सवाल है कि क्या जलवायु संधियों में कार्बन उत्सर्जन के कठोर प्रावधान न हों, इसलिए तेल कंपनियां वहां पैठ बना रही हैं। कहीं तेल कंपनियों के हित में वार्ताओं, प्रस्ताव और अंतिम समझौते की भाषा तय करने की कोशिश तो नहीं हो रही है? ग्लासगो में 2021 में हुए संयुक्त राष्ट्र के 26वें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में किसी भी एक देश के प्रतिनिधि मंडल के मुकाबले तेल उद्योग के प्रतिनिधियों की संख्या सबसे अधिक थी। ये प्रतिनिधि तेल एवं गैस उद्योग के हितों की पैरोकारी करते हैं। कॉप-28 में जलवायु प्रेमी अपनी बात खुलकर रख पाएंगे या नहीं, यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद तक पहुंचा। ह्यूमन राइट वॉच ने आशंका जाहिर की है कि इससे जलवायु वार्ता का उद्देश्य धूमिल होगा। नागरिक संगठनों की ओर से बढ़ते दबाव को देखते हुए कुछ दिन पहले संयुक्त राष्ट्र को जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसी) के साथ संयुक्त वक्तव्य जारी करना पड़ा। इसमें खाड़ी देश ने कहा है कि जलवायु सम्मेलन के दौरान पर्यावरण प्रेमी शांतिपूर्वक विरोध जता सकते हैं।
कॉप में विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी कोई नई बात नहीं है। पर्यावरण बचाने के लिए कोर्ट से लेकर सड़क तक आवाज बुलंद करने वाले कार्यकर्ता यहां पहुंचते हैं। मिस्र में आयोजित कॉप-27 के दौरान भी सम्मेलन के बाहर विरोध प्रदर्शन हुआ था। वहीं एडनॉक अब दावे कर रही है कि 2045 तक वह शून्य कार्बन उत्सर्जक कंपनी हो जाएगी। यूएई 2015 में ही यूएनएफसीसी में राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (एनडीसी) साझा कर चुका है, जिसमें राष्ट्रीय जलवायु नीति कार्यक्रम, 2017-2050 का जिक्र है।
ऐसे में, यूएई के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को कहीं तेल कूटनीति के जरिये हवा तो नहीं दी जा रही है। वैसे यह दावा कमजोर है, क्योंकि अमेरिका और यूरोप तेल परियोजनाओं में जारी निवेश को लेकर पहले ही पर्यावरण प्रेमियों के निशाने पर हैं। जस्ट स्टॉप ऑयल संगठन ब्रिटेन में तेल परियोजनाओं में सरकारी निवेश के खिलाफ लगातार लोगों को एकजुट कर रहा है। अमेरिकी कंपनी एक्सान मोबिल भी अक्सर तेल खनन परियोजनाओं को लेकर पर्यावरण प्रेमियों के निशाने पर रही है। पेरिस समझौते के बाद यूएनएफसीसी का सालाना जलवायु सम्मेलन काफी अहम हो गया है। यहां पारित होने वाले प्रस्ताव जी-20 सम्मेलनों की तरह सिर्फ प्रस्ताव तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इस पर दस्तखत करने वाले देश अमल के लिए भी प्रतिबद्ध होते हैं और यूएनएफसीसी उसकी समय-समय पर समीक्षा करता है।
आज दुनिया भर में बनने वाली नीतियों में कार्बन उत्सर्जन कम करने को लेकर जोर दिया जा रहा है, इसके पीछे इन जलवायु सम्मेलनों में होने वाले समझौते हैं। 1996 के क्योटो प्रोटोकॉल और 2015 के पेरिस समझौते की छाप आज हर देश की जलवायु और पर्यावरण नीतियों पर है। दुनिया के 150 से अधिक देश कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपनी तैयारी यूएनएफसीसी से साझा कर चुके हैं। हरित जलवायु कोष और हानि एवं क्षति कोष इन्हीं जलवायु सम्मेलनों की बदौलत अस्तित्व में आए हैं।