पिछले महीने आई एक किताब में ये दोनों गुण हैं। इस पुस्तक का नाम है- एच पॉप : द सीक्रेटिव वर्ल्ड ऑफ हिंदुत्व पॉप स्टार्स। इसके लेखक मुंबई के एक युवा कुणाल पुरोहित हैं। हालांकि मैं इनसे कभी नहीं मिला, न ही इनके बारे में सुना, इसके बावजूद इस पुस्तक की एक सॉफ्ट कापी पिछले दिनों मेरे इनबॉक्स में आई। जितना मैं जानता हूं, एच पॉप पहली किताब है, जिसमें दक्षिणपंथी हिंदुओं द्वारा पॉपुलर कल्चर का इस्तेमाल करने और गाली देने की गहन पड़ताल की गई है। इसमें आए चरित्रों को सावधानीपूर्वक उकेरा गया है। संगीतकारों पर जो कुछ लिखा गया है, वह इस किताब को बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें कुछ संगीतकारों द्वारा प्रयोग किए शब्दों और उनकी भावनाओं का विश्लेषण किया गया है कि कैसे वे मुस्लिमों को अमानवीय बताते हैं। हालांकि यह किताब संगीत के अलावा हिंदुत्व से प्रभावित कविताओं और पुस्तकों का भी विश्लेषण करती है। तुलनात्मक अध्ययन कुणाल पुरोहित की इस किताब की खासियतों में से एक है।
लेखक दक्षिणपंथी पॉप कल्चर की ताजा वैश्विक प्रवृत्ति से परिचित है, जो भारतीय दक्षिणपंथी संगीत के उसके विश्लेषण को व्यापक बनाता है। यह किताब जर्मन नाजियों, इटली के फासिस्टों, रवांडा में जनसंहार को अंजाम देने वालों, अल कायदा और समकालीन यूरोप व उत्तर अमेरिका में श्वेत वर्चस्ववादियों द्वारा गीतों और कविताओं के जरिये सुनियोजित तरीके से प्रोपोगैंडा फैलाने के बारे में बताती है। मैं नहीं जानता कि पुरोहित गीत लिखते या संगीत सुनते हैं या नहीं। लेकिन निश्चित रूप से संगीत में उनकी गहरी रुचि है। पुरोहित ने जिन गीतों की पड़ताल की है, वे बताते हैं कि हिंदुओं ने अतीत में कैसे कथित खतरनाक दुश्मनों का सामना किया है और अब भी कर रहे हैं। यहां एक गाने की कुछ पंक्तियां पेश हैं, जिन्हें एक हरियाणवी गायक ने गाया है :
वंदे मातरम गाना होगा/वर्ना यहां से जाना होगा/ नहीं गए तो जबरन तुझे भगा देंगे/ हम तुझको तेरी औकात बता देंगे। कुछ दूसरे गीत भी हैं, जो मुस्लिम आक्रमणकारियों की बर्बरता उजागर करते हैं। पुरोहित द्वारा उद्धृत एक कविता में जोगराज सिंह गुर्जर नामक एक काल्पनिक योद्धा का जिक्र है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने तैमूर की सेना को हराकर उसे हरिद्वार की सीमा पर ही रोक दिया था। इस मनगढंत कहानी को एक वीडियो के रूप में ढालकर उसे उत्तर प्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अभिनेत्री कंगना रनौत द्वारा अपने फेसबुक पेज पर साझा किया गया था, जिसमें रनौत ने अपने फॉलोअर्स से आह्वान किया था कि वे तैमूर लंग को परास्त करने वाले इस शक्तिशाली गुर्जर राजा की कहानी को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। अपने संदेश में उन्होंने लिखा, ‘सभी मतदाताओं से मैं अपील करती हूं कि वे हमारे बहादुर पूर्वजों के बलिदान का सम्मान करें और मतदान वाले दिन हमारे राष्ट्र की सुरक्षा के लिए मतदान करें।’
