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संस्कृति के पन्नाें से: कैसे बना विष्णु का सुदर्शन चक्र और शिव का त्रिशूल

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 03 Dec 2023 07:12 AM IST

सार

सूर्यदेव को एहसास हुआ कि उनके तेज प्रकाश और ताप के कारण उनकी पत्नी संज्ञा के लिए उनके साथ रहना कठिन हो गया था। परंतु अपने ताप को कम करना सूर्य के वश में नहीं था।
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Sudarshan Chakra - फोटो : सोशल मीडिया


संज्ञा ने एक स्त्री को प्रकट किया, जो बिल्कुल उसी की तरह दिखती थी। संज्ञा की प्रतिच्छाया होने के कारण संज्ञा ने उसका नाम भी छाया रखा। फिर संज्ञा ने छाया को सूर्य की पत्नी बनकर रहने के लिए मना लिया और उसे अपनी पहचान छिपाकर रखने का आदेश दिया। छाया ने भी संज्ञा को आश्वासन दिया कि वह किसी को यह रहस्य नहीं बताएगी किंतु यदि किसी ने उसके केश खींचे तो फिर वह सच बोल देगी।


छाया को सूर्यदेव के पास छोड़कर संज्ञा, अपने पिता विश्वकर्मा के घर लौट आई। पिता के पूछने  पर संज्ञा ने उन्हें सारी बात बता दी। विश्वकर्मा के अनेक बार समझाने पर भी संज्ञा अपने पति के पास लौटने के लिए तैयार नहीं हुई। इधर छाया, सूर्य की पत्नी बनकर रहने लगी। यहां तक कि सूर्य से छाया ने ताप्ती नाम की पुत्री और सावर्णी एवं शनि नाम के दो पुत्रों को भी जन्म दिया। छाया की अपनी संतान हो गईं तो उसका लगाव संज्ञा के बच्चों के प्रति कम होने लगा।


समस्त संसार को प्रकाशित करने वाले सूर्यदेव से भला क्या छिप सकता था! उन्हें छाया पर संदेह हो गया तो एक दिन उन्होंने पूछताछ की। छाया ने असल बात छिपाने का बहुत प्रयास किया। फिर सूर्यदेव को क्रोध आ गया और उन्होंने छाया के केश पकड़ लिए। तभी छाया ने सूर्यदेव को सारी बात सच-सच बता दी।


संज्ञा ने जो किया, उसे सुनकर सूर्य को दुख हुआ और क्रोध भी आया। वह तुरंत विश्वकर्मा के पास पहुंचे। विश्वकर्मा ने संज्ञा के व्यवहार के लिए सूर्य से क्षमा तो मांग ली किंतु उन्होंने संज्ञा को सूर्य के ताप और प्रकाश से होने वाली परेशानी के विषय में भी बता दिया। तब जाकर सूर्यदेव को एहसास हुआ कि उनके तेज प्रकाश और ताप के कारण उनकी पत्नी संज्ञा के लिए उनके साथ रहना कठिन हो गया था। परंतु अपने ताप को कम करना सूर्य के वश में नहीं था। उन्होंने विश्वकर्मा से ही इस समस्या का हल निकालने का अनुरोध किया।


‘मैं छाया के साथ नहीं, अपितु संज्ञा के साथ रहना चाहता हूं। आप ही बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?’ सूर्य ने पूछा।

इस पर विश्वकर्मा ने सूर्य से कहा , ‘यह आपके अत्यधिक तेज और ताप का परिणाम है। मैं आपके तेज का कुछ अंश काटकर अलग कर देता हूँ। चमक और ताप में कमी आ जाएगी तो संज्ञा की परेशानी भी दूर हो जाएगी।’

सूर्य ने विश्वकर्मा की बात मान ली। सूर्य की मूल आभा को विश्वकर्मा ने कम कर दिया। इससे तुरंत ही सूर्य का ताप कम हो गया।


सूर्य का बदला हुआ स्वरूप देखकर संज्ञा को बहुत राहत मिली और वह फिर से उनके संग रहने के लिए मान गई। ऐसा करने से सूर्य द्वारा संसार को दिए जा रहे प्रकाश और ताप पर भी विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। 
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विश्वकर्मा के सामने अब यह प्रश्न था कि सूर्य के तेज का जो अंश उन्होंने काटकर अलग किया था, उसका क्या उपयोग किया जाए। तब काफी विचार-विमर्श करने के उपरांत विश्वकर्मा ने सूर्य के अतिरिक्त स्वर्णिम तेज से तीन दिव्य वस्तुओं का निर्माण किया – सुदर्शन चक्र, पुष्पक विमान और त्रिशूल। 


पुष्पक विमान, विश्रवानंदन कुबेर को मिला और त्रिशूल को भगवान शिव ने धारण कर लिया। सुदर्शन चक्र को धारण करने का अधिकार भगवान विष्णु को प्राप्त हुआ। इस प्रकार, संज्ञा का कष्ट दूर करने हेतु सूर्यदेव के अतिरिक्त तेज से सृष्टि की तीन दिव्य वस्तुओं का निर्माण संभव हो पाया।

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