अपने 50 वर्षों के कूटनीतिक अनुभव में मैंने स्थापित अंतरराष्ट्रीय परंपराओं का ऐसा घोर उल्लंघन होते नहीं देखा। उन्होंने अपनी मूर्खता का एहसास करते हुए अमेरिका में अपने चाचा और अपने पश्चिमी सहयोगियों से भारत के खिलाफ बयान देने की विनती करने की एक बड़ी गलती की। यह बात अलग कि सभी ने ऐसा करने से मना कर दिया। उन्होंने भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर चर्चा करने के लिए एक व्यापार प्रतिनिधिमंडल की यात्रा रद्द करके भी गलती की, क्योंकि कनाडा को भारत की तुलना में इस एफटीए की ज्यादा जरूरत है। उनकी एक और गलती यह रही कि उन्होंने एक ऐसे उच्चायुक्त को भारत भेजा, जो धैर्य व शांति से व्यवहार करना नहीं जानता और रिपोर्टर के मुंह पर गुस्से से कार का दरवाजा बंद कर लेता है। अभी एक दिन पहले कनाडा में गैंगवार में एक और खालिस्तानी आतंकी की हत्या कर दी गई।
कनाडा हत्याओं का देश बन गया है। वहां किसी दूसरे देश की तुलना में प्रति व्यक्ति ज्यादा आतंकी और गैंगस्टर मौजूद हैं। ये ड्रग तस्कर, आतंकवादी और गैंगस्टर आपस में लड़ रहे हैं। एक खुर्राट किस्म का खालिस्तानी, हेकड़ी दिखाते हुए सभी हिंदुओं को कनाडा छोड़कर जाने की चेतावनी देते हुए वहां मौजूद बड़े भारतीय समुदाय को धर्म के आधार पर विभाजित करने की कोशिश कर रहा है। इस पर खामोश रहकर ट्रूडो एक और गलती कर रहे हैं। अब या तो वह मानसिक तौर पर अस्थिर हैं या वह खालिस्तानियों के साथ एक गंभीर किस्म के समझौते में हैं। उल्लेखनीय है कि ये वही खालिस्तानी हैं, जिन्होंने कई दशक पहले एक भारतीय विमान को उड़ा दिया था, जिसमें 300 से ज्यादा कनाडाई नागरिक मारे गए थे। तब उनके पिता कनाडा के प्रधानमंत्री थे। आज खालिस्तान समर्थक अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। कुछ खालिस्तान समर्थक तो उनकी कैबिनेट में भी हैं। यह उनकी एक और गलती है।
पांच साल पहले, जब ट्रूडो भारत की अपनी आधिकारिक यात्रा पर खालिस्तानी के रूप में चिह्नित हो चुके लोगों को साथ लाए थे, तभी उन्होंने अपनी मनोदशा का परिचय दे दिया था। मुझे लगता है कि ट्रूडो के खालिस्तानी संरक्षकों ने उनसे नई दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन के अंतिम घोषणापत्र में सभी अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता के अधिकार जैसे विवादास्पद मुद्दों का उल्लेख करवाकर माहौल खराब करने के लिए कहा था। हालांकि वह ऐसा कर नहीं सके। हुआ यह कि जी-20 के नई दिल्ली घोषणापत्र ने, जिस पर ट्रूडो ने भी हस्ताक्षर किए थे, आतंकवाद की पूरी तरह से निंदा की। इस पर एक बिगड़ैल बच्चे की तरह प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने भारत के राष्ट्रपति द्वारा आयोजित आधिकारिक जी-20 रात्रिभोज में भी शामिल होने से इन्कार कर दिया, जो एक मूर्खतापूर्ण फैसला था। उनका विमान खराब हो गया और उन्होंने होटल के अपने कमरे से बाहर आने से इन्कार करते हुए नई दिल्ली में दो दिन अतिरिक्त बिताए। यह उनका एक और मूर्खतापूर्ण कदम रहा।
उनके खालिस्तानी आका उन्हें नौकरी से निकाल न दें, इसलिए वह भारत पर हास्यास्पद आक्षेप लगा रहे हैं। करीब एक दशक पहले जब अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर लादेन को मारा था, या हाल ही में जब अफगानिस्तान में शरण लिए जवाहिरी अमेरिकी ड्रोन मिसाइल का शिकार बना, तब क्रमशः पाकिस्तान व अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का क्या ट्रूडो ने विरोध किया? भारत की कड़ी प्रतिक्रिया और दूसरे देशों से समर्थन न मिलने पर अब ट्रूडो पीछे हटने की कोशिश कर रहे हैं और चाहते हैं कि मामला शांत हो जाए। ऐसे में, ट्रूडो के अजीब व्यवहार के पीछे की वजह खालिस्तानी पार्टियों से उनकी अल्पमत सरकार को मिल रहा वित्तीय और राजनीतिक समर्थन क्यों न माना जाए?
ट्रूडो दो बार चीनी वायरस की चपेट में आ चुके हैं। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डॉक्टरों ने पुष्टि की है कि अगर कोई लंबे समय तक कोविड पीड़ित रहे, तो वह मानसिक क्षति का शिकार होता है। फिर उन पर अपनी टूटती शादी को बचाने का भी दबाव है। कनाडा दरअसल खालिस्तान समर्थकों के लिए पाकिस्तानी खुफिया विभाग के अपने आकाओं से मिलने और उनसे प्रशिक्षण पाने के लिए पाकिस्तान जाने का एक सुविधाजनक बिंदु बन गया है। ट्रूडो भारत पर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगा रहे हैं। फिर, भारत में किसान आंदोलन पर उनका भड़काऊ बयान क्या था?
टाइटेनिक से भी तेजी से डूबती उनकी लोकप्रियता, महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त और लड़खड़ाती हुई अर्थव्यवस्था के सम्मुख ट्रूडो कनाडियन रैंबो बनकर अपनी नौकरी बचाने का जुगाड़ कर रहे हैं। मुझे याद है कि 2021 की शुरुआत में उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री को फोन करके कोविड से निपटने के लिए भारतीय टीकों का अनुरोध किया था, जिस पर नरेंद्र मोदी ने बड़ी विनम्रता से जवाब भी दिया था। दरअसल, ट्रूडो कनाडा के सबसे बड़े दुश्मन हैं, जो अपने ही देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने पुतिन के साथ अकारण दुर्व्यवहार करके रूस के साथ रिश्ते खराब किए। चीन और अमेरिका के साथ भी अपनी नादानी की वजह से उन्होंने रिश्ते चौपट किए, और अब भारत के साथ कर रहे हैं। ट्रूडो दरअसल एक भ्रमित नेता हैं, और उनकी अगली गलती का इंतजार करते हुए मुझे बारबरा टचमैन की पुस्तक द मार्च ऑफ फॉली (1984) की याद आती है, जिसमें बताया गया है कि कैसे सरकारें लगातार अपने ही हितों के खिलाफ काम करती हैं। कनाडा को फिलहाल और झेलना है।