प्रजातंत्र में जनहित याचिका कानूनी तरीके से सामाजिक परिवर्तन को प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसे पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) के नाम से भी जाना जाता है। जनहित याचिका एक ऐसा अभिनव माध्यम है, जिसमें न्यायालय के समक्ष एक याचिका प्रस्तुत कर सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाया जाता है। इसे हम न्यायिक सक्रियता का परिणाम भी कह सकते हैं, जिसके माध्यम से शासन से बड़े सार्वजनिक हित पूरा करने की मांग की जाती है। उचित मुद्दा होने पर सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर उस मुद्दे के निराकरण हेतु आदेश देते हैं।
संविधान में अनुच्छेद 14, 15, 16, 17, 19, 21, 22, 23, 25, 32 तथा 226 ऐसे अनुच्छेद हैं, जिनके माध्यम से जनहित के मामले उठाए जा सकते हैं। विगत कुछ वर्षों में इसने जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी छुआ है। विडंबना यह है कि जनहित के सारे मामले सरकार के अपने अधिकारों के दुरुपयोग और जनता के अधिकारों की अवहेलना से पैदा होते हैं।
बीती सदी के सत्तर के दशक में भारतीय न्यायपालिका में जनहित याचिकाओं की नई अवधारणा प्रचलित हुई, जो देश के दलित, शोषित और पिछड़े वर्ग के लिए वरदान साबित हुई। रतलाम नगर निगम प्रकरण से शुरुआत कर विगत बरसों में सर्वोच्च एवं अनेक उच्च न्यायालयों ने विभिन्न मामलों में गरीब तथा लाचार लोगों तक न्याय की पहुंच को आसान बनाया है।
जनहित याचिकाओं का दर्शन यह है कि न्याय पाने में असमर्थ वर्ग के बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए गुहार की जाए। हाल ही में एक जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ शहर में सड़क के किनारे लगाए गए बैनरों के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। इस फैसले में शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि जनहित याचिका वास्तविक जनहानि के निवारण के लिए है।
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित अधिकारों को गंभीर चोट पहुंचाने की एक वैध आशंका हमेशा मौजूद रहती है। यही आशंका न्यायालय से पर्याप्त उपचार की मांग करती है। पर्यावरण के क्षेत्र में जनहित याचिकाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। एमसी मेहता उन याचिकाकर्ताओं में से एक हैं, जिन्होंने पर्यावरण से संबंधित अनेक मामलों में जनहित याचिकाएं प्रस्तुत कीं तथा जिन पर न्यायालयों ने अनेक महत्वपूर्ण आदेश पारित किए।
पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन, पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, नेशनल एडवाइस फॉर पीपल्स मूवमेंट तथा बंधुआ मुक्ति मोर्चा ऐसे प्रमुख संगठन हैं, जिन्होंने निरंतर जनहित याचिकाओं के माध्यम से गरीब, पिछड़े एवं असहाय वर्ग की मदद करने की कोशिश की है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े संगठनों एवं व्यक्तियों ने भी नर्मदा बांध के कारण विस्थापितों के अधिकारों, उनके मुआवजे एवं उनकी पुनर्स्थापना के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई आज भी कुछ न्यायालयों में लंबित है। जनहित याचिकाओं के माध्यम से अनेक अन्य संगठनों एवं व्यक्तियों ने भी समाज के निर्धन एवं असहाय वर्ग के लिए संघर्ष किया।
लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस महत्वपूर्ण साधन के दुरुपयोग के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। देश भर में सरकार अथवा निजी क्षेत्र की किसी भी परियोजनाओं को रुकवाने के लिए कुछ निहित स्वार्थ वाले लोग इस माध्यम का दुरुपयोग करते हैं। इनमें कुछ मजदूर यूनियनों से लेकर रक्षा सौदों और अन्य परियोजनाओं के ठेकेदारों तक का संगठित गिरोह सक्रिय रहता है, जो इसके माध्यम से अपने हित पूरे करता है।
इन्हीं वजहों से सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान के एक ट्रस्ट पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है और उसके जनहित याचिका पेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। हाल ही में एक मामले में पीआईएल को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राजनीतिक एजेंडा वाले लोगों द्वारा जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है और इसकी बढ़ती संख्या न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है। जाहिर है, जनहित याचिकाओं ने गरीबों, वंचितों के हक में एक सराहनीय काम किया है, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए समुचित उपाय भी तलाशने होंगे।