दरअसल, जिन गीतों ने एच-पॉप को आकार दिया है, उनका उद्देश्य है कि अतीत को दोबारा लिखा जाए, ताकि मुस्लिमों को विश्वासघाती और हिंदुओं को बहादुर व महान के रूप में चित्रित किया जा सके। ये गीत श्रोताओं से उम्मीद करते हैं कि वे अपनी तार्किक बुद्धि को परे रखकर सिर्फ भावनाओं का उपयोग करें। ताकि, जैसा पुरोहित कहते हैं, ‘हिंदुत्व को जीवित रखने और फलने-फूलने के लिए लगातार नए दुश्मन पैदा किए जाते रहें।’ इनमें से कई गीत व कविताएं मुस्लिमों की आबादी बढ़ने से उपजे अतार्किक डर को बढ़ावा देते हैं।
इनमें इस झूठ को हवा दी जाती है कि मुस्लिम इतनी तेजी से अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं कि वे जल्द ही हिंदुओं को पीछे छोड़ देंगे और उन्हें अपने ही देश में अल्पसंख्यक बना देंगे। जरा इन पंक्तियों पर गौर करें – कुछ लोगों की तो साजिश है/ हम बच्चे खूब बनाएंगे/जब संख्या हुई हमसे ज्यादा/ फिर अपनी बात मनवाएंगे। महात्मा गांधी की जीवनी के लेखक के रूप में, मैं पुरोहित की एक कविता से खासा प्रभावित हुआ, जिसमें गांधी पर हमला करते हुए नाथूराम गोडसे का गुणगान किया गया है। इस कविता में हर चीज के लिए गांधी को दोषी ठहराया गया है। इसके अनुसार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी और स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए दूसरे नेताओं की अनदेखी करते हुए नेहरू का समर्थन करने के लिए वही जिम्मेदार थे। कविता का बुनियादी निष्कर्ष था कि गांधी की हत्या उचित और आवश्यक थी। कविता कहती है, ‘अगर गोडसे की गोली उतरी न होती सीने में, तो हर हिंदू पढता नमाज, मक्का और मदीने में। मूक अहिंसा के कारण भारत का आंचल फट जाता, गांधी जीवित होते तो फिर देश दोबारा बंट जाता।’
पुरोहित की पुस्तक बताती है कि कैसे लोकप्रिय संस्कृति के हथियारीकरण ने भाजपा के राजनीतिक उत्थान में मदद की है। इन संस्कृति की दुहाई देते हुए लिखी जा रही इन जहरीली रचनाओं को दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में ज्यादा दर्शक मिलते हैं।
यह किताब हिंदू दक्षिणपंथ की कल्पनाओं की ओर खुलने और परेशान करने वाली एक खिडकी की ओर इशारा करती है। जैसा लेखक अपने निष्कर्ष में लिखते हैं, ‘प्रचार को लोकप्रिय संस्कृति में पिरोने के प्रयास ज्यादा बेशर्म और इनके नतीजे ज्यादा घातक हो गए हैं। हिंदुत्व की जय-जयकार करना आर्थिक तौर पर ज्यादा फायदेमंद हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के किसी भी प्रमुख नेता ने इन गीतों, कविताओं का सार्वजनिक तौर पर समर्थन नहीं किया है।'
मैंने इस पुस्तक को आकर्षण और भय के साथ पढ़ा। मैं लंबे समय से संगीत को एक कला मानता रहा था, जिसका मुख्य उद्देश्य मनुष्यता का उत्थान, मनोरंजन और मानवता को खुशी प्रदान करना है। लेकिन अफसोस, बिस्मिल्लाह खान, एमएस सुब्बुलक्ष्मी, किशोरी अमोनकर और किशोर कुमार के देश में, संगीत अब दक्षिणपंथी प्रचार का एक हथियार और हिंसा व प्रतिशोध का माध्यम बन गया है।