संसद में सितंबर में जो तीन कृषि विधेयक, 'कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक-2020,' 'कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन, कृषि सेवा पर करार विधेयक - 2020' और 'आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक पारित किए गए थे, उनके विरोध में उसी समय से पंजाब में कृषि आंदोलन उभर गया था। पंजाब में इकतीस कृषि संगठनों ने राज्य को पूरी तरह बंद कर दिया है, ट्रेनें थम गई हैं, टोल प्लाजा बंद हैं, रिलायंस के मॉल और पेट्रोल पंप बंद कर दिए गए हैं और ‘जिओ सिम कार्ड’ का लोग बहिष्कार कर रहे हैं।
यह समझने के लिए कि किसान मोदी सरकार के कानूनों से इतने नाराज क्यों हैं और केंद्र सरकार क्यों आंदोलन को काबू करने में विफल रही है, यह जरूरी है कि हम पंजाब की राजनीति में किसान आंदोलनों की भूमिका और कृषि बिलों को लेकर किसानों को हो रही फिक्र की जड़ तक जाएं।
ब्रिटिश राज के दौरान किसान आंदोलन इसलिए हुए, क्योंकि उनका मकसद था- कैनाल टैक्स के जरिये कर बढ़ाने और भू-राजस्व में वृद्धि के औपनिवेशिक सरकार के प्रयासों का विरोध करना। पंजाब रियासत में किसान इसलिए विरोध कर रहे थे, क्योंकि जमींदारों और अधिकारियों द्वारा छीनी गई जमीन को वे वापस लेना चाहते थे। काश्तकारों ने जमींदारों को बटाई या उसका हिस्सा देने से इनकार कर दिया था।
वर्ष 1907 के ‘कैनाल कॉलोनी आंदोलन’ में पंजाब के कृषकों को सरदार अजित सिंह जैसे बड़े नेताओं ने संगठित किया था। वे शहीदे आजम भगत सिंह के चाचा थे। सरदार अजित सिंह ने ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन को संगठित किया था। यह आंदोलन 1906 के किसान विरोधी कानून, ‘पंजाब कॉलोनाइजेशन ऐक्ट’ के विरोध में था। इसमें पानी की दरें बढ़ाने के प्रशासन के आदेश का भी विरोध किया गया था।
काश्तकारों के अधिकारों को लेकर सामंती कृषि प्रणाली में जो अंतर्विरोध थे, उनके कारण विशेष रूप से कम्युनिस्ट पार्टी की ‘किसान सभा’ के तहत किसान संगठित हुए थे। वर्ष 1930 के दशक में ‘किसान सभा’ के आंदोलन ने किसानों को जल और भू-राजस्व के मुद्दों पर संगठित किया था। ‘किसान सभा’ के आंदोलनों की सर्वोच्च उपलब्धि आजादी के बाद के ‘लैंड सीलिंग ऐक्ट’ के रूप में हुई थी।
साठ के दशक की ‘हरित क्रांति’ के समय नई कृषि टेक्नोलॉजी और कृषि संबंधी गतिविधियों का मुद्रीकरण जब शुरू हुआ, तो कृषि संबंधी रूपांतरण का दूसरा चरण शुरू हुआ। इस चरण का मुख्य विरोधाभास था- ग्रामीण और शहरी सेक्टर के बीच व्यापारिक आधार पर असमानताएं। इसी भेदभाव को खत्म करने के उद्येश्य से किसानों का आंदोलन शुरू हुआ। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) इसी का परिणाम था।
किसानों के संघर्ष के वर्तमान चरण का उद्देश्य है, एमएसपी के लिए एक सुरक्षा तंत्र निर्मित करना। पंजाब के किसान इस बारे में सजग हैं कि ‘एमएसपी’ की अनुपस्थिति में किसानों के हित पर क्या दुष्प्रभाव होगा। पंजाब में गेंहू और धान के लिए एमएसपी पर सरकार की तरफ से शत-प्रतिशत खरीद है, पर मक्का जैसी फसल के लिए यह लागू नहीं होता। इसके लिए केंद्र सरकार हर वर्ष घोषणा करती है, पर राज्य में उस दर पर शायद ही कोई खरीद होती हो।
एमएसपी की घोषणा के बाद भी जिन फसलों को लेकर सरकारी खरीद का कोई आश्वासन नहीं मिलता, उन फसलों को खुले बाजार में कम मूल्य पर बेचने के अलावा किसानों के पास और कोई चारा नहीं होता। यह समझा जाना चाहिए कि एमएसपी पंजाब के किसानों के लिए जीवन और मृत्यु का प्रश्न है। ‘हरित क्रांति’ ने पंजाब को देश की रोटी की टोकरी में जरूर बदल दिया, पर साथ ही कृषि को श्रम प्रधान प्रक्रिया से एक पूंजी प्रधान प्रक्रिया में बदल डाला। औपचारिक ऋण की सुविधा न होने के कारण कृषि को बहुत हद तक उधार के लिए निजी संस्थानों और व्यक्तियों पर निर्भर रहना पड़ता है। पंजाब में गरीब और मध्यम वर्ग के किसानों के लिए ऋण का बोझ अवसाद और तनाव का मुख्य कारण है।
यह बहुत जरूरी है कि सरकार पंजाब में कृषि उत्पादों की व्यावहारिकता के पहलू को ध्यान में रखते हुए ‘एमएसपी’ के समर्थन की जरूरत को समझे। आर्थिक दृष्टि से इस क्षेत्र को अस्थिर बना देना सही नहीं होगा, क्योंकि अब भी यह रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र है।
उबलते हुए क्रोध के राजनीतिक पहलू को देखते हुए भी यह जरूरी है कि भारत सरकार किसानों के आक्रोश को तुरंत शांत करे। ऐसी खबरें भी हैं कि खालिस्तान का आंदोलन पंजाब में वापस लौट रहा है। किसानों का मौजूदा आक्रोश इसे भड़काने के लिए आग में घी का काम कर सकता है। जो ऐतिहासिक वास्तविकताओं को भूल चुके हैं, सिर्फ वे ही 1980 के दशक में कृषक आक्रोश और खालिस्तान आंदोलन के बीच के संबंध को भूलने की गलती करेंगे। (सप्रेस)
- एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय