हिजाब, हलाल, लव जिहाद और टीपू सुल्तान-ये तब अखबारों की सुर्खियां थे, जिन्हें कर्नाटक के मतदाताओं को रिझाने के लिए उछाला जा रहा था। ध्यान दीजिए, नौकरियां, कीमतें, स्कूलों व अस्पतालों की स्थिति, हवा व पानी की स्थिति, सड़कों की स्थिति या ऐसे अन्य विषय नहीं थे, जिनके बारे में किसी को लगे कि उस राज्य के छह करोड़ लोगों के लिए अधिक मायने रखने चाहिए, जहां मैं रहता हूं। हालांकि इसकी वजह पूरी तरह से राजनीतिक थी। सत्तारूढ़ भाजपा सरकार खास लोकप्रिय नहीं थी और उसके मुख्यमंत्री भी उतने प्रभावी नहीं थे। मतदाताओं के सत्ता-विरोधी रुझान को भांपते हुए दिल्ली में बैठे पार्टी के आकाओं ने कर्नाटक चुनाव को पूरी तरह से हिंदू बनाम मुस्लिम मुद्दा बनाने का फैसला किया। भाजपा ने मुसलमानों को अलग और अविश्वसनीय रूप से चित्रित करने की कोशिश की। उन्हें उम्मीद थी कि बहुसंख्यक हिंदू आबादी उसके पक्ष में एकजुट हो जाएगी।
लेकिन ये रणनीतियां विफल रहीं। कर्नाटक के चुनाव में कांग्रेस ने काफी सहज ढंग से बहुमत प्राप्त किया, उसकी जीत दो कारणों से हुई-पहला, हिंदी भाषी राज्यों के विपरीत पार्टी का अब भी पूरे कर्नाटक में यथोचित जनाधार है; दूसरा, राज्य इकाई के प्रमुख नेताओं-सिद्धारमैया और डी के शिवकुमार ने कमोबेश मिलकर काम किया। आज कर्नाटक के अखबारों की सुर्खियां हिजाब, हलाल, टीपू सुल्तान आदि से हटकर ज्यादा ठोस, साथ ही कम सांप्रदायिक मुद्दों, जैसे खराब मानसून का खेती पर प्रभाव, बंगलूरू में सड़कों और सार्वजनिक परिवहन की दयनीय स्थिति, मंत्रियों द्वारा अधिकारियों के तबादले में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप आदि हैं। लेकिन धर्म के सवाल अब एक बार फिर सुर्खियों में हैं। चूंकि अगले कुछ महीनों में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं और कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं, जो कम नहीं हैं। इसलिए भाजपा की राज्य इकाई ने हिंदू वोटों को एकजुट करने पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है। इसके लिए कर्नाटक भाजपा ने मांड्या जिले के एक गांव में एक खंभे और उस पर किस तरह का झंडा फहराना चाहिए, इसको लेकर विवाद खड़ा कर दिया।
हिंदुत्व के कार्यकर्ताओं ने जोर देकर कहा कि पुराने हनुमान मंदिर के निकट होने के कारण खंभे पर भगवा झंडा फहराया जाना चाहिए। राज्य प्रशासन का मानना था कि चूंकि खंभा सरकारी जमीन पर है, इसलिए उस पर केवल राष्ट्रीय ध्वज ही फहराया जाना चाहिए। जो मुद्दा मामूली और स्थानीय होना चाहिए था, उसे भाजपा ने बड़ा बना दिया। कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर अशोक उस गांव पहुंचे और जोर देकर कहा कि कांग्रेस सरकार ने सार्वजनिक खंभे पर भगवा झंडे को फहराने की अनुमति देने से इन्कार करके हिंदू समुदाय का अपमान किया है। एक बड़ी रैली में आर अशोक जद (एस) के नेता एच डी कुमारस्वामी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। अपने अवसरवाद को स्पष्ट दिखाने के लिए कुमारस्वामी ने भगवा शॉल ओढ़ रखा था, जबकि उनकी पार्टी के नाम में 'एस' तकनीकी रूप से 'धर्मनिरपेक्ष' के लिए है।
दो फरवरी को डेक्कन हेराल्ड में प्रकाशित वरिष्ठ भाजपा नेता सी टी रवि के एक भाषण पर आधारित रिपोर्ट में दावा किया गया कि बीदर जिले में एक मुस्लिम पीर की दरगाह मूल रूप से 12वीं सदी के हिंदू सुधारक बसवन्ना द्वारा बनवाया गया एक मंडप था। इसके बाद रवि ने आगामी लोकसभा चुनाव की चर्चा करते हुए कहा, ‘चुनाव काशी विश्वनाथ और औरंगजेब, सोमनाथ और गजनी तथा हनुमान और टीपू के बीच है। काशी और मथुरा में भव्य मंदिर के निर्माण के लिए मोदी को सत्ता में लौटना चाहिए।’
कर्नाटक के भाजपा नेताओं के ऐसे बयान पूरी तरह के उनके सामान्य गुणों के अनुरूप हैं। इससे भी निराशाजनक बात यह है कि राज्य में कांग्रेस नेताओं द्वारा उन हिंदुओं को खुश करने की कोशिश की जा रही है, जो मानते हैं कि राजनीति और शासन व्यवस्था को बहुसंख्यकवादी मुहावरे से चलाया जाना चाहिए। कर्नाटक कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री रामलिंगा रेड्डी के मामले पर ही विचार करें, जिनका विभाग राज्य के मंदिरों का प्रबंधन करता है। रेड्डी ने 22 जनवरी, जिस दिन अयोध्या में भाजपा प्रायोजित मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का समारोह चल रहा था, को सभी मंदिरों में पूजा करने का एक आदेश जारी किया। जब केरल दौरे पर गए कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, देखिए, आखिरकार हम सभी हिंदू हैं।
अयोध्या घटना के दो हफ्ते बाद रामलिंगा रेड्डी ने मीडिया को बताया कि वह मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से राज्य भर में सौ राम मंदिरों के नवीनीकरण के लिए धन आवंटित करने के लिए कह रहे हैं। जहां तक मुझे पता है, मुख्यमंत्री ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं की है। अतीत में सिद्धारमैया ने राजनीति और समाज में बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ दृढ़ता से बात की है।
हालांकि उनके हालिया बयान अनिश्चितता की भावना दर्शाते हैं। अयोध्या की घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रिया हिंदू भक्ति का प्रदर्शन था। कर्नाटक कांग्रेस द्वारा हिंदुत्व के तरीकों की नकल करने के ये प्रयास नैतिक रूप से संदिग्ध हैं। इससे लाभ मिलने की संभावना नहीं है। याद करें कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भूपेश बघेल और कमलनाथ ने बार-बार अपनी 'हिंदू' पहचान, राम और हनुमान के प्रति भक्ति का प्रदर्शन किया था। लेकिन इस खेल में भाजपा को कोई हरा नहीं सकता, जैसा कि उन विधानसभा चुनावों के नतीजों से पता चला है।