मार्च, 2016 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय कृषि नीति में ऐतिहासिक बदलाव की घोषणा करते हुए 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वायदा किया, जो खाद्य उत्पादन में वृद्धि की प्रमुख भारतीय नीति को बदल देगा। यह एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे कई विशेषज्ञों ने पहुंच से बाहर बताया, हालांकि उन्होंने प्राथमिकता में बदलाव की सराहना की। दशकों से जारी कृषि नीति से हटने की वजह क्या है और आज यह पहल कहां है? 1960 के दशक के उत्तरार्ध में हरित क्रांति की शुरुआत के बाद से, भारत की कृषि नीति लगभग पूरी तरह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित रही है। इसका उद्देश्य खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि करना, नागरिकों को खाद्यान्न उपलब्ध करवाना और राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना रहा। 2000 के दशक के प्रारंभ तक धान एवं गेहूं जैसी फसलों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में तेजी से वृद्धि हुई और कुल खाद्य उत्पादन दोगुने से ज्यादा हो गया। हालांकि हरित क्रांति एक मामले में विफल रहीः उत्पादकता और उत्पादन में वृद्धि के साथ खासकर छोटे और सीमांत किसानों की आय में वृद्धि नहीं हुई, जिनकी आबादी कुल कृषकों की अस्सी फीसदी है। पिछले दो दशकों में छोटे और सीमांत किसानों की आय में तीस फीसदी की कमी आई है।
किसानों की कर्जग्रस्तता तेजी से बढ़ी है, जिसके चलते 1995 से अब तक तीन लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली है और देश के विभिन्न इलाकों में किसान आंदोलन बढ़े हैं। कई राज्यों में किसानों ने कर्जमाफी की मांग की है। नतीजतन कृषि संकट अब एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभरा है और अगलेे लोकसभा चुनाव में यह केंद्र में होगा।
किसानों की आय बढ़ाने के लिए नई कृषि नीति की घोषणा सरकार ने सही वक्त पर की, लेकिन इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है। छोटे एवं सीमांत किसानों को वित्त, प्रौद्योगिकी, बाजार और जोखिम प्रबंधन उपकरण तक व्यापक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने डिजिटल नवाचार पर आधारित कई पहलों की घोषणा की गई है। अक्तूबर, 2018 में सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया (सीएएसआई) ने वर्ल्ड फूड प्राइज फाउंडेशन, मेकेंजी ऐंड कंपनी और शिकागो काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स की भागीदारी में भारत के नए कृषि संकट और प्रतिक्रियाओं का आकलन किया। आयोवा में फाउंडेशन के वार्षिक बोरलॉग संवाद में, आयोजकों ने डिजिटल नवाचार और चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नीति सुधारों के माध्यम से भारतीय कृषि को कैसे बदला जा सकता है, इस पर एक पैनल चर्चा की।
उत्पादकता-भारत के ज्यादातर खेत गेहूं और धान की खेती को समर्पित हैं। वर्षा आधारित क्षेत्रों में धान और गेहूं की एकल फसल उगाने वाले किसानों को इससे सर्वाधिक नुकसान होता है। आज फसलों में विविधता लाने से खेती में ज्यादा लाभ संभव है। विशेष रूप से लघु और सीमांत कृषक सब्जियां और फल उगाकर तथा पशुपालन से अपनी आय बढ़ाते हैं। ओडिशा जैसे गरीब राज्य में पशुपालन के जोर पकड़ने से नाटकीय प्रगति हुई है। विविधता के लिए छोटे किसानों की वित्त, प्रौद्योगिकी तक आसानी से पहुंच और कम लागत की आवश्यकता होती है। साथ ही खराब होने वाले उत्पादों की बिक्री, भंडारण और परिवहन में कम बाधाएं होनी चाहिए। डिजिटल नवाचार और मृदा स्वास्थ्य कार्ड उस पहुंच की पेशकश कर सकते हैं। डिजिटल चैनलों के माध्यम से कम जोखिम और लागत पर छोटे किसानों को कर्ज दिया जा सकता है।
उत्पादन के बाद- भारत के कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए सबसे बड़ी चुनौती किसानों को अपने उत्पाद की बेहतर कीमत पाने में सक्षम बनाना है। इसके लिए उत्पादन-केंद्रित प्रोत्साहन से बाजार-केंद्रित प्रोत्साहन के लिए बदलाव की जरूरत है। डिजिटल ऋण देने से उत्पादन ऋण के स्थानीय स्रोतों (और अन्य उधार) और सबसे अच्छी कीमत पर उत्पाद बेचने की किसान की क्षमता के बीच संबंध तोड़ने में मदद मिल सकती है। ऑनलाइन मूल्य खोज और विपणन प्लेटफॉर्म किसानों को पारदर्शिता और बाजार की पहुंच प्रदान करेंगे। मोदी सरकार इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार निर्मित करने के लिए काम कर रही है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता अब तक उन व्यापारियों की अधूरी भागीदारी पर निर्भर है, जो मूल्य निर्धारण की अपनी शक्ति कम होने की आशंका में इसके विरोधी हैं। स्थानीय और क्षेत्रीय किसान उत्पादक संगठनों का निर्माण एक ज्यादा आशाजनक संभावना है, जिसके माध्यम से किसान बाजार की शक्ति और बेहतर मूल्य निर्धारण पर नियंत्रण हासिल कर सकते हैं।
जोखिम प्रबंधन-मौसम की अनियमितताओं के कारण भी किसानों को जोखिम और नुकसान उठाना पड़ता है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जिनकी मौसम और उत्पादन बदलाव संबंधी शुरुआती चेतावनियों तक पहुंच नहीं है, जोखिम बढ़ जाता है। डिजिटल नवाचार मौसम और मूल्य जोखिम, दोनों से निपटने में ज्यादा कारगर है। भारत सरकार ने बड़े पैमाने पर मौसम पूर्वानुमान क्षमताओं का विकास किया है, जिससे नुकसान को कम किया गया है और मूल्य पूर्वानुमान मॉडल विकसित करने का भी प्रस्ताव है। अगला महत्वपूर्ण कदम इन पूर्वानुमानों को बड़ी संख्या में किसानों के लिए सुलभ बनाना है, ताकि वे अपने स्थानों और फसलों के लिए आसानी से इनका उपयोग कर सकें।
डिजिटल संभावना-किसान आजीविका में सुधार के लिए डिजिटल एप्लीकेशंस ज्यादा उपयोगी हैं। पर अधिकांश किसानों को इसका लाभ पहुंचाने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय कृषि को नीतियों में सुधार के माध्यम से और अधिक बाजारोन्मुख बनाने की आवश्यकता है। मसलन, सरकार को बाजारों में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय समझदारी से नियमन करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, डिजिटल प्रणालियों के संचालन में बाधाओं को दूर करना चाहिए, स्थानीय अवसंरचना विकास (जैसे भंडारण और सिंचाई) करना चाहिए, और डिजिटल नवाचारों की स्थिरता के लिए कानूनी या नौकरशाही की बाधाओं को दूर करना चाहिए।
-लेखक सीएएसआई के कार्यकारी निदेशक हैं