोदी में कोई पांच करोड़ लोग सदियों से रह रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की मार से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखंड के पहाड़ जैसे अब अपना संयम खो रहे हैं। देश को सदानीरा गंगा-यमुना जैसी नदियां देने वाले पहाड़ के करीब 12 हजार प्राकृतिक स्रोत या तो सूख चुके हैं या फिर सूखने के कगार पर हैं। इस सर्दी में हिमालय, हिंदू-कुश और काराकोरम में बर्फबारी की असामान्य अनुपस्थिति के चलते गर्म तापमान रहा है।


जलवायु संकट के प्रतीक ये बदलाव पर्वतीय समुदायों और हिंदू-कुश हिमालयी क्षेत्र में जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण खतरा पैदा करते हैं। यह समझना होगा कि सर्दियों में कम बर्फबारी का कारण अल नीनो नहीं है। अल नीनो के कारण केवल गर्मी और मानसून की बारिश प्रभावित होती है।


गौरतलब है कि पहाड़ों पर रहने वाले लोग आजीविका के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर हैं। वे अपना निर्वाह खेती और पशुधन पालन से करते हैं। लगभग बर्फ रहित या देर से सर्दी का प्रभाव उन लोगों के लिए विनाशकारी हो सकता है। पूरे हिमालयी क्षेत्र में कम बर्फबारी और अनियमित बारिश से पानी और कृषि वानिकी सहित प्रतिकूल पारिस्थितिक प्रभाव पड़ने की आशंका है। अगर तापमान जल्द ही बढ़ जाता है, तो देर से होने वाली बर्फबारी और भी अधिक त्रासद होगी। गर्मी से यदि ग्लेशियर अधिक पिघले, तो आने वाले दिनों में पहाड़ी राज्यों में स्थापित सैंकड़ों मेगा वाट की जल विद्युत परियोजनाओं पर भी संकट आ सकता है।


लंबे समय तक सूखे के कारण झेलम और अन्य नदियों का जल स्तर अभी से नकारात्मक सीमा में है। देश की संपन्न अर्थव्यवस्था का आधार खेती है, जो बगैर सिंचाई के हो नहीं सकती। इसके लिए अनिवार्य है कि नदियों में जल-धारा अविरल रहे, लेकिन नदियों में जल लाने की जिम्मेदारी तो उन बर्फ के पहाड़ों की है, जो गर्मी होने पर धीरे-धीरे पिघलकर देश को पानीदार बनाते हैं। साफ है कि आने वाले दिनों में न केवल कश्मीर या हिमाचल, बल्कि पूरे देश में जल संकट खड़ा होगा।


ऐसे में, सवाल यह उठता है कि इस अनियमित मौसम से कैसे बचा जाए? ग्लोबल वार्मिंग या अल नीनो को दोष देने से पहले हमें ऐसे स्थानीय कारकों पर विचार करना होगा, जिससे प्रकृति कूपित है। जून, 2022 में गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान द्वारा जारी रिपोर्ट 'एनवायरनमेंटल असेसमेंट ऑफ टूरिज्म इन द इंडियन हिमालयन रीजन' में कड़े शब्दों में कहा गया था कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यटन के चलते हिल स्टेशनों पर दबाव बढ़ रहा है। साथ ही पर्यटन के लिए जिस तरह से इस क्षेत्र में भूमि उपयोग में बदलाव आ रहा है, वह अपने-आप में एक बड़ी समस्या है। जंगलों का बढ़ता विनाश भी इस क्षेत्र के इकोसिस्टम पर व्यापक असर डाल रहा है। इस रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश में पर्यटकों के वाहनों और इसके लिए बन रही सड़कों के कारण वन्यजीवों के आवास नष्ट होने और जैव विविधता पर विपरीत असर पड़ने की बात भी कही गई थी।

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