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क्या असंतुष्टों को जवाब दे रहे हैं राहुल? बता रहे हैं रशीद किदवई

रशीद किदवई Published by: रशीद किदवई Updated Sat, 10 Oct 2020 01:58 AM IST
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प्रियंका और राहुल गांधी - फोटो : पीटीआई

हाथरस की कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना हो या नए कृषि कानूनों के मद्देनजर किसानों की पीड़ा, कोविड-19 की आपदा हो, विकास दुबे की न्यायेतर मौत या फिर पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ जारी तनाव में मोदी सरकार की कथित चूक, राहुल और प्रियंका गांधी की आक्रमकता के पीछे एक ही वजह दिखती है। और वह है, गांधी परिवार के वंशज की नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन और कांग्रेस के 23 असंतुष्टों के चर्चित आरोप को खारिज करना। 16 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से कुछ घंटे पहले इन नेताओं ने एक चिट्ठी लिखकर धमाका कर दिया था।



उन्होंने राहुल पर निशाना साधा था कि वह पूर्णकालिक राजनेता नहीं हैं, और उन्हें लगता है कि राहुल जो मुद्दे चुनते हैं, वह जमीन से जुड़े नहीं होते। ऐसा लगता है कि राहुल कुछ क्षणिक कामयाबी के जरिये असंतुष्टों को जवाब देना चाहते हैं। चिट्ठी में दस्तख्त करने वालों में शामिल रहे भूपिंदर सिंह हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र हरियाणा में किसानों के प्रदर्शन के दौरान राहुल के साथ नजर आए तो पांच अन्य नेताओं, जितिन प्रसाद, आर पी एन सिंह, मुकुल वासनिक, आनंद शर्मा और गुलाम नबी आजाद को कांग्रेस सचिवालय से संबद्ध कर उनके उत्साह को ठंडा कर दिया गया है। 


सोनिया गांधी की चिकित्सा जांच के लिए हाल ही में राहुल उनके साथ अमेरिका गए थे। वहां से लौटने के बाद उनमें पहले से अधिक आत्मविश्वास दिख रहा है। हाथरस की पीड़िता के पिता के साथ एक तस्वीर में राहुल उनके घुटने पर हाथ रखे और सिर झुकाए हुए नजर आए, इस छवि ने अनेक लोगों को झकझोर दिया। एक अन्य तस्वीर में एक पुलिसकर्मी प्रियंका का कुर्ता पकड़े नजर आया। एक अन्य तस्वीर में राहुल नीचे गिरते हुए नजर आते हैं। ये तस्वीरें कांग्रेस कार्यकर्ताओं में कितना जोश भर पाती हैं, यह देखना होगा। पुराने लोगों को इन तस्वीरों ने दो मई, 1979 को द स्टेट्समैन अखबार में छपी संजय गांधी की तस्वीर की याद दिला दी, जिसमें वह अपनी बांह, पीठ और कंधे पर लाठी के निशान दिखा रहे थे।


अजीब बात यह है कि 2014 में कांग्रेस के सत्ता गंवाने के बाद से कांग्रेस के युवराज ने कोई शारीरिक कष्ट नहीं भोगा था। इसकी बड़ी वजह थी एसपीजी सुरक्षा। राहुल और प्रियंका को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का उनकी सुरक्षा से एसपीजी हटाने के लिए आभारी होना चाहिए, क्योंकि उसके बाद ही उन्हें सड़कों पर प्रदर्शन करने का मौका मिला है।

हालांकि राजनेताओं के परिश्रम और उनकी कामयाबी को चुनावी कामयाबी से ही आंका जाता है। राहुल और गांधी परिवार को अभी दो लिटमस टेस्ट से गुजरना है। ये हैं बिहार विधानसभा के चुनाव तथा मध्य प्रदेश की 28 विधानसभा सीटों के उपचुनाव।


