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सामयिक: छोटे मछुआरों पर मंडराता खतरा, विकसित देशों के दबाव के बीच भारत को अपनाना होगा सख्त रुख

अश्विनी महाजन
Updated Tue, 26 Dec 2023 07:43 AM IST

सार

भारत को अपने छोटे मछुआरों के हितों की रक्षा हेतु सख्त रुख अपनाना होगा। हाल ही में, हमने भारत के विभिन्न हिस्सों में तनावग्रस्त मछुआरों द्वारा आत्महत्याएं देखी है। ऐसे में जो भी मामूली सब्सिडी दी जा रही है, उसे बंद करने से स्थिति और बिगड़ जाएगी। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया


गौरतलब है कि डब्ल्यूटीओ में मत्स्य पालन सब्सिडी पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा गया था, क्योंकि दुनिया में अत्यधिक मछली पकड़ने के कारण समुद्री संसाधन तेजी से कम हो रहे हैं। वास्तव में, यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों का भी एक हिस्सा है, जिसमें प्रावधान है कि अवैध, असूचित और अनियमित मछली पकड़ने पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। लेकिन सवाल उठता है कि दुनिया में अत्यधिक मछली पकड़ने का दोषी कौन है? क्या हमारे देश या अन्य विकासशील देशों के छोटे मछुआरे हैं, जिनकी मछली पकड़ने की क्षमता बहुत कम है, या विकसित देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं, जो मशीनों से गहरे समुद्र में मछली पकड़ने का काम करती हैं।


इससे पहले एक मसौदा प्रस्तावित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि मछली पकड़ने हेतु विकासशील देशों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी को सात साल के भीतर या 2030 से पहले समाप्त करना अनिवार्य होगा। भारत ने इसे मानने से इन्कार कर दिया था और कहा था कि विकसित देश भारत की तुलना में प्रति मछुआरे को 3,000 से 5,000 गुना अधिक सब्सिडी देते हैं। उल्लेखनीय है कि ओईसीडी मत्स्य पालन सब्सिडी अनुमान (2014-16) और एफएओ ईयरबुक, मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर सांख्यिकी, 2016 के आंकड़ों के अनुसार, डेनमार्क प्रति मछुआरे को 75,578 डॉलर, स्वीडन 65,979 डॉलर, न्यूजीलैंड 36,512 डॉलर, ब्रिटेन 2,146 डॉलर और भारत प्रति मछुआरे बमुश्किल 15 डॉलर की सब्सिडी देता है।


भारत ने मत्स्य पालन सब्सिडी को खत्म करने के लिए 25 साल की संक्रमण अवधि की मांग की, क्योंकि भारत और अन्य विकासशील देशों के मत्स्य पालन क्षेत्र को अब भी कम आय वाले मछुआरों की आजीविका की रक्षा के लिए समर्थन की आवश्यकता है। इस सहायता में जहाजों के निर्माण, अधिग्रहण, आधुनिकीकरण या उन्नयन के लिए मछुआरों को दी जाने वाली सब्सिडी शामिल है।


समुद्री संसाधनों के विलुप्त होने के बारे में संयुक्त राष्ट्र की चिंता जायज है, लेकिन इसके लिए विश्व व्यापार संगठन जो उपाय कर रहा है, वह समाधान नहीं करने वाला है, बल्कि नया समझौता छोटे मछुआरों की आजीविका को नुकसान पहुंचाएगा। बड़ी कंपनियों द्वारा मछली पकड़ने से तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और उनकी गरीबी बढ़ती जा रही है।


फरवरी, 2024 में अबू धाबी में होने वाले डब्ल्यूटीओ के 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन से पहले इस संबंध में प्रारंभिक बातचीत शुरू हो गई है। खबरों के मुताबिक, विकासशील देशों का कहना है कि बड़े पैमाने पर औद्योगिक मछली पकड़ने की सब्सिडी में अन्य प्रकार की सब्सिडी की तुलना में अधिक कड़े प्रावधान होने चाहिए। अभी ऐसा लगता है कि विकसित देश अवैध, असूचित और अनियमित मछली पकड़ने के नाम पर विकासशील देशों के छोटे और पारंपरिक मछुआरों को मिलने वाली सब्सिडी को सीमित करने का दबाव बना रहे हैं। लेकिन वे बड़े निगमों द्वारा सुदूर समुद्र में मछली पकड़ने को प्रतिबंधित करने के बारे में गंभीर नहीं हैं, जो समुद्री संसाधनों को खत्म करने के असली दोषी हैं। भारत को अपने छोटे मछुआरों के हितों की रक्षा हेतु सख्त रुख अपनाना होगा। हाल ही में, हमने भारत के विभिन्न हिस्सों में तनावग्रस्त मछुआरों द्वारा आत्महत्याएं देखी है। ऐसे में जो भी मामूली सब्सिडी दी जा रही है, उसे बंद करने से स्थिति और बिगड़ जाएगी। 

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