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गांधी जी का आखिरी आदमी, पढ़ें ए अरविंदाक्षन का आलेख

ए. अरविंदाक्षन Published by: ए अरविंदाक्षन Updated Fri, 02 Oct 2020 04:19 AM IST
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गांधी जी

गांधी जी ने कहा था, जब कभी तुम्हारे मन में शंका पैदा हो या तुम अपना ही अधिक विचार करो, तब यह कसौटी अपने सामने रखो। जिस गरीब से गरीब और दुर्बल से दुर्बल मनुष्य को तुमने देखा हो, उसका चेहरा याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो, वह उस मनुष्य के लिए किस प्रकार उपयोगी होगा? इनमें उनकी कई अवधारणाएं व्यंजित हैं, जैसे स्वतंत्रता, अहिंसा, सभ्यता, संस्कृति, मानवीयता, स्वराज, सत्य, सत्याग्रह, सर्वधर्म समभाव, नैतिकता, आत्ममंथन और विचार एवं कर्म का संतुलन आदि। गांधी जी विश्वधर्मी नागरिक हैं। उनके कार्यकलापों का आरंभ दक्षिण अफ्रीका से होता है। वह उनका नस्लविरोधी आंदोलन था। 



जब गांधी जी इस आंदोलन में शरीक हुए, तब उन्होंने देखा उनके आंदोलन सहयोगी मामूली मजदूर हैं। जब वह भारत आए और भारत का भ्रमण किया, तो एक बहुत बड़े सच का सामना उन्हें करना पड़ा और वह था विपन्नता में जीने वाले लोग। तुलसीदास ने भी गरीबी को सबसे बड़ा दुख माना है। गांधी जी का भी यही अभिप्राय था। उनके सामने कई समस्याएं थीं, गरीबी, जाति प्रथा, धार्मिक रूढ़ियां और गुलामी। गांधी जी ने ठान लिया था कि देश की सेवा का तात्पर्य जनता की सेवा है। जनता उनकी दृष्टि में वह बहुसंख्यक जनता है, जो गरीबी के दलदल में फंसी है। जब तक इस जन समुदाय को हम विपन्नता से मुक्त नहीं कर पाएंगे, तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। अत: गांधी जी की स्वतंत्रता संबंधी अवधारणा राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी, वह एक व्यापक अवधारणा थी। यह स्वतंत्रता की समग्रता का विश्व-दर्शन है, जिसको आत्मसात करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को दीन-दुर्बल तक पहुंचना होगा। गांधी जी की देश सेवा और समाज सेवा के केंद्र में यही आखिरी आदमी था। आज की राजनीति में सेवा भाव समाप्त हो गया है। 


आज की राजनीति में इसलिए आखिरी मनुष्य विचारणीय नहीं होता। उसमें पहला आदमी ही नजर आता है, जो सेवा की कृत्रिम पोशाक पहनकर अवतरित होता है। उसके साथ तस्कर, घूसखोर, चोर, उचक्के और कातिल लोग शामिल होते हैं। गांधी जी का आखिरी आदमी भारतीय समाज का प्रतिनिधि है। उस आखिरी आदमी को नजरंदाज करने का तात्पर्य है स्वतंत्रता की समग्रता को भूल बैठना। गांधी जी की दृष्टि में अधिकार प्राप्ति ही स्वतंत्रता प्राप्ति नहीं है। इसलिए वह हमेशा अधिकार से दूर रहे। जबकि आज की राजनीति पूरी तरह अधिकार से संचालित है। गांधी जी की लघु पुस्तक हिंद स्वराज के कई विचारों से कई लोग सहमत नहीं हैं। लेकिन कई प्रकार की बुनियादी बातें उन्होंने कही हैं। इस पुस्तक के पंद्रहवें अध्याय, ‘इटली और हिंदुस्तान’ में वह लिखते हैं, स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं देश का हित समझता हूं। अगर देश का हित अंग्रेजों के हाथों होता हो, तो अंग्रेजों को झुककर नमस्कार करूंगा। वह कहते हैं कि अधिकार का हस्तांतरण स्वतंत्रता नहीं है। एक शब्द का विशेष प्रयोग उन्होंने किया है, देश का हित। 


