कोविड-19 के चलते जब कोई अच्छी खबर नहीं मिल रही, ऐसे वक्त में गन्ना किसानों के लिए उच्चतम न्यायालय का फैसला संजीवनी की तरह आया है। विगत 27 फरवरी को सभी पक्षों की बातें सुनने के बाद पांच जजों की संविधान खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने गन्ना मूल्य घोषित करने के राज्य सरकार के अधिकार को सही माना और चीनी मिलों के वकीलों की याचिका को सात जजों की बेंच में विचार के लिए भेजने से इन्कार कर दिया।
आम किसानों को इस आदेश का महत्व नहीं मालूम और न ही मैंने उन्हें कभी बताया कि अगर सात जज पूर्व के 2004 के पांच जजों के फैसले को बदल देंगे, तो न सिर्फ आगे केंद्र द्वारा निर्धारित कम मूल्य मिलेगा, बल्कि उन्हें 1996 से राज्य सरकार और केंद्र सरकार के गन्ना मूल्य का अंतर वापस करना पड़ सकता है, क्योंकि मुकदमे के चलते कई वर्षों तक गन्ने की पर्ची पर लिखा था, 'लेन-देन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत किया जाएगा।'
पिछले कुछ समय से नौजवान पीढ़ी खेती से दूर जा रही है और ऐेसे में अगर मैं उन्हें असलियत बता देता, तो बहुत से परिवार पैसे वापस करने के डर से जमीन बेच देते। मेरा लक्ष्य खेती को जिंदा कर नौजवानों को जीविका देना है, उन्हें खेती से अलग करना नहीं।
2004 के फैसले को विचार के लिए सात जजों की बेंच को भेजने की बात कब और कैसे उठी, इसे जानने के लिए हमें 1996-97 पेराई सत्र में जाना होगा। उत्तर प्रदेश के मिलों ने एक नवंबर से गन्ना लिया, पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका डाली, जिसमें 11 दिसंबर,1996 को जस्टिस मार्कंडेय काटजू और बलवीर सिंह चौहान ने आदेश दिया कि राज्य सरकार के पास गन्ना मूल्य घोषित करने का अधिकार नहीं है। इसके खिलाफ किसानों ने आंदोलन किया और तीन किसान शहीद हो गए। सरकार उच्चतम न्यायालय गई। 22 जनवरी, 1997 को जस्टिस भरुचा और जस्टिस वी एन खरे ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया। चीनी मिलें गन्ना तो ले रही थीं, पर पैसा नहीं दे रही थीं।
मेरे एक मामले में लखनऊ खंडपीठ ने 27 फरवरी, 1997 को बुलंदशहर की अगौता चीनी मिल की रिकवरी इस साल भी पिछले साल के 70 रुपये की दर के आधार पर करने की मंजूरी दी, तो सरकार ने छह मार्च, 1997 को पर्ची पर 70 रुपये प्रति क्विंटल की दर निर्धारित करने का आदेश दिया।
इसके बाद मैंने लखनऊ खंडपीठ में रिट याचिका दाखिल की, जिसमें मैंने कहा कि सरकार और मिल मालिकों की मिलीभगत से उन्होंने इलाहाबाद न्यायालय में यह तथ्य छिपाया कि राज्य सरकार द्वारा निर्धारित गन्ना मूल्य आरक्षण और फॉर्म-सी की वजह से समझौता मूल्य है, इसलिए एसएपी (राज्य परामर्श मूल्य) को सही मानते हुए 72 रुपये दिलवाया जाए और साथ में किसानों को 14 दिन विलंब के बाद ब्याज दिया जाए।
एक फरवरी, 1999 को न्यायाधीश हैदर अब्बास रजा और जस्टिस मैथिली शरण ने एसएपी को समझौता मूल्य मानते हुए राज्य सरकार के अधिकार को माना और ब्याज समेत पैसा देने का आदेश पारित किया। मिल मालिकों ने इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की और कहा कि राज्य सरकार के गन्ना मूल्य को जब इलाहाबाद न्यायालय ने खारिज कर दिया, तब उसे लखनऊ खंडपीठ कैसे बहाल कर सकता है, उसे खारिज किया जाए।