बिहार में कांग्रेस छोटी खिलाड़ी जरूर है, मगर दस नवंबर को यदि खंडित जनादेश आया या महाराष्ट्र जैसी परिस्थिति बन जाए, तो उसकी भूमिका बढ़ सकती है। भाजपा-जद(यू) को यदि स्पष्ट बहुमत मिल जाता है, तो इससे राहुल की हैसियत में कोई बढ़ोतरी नहीं होने वाली। यदि एलजेपी (लोक जनशक्ति पार्टी) जो कि जनता दल (यू) के साथ अभी गठबंधन में नहीं है, इतनी सीटें जीत जाए जिससे सत्तारूढ़ गठबंधन बहुमत से कम रह जाए, तब सोनिया और राहुल महाराष्ट्र की तरह का विकल्प बनाने की कोशिश कर सकते हैं। अभी यह सिर्फ अटकल है कि तेजस्वी यादव और चिराग पासवान या नीतीश कुमार (यदि वह शिवसेना की तरह सहयोगी भाजपा से अच्छा प्रदर्शन न कर पाएं) नया गठबंधन बना सकते हैं, मगर इसके लिए असाधारण किस्म के कौशल और रणनीति की जरूरत होगी। क्या सोनिया इसका प्रदर्शन कर पाएंगी?


दिसंबर, 2018 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस पंद्रह साल बाद सत्ता में लौटी थी, लेकिन 15 महीने में ही उसने इसे गंवा दिया, क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बगावत कर दी थी और उसी वजह से वहां उपचुनाव हो रहे हैं। राज्य की कमान दोबारा हासिल करना कांग्रेस के लिए असंभव लक्ष्य है, क्योंकि उसे उपचुनाव की करीब सारी सीटें जीतनी होंगी। कांग्रेस के पुराने खिलाड़ी कमलनाथ आश्वस्त हैं कि 28 में से 20 सीटें जीतकर और सपा-बसपा तथा निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल कर वह दोबारा सत्ता में लौट सकते हैं। यह दूर की कौड़ी हो सकती है, लेकिन राहुल सचिन पायलट जैसे अनुभवी को राजस्थान से सटी मध्य प्रदेश की विधानसभा सीटों के प्रचार के लिए भेज सकते हैं, जहां गुर्जर वोट प्रभावी संख्या में है। कमलनाथ पायलट से पहले ही आग्रह कर चुके हैं कि वह अपने दोस्त सिंधिया के ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में प्रचार करने आएं। 
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चूंकि ये विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर होंगे, लिहाजा राहुल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलने में संयम बरतना चाहिए। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ राहुल की शब्दावली को पसंद नहीं करते। भारतीय समाज और संस्कृति में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी सम्मान के हकदार हैं, खासतौर से तब और, जब संबंधित व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री जैसे उच्च पद पर हो। राहुल की तुलना में प्रियंका की वक्तृत्व शैली संयत है और पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रभावित करती है। उनकी नेतृत्वकला भी राहुल से भिन्न है। राज बब्बर, श्रीप्रकाश जायसवाल, निर्मल खत्री, सलमान खुर्शीद और रीता बहुगुणा जोशी (अब भाजपा में) जैसे नेताओं ने पिछले वर्षों में उत्तर प्रदेश में पार्टी की कमान संभाली। मगर प्रियंका ने अब अजय प्रसाद लल्लू को चुना है। दो बार के विधायक ओबीसी नेता लल्लू हिंदी पट्टी की राजनीति को बखूबी जानते हैं। 


वास्तव में अजय लल्लू ने पिछले कई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों की तुलना में अधिक वक्त जेल में गुजारा है। इन सबके बावजूद राहुल और प्रियंका के सलाहकारों को समझना होगा कि राजनीति अंशकालीन पेशा नहीं है। बिहार विधानसभा के चुनाव और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में यदि कांग्रेस का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा, तो पार्टी के भीतर द्वंद्व बढ़ सकता है। कांग्रेस नेतृत्व के सवाल को जब तक टालती रहेगी, उसके भीतर द्वंद्व खत्म नहीं होने वाला।

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