अंग्रेजों का चले जाना मुख्य नहीं है। मुख्य है देश का हित। इस हित का लक्ष्यार्थ अंतत: उनके आखिरी आदमी तक पहुंच जाता है। गांधी जी सत्य पर जोर देते रहे हैं, क्योंकि सत्य उनके लिए ईश्वर का पर्याय है। झूठ की बैसाखी पर एक स्वस्थ समाज टिक नहीं सकता। यहां पर वह नैतिकता को भी सत्य के साथ जोड़ देते हैं। ईश्वर के प्रति निष्ठा या आस्था, सत्य के प्रति प्रतिबद्धता और नैतिक बल-इन तीनों तत्वों को वह अपने जीवन में उतारते हैं। फिर दूसरों को विवश करते हैं। विचार और कर्म का संतुलन वह हमेशा बनाए रखते हैं। समाज सेवा में इन सब की अनिवार्यता है। उनके सबसे प्रिय प्रार्थना गीत में वह इन्हीं की अनुगूंज सुनते थे, वैष्णव जन तो तेने कहिए जे, पीड़ पराई जाणे रे। इस गीत में सत्य (ईश्वर-वैष्णव जन) और नैतिकता की प्रमुखता है, क्योंकि इसमें दूसरों के दुख को जानने की क्षमता है। राजनीति गांधी जी के लिए कोई पेशा नहीं है। वह उनके लिए धर्म (कर्तव्य) है।

स्वतंत्रता उनके लिए मनुष्य की पहचान है।


गांधी जी की अहिंसा दृष्टि को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। अहिंसा को गांधी जी ने स्वस्थ समाज के आदर्श के रूप में ही आत्मसात किया है। अहिंसा उनके लिए हथियार नहीं, जन तक पहुंचने का मार्ग है। आज जब हम गांधी जी की अहिंसा दृष्टि पर विचार करते हैं, तो हमें आश्चर्य होता है, क्योंकि उनकी राजनीति में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। आखिरी आदमी की गांधी जी की परिकल्पना कोई भाववादी दृष्टि की परिणति नहीं है। वह ठोस यथार्थवादी दृष्टि की परिणति है। समाज के अनजान भागों पर कोई गरीब दुर्बल और दीन व्यक्ति खड़ा है, तो वह नजरंदाज करने योग्य नहीं है। हमारी बड़ी-बड़ी परिकल्पनाएं तब तक सार्थक नहीं हो सकतीं, जब तक आखिरी आदमी को हम परिधि से उठाकर केंद्र में नहीं ला सकते। 


आज हम गांधी जी को भूल चुके हैं। आखिरी आदमी के प्रति ध्यान देने के उनके इशारे को हमने हवा में उड़ा दिया है। इसलिए ऐसे लोग समाज में बहुसंख्यक हैं। गरीब किसान कर्ज का बोझ सह न पाने के कारण आत्महत्या करते हैं। विकास के नाम पर किसानों को विस्थापित किया जाता है। स्त्रियों पर होने वाले बलात्कार और अन्य प्रकार के अत्याचारों की प्रचुरता है। दलितों पर हीनतम अत्याचार होते रहते हैं। राजनीति में अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है, और हमारी संसदीय संरचना इसके प्रति चुप्पी साधे है। धन केंद्रित एक कृत्रिम संस्कृति शीर्ष पर है। गरीबों की स्थिति शोचनीय है। सर्वत्र आखिरी आदमी नजर आ रहे हैं। गांधी जी ने उनके प्रति ध्यान देने की बात इसलिए कही थी कि हम अपने समाज में विद्यमान असमानता को दूर करें। हमारी आज की जाति केंद्रित, धर्म केंद्रित और धन केंद्रित राजनीति में गांधी जी की नैतिकता केंद्रित, सत्य केंद्रित और अहिंसा केंद्रित राजनीति के लिए क्या स्थान हो सकता है? पूरे जीवन में गांधी जी अकृत्रिम बने रहने का प्रयास करते रहे। लेकिन हम निरंतर कृत्रिम बनने के प्रयास में लीन हैं। ऐसे में, हम कहां तक गांधी जी के आदर्शों का साक्षात्कार कर पाएंगे?


 
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