दोनों मुकदमे नवंबर, 2000 में न्यायाधीश वी एन खरे और न्यायाधीश के जी बालकृष्णन के सामने आए। कोर्ट ने पंद्रह मिनट में चीनी मिलों के उच्च कोटि के वकीलों को सुना, कोर्ट जब मिलों के हक में फैसला लिखवा रहा था, तो मैंने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार और मिल मालिक मिले हुए हैं और अगर हमें नहीं सुना गया, तो किसान बर्बाद हो जाएंगे। हमारी दलील सुनने के बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि एक सोसाइटी में एक दर और एक मिल में एक दर होगी, जिससे फॉर्म सी के समझौते के बाद निजी मिलों को भी राज्य सरकार की दर से भुगतान करना पड़ा।
चूंकि शांति भूषण, वेणुगोपाल साहब ने गन्ना मूल्य संबंधी सुप्रीम कोर्ट के दो आदेशों में विरोधाभास बताया, इसलिए कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया। इस आदेश के बाद भी जब निजी मिलों ने एसएपी से कम दर दिया, तो मेरी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी मिल मालिकों, गन्ना आयुक्तों और प्रमुख सचिव के खिलाफ अवमानना का नोटिस दिया। पांच जजों की संविधान पीठ में सुनवाई हुई। संविधान पीठ ने हमारे मामले में लखनऊ पीठ के फैसले को सही माना और उसके बाद किसानों को पिछले भुगतान का अंतर मिला।
मैंने सोचा था कि अब मामला खत्म हो गया, लेकिन मिल मालिक कोर्ट चले गए। उन्होंने कहा कि दर निर्धारण में गलती है, यह कम होनी चाहिए, क्योंकि मिल घाटे में है। मैंने कोर्ट को बताया कि मिल मालिक फायदे में हैं। फैसला हमारे पक्ष में आया, तो मिल मालिक सुप्रीम कोर्ट चले गए, पर भुगतान का अंतर दिया।
दूसरी तरफ सरकार की मौजूदगी में एक मिल मालिक ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से 30 अगस्त, 2008 को एक आदेश लिया, जिसमें फिर कहा गया कि राज्य सरकार को दर तय करने का अधिकार नहीं है और केंद्र द्वारा निर्धारित दर दी जाए। इस फैसले के खिलाफ मैंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, बाद में सरकार भी आई और दोनों मुकदमे अन्य मुकदमों के साथ तीन जजों की बेंच में नवंबर, 2011 को सुने गए। कोर्ट ने पहले तो किसानों को सहकारी मिलों से 125-30 रुपये दिलवाए और फिर एक सोसाइटी एक दर के आदेश के तहत निजी मिल मालिकों को भुगतान का आदेश दिया। वहीं कोर्ट ने 1996 और 2004 के आदेशों में विरोधाभास को मानते हुए मामले को सात जजों की बेंच में विचार के लिए भेजने की सिफारिश की।
चूंकि तीन जजों की बेंच सात जजों की बेंच की सिफारिश नहीं कर सकती, इसलिए पांच जजों के सामने फरवरी, 2020 में मामला आया, जिन्होंने अपने आदेश में कहा कि उक्त दोनों आदेशों में कोई विरोधाभास नहीं है। उन्होंने कहा कि 2004 का आदेश सही है कि राज्य सरकार को गन्ना मूल्य तय करने का अधिकार है। राज्य सरकार को 2020-21 के पेराई सत्र में किसानों को उनका वाजिब हक, लागत के डेढ़ गुना दाम दिलवाने की तैयारी करनी चाहिए, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित न हो और किसानों की जीविका चलती रहे। -लेखक अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक हैं।