बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के इस्लामी विपक्षी गठबंधन ने तीन बार से सत्ता में रही अवामी लीग को हटाने के लिए करो या मरो के रूप में यह विरोध रैली आयोजित की थी। अब इसने अपनी एक सूत्री मांग के समर्थन में तीन दिनों के लिए देश में पूर्ण परिवहन नाकाबंदी का आह्वान किया है। उसकी मांग है कि सत्तारूढ़ अवामी लीग इस्तीफा दे और जनवरी में होने वाले संसदीय चुनाव कराने के लिए एक तटस्थ कार्यवाहक प्रशासन को कार्यभार संभालने की अनुमति दे। यह नाकाबंदी 31 अक्तूबर से दो नवंबर तक के लिए निर्धारित है। वरिष्ठ बीएनपी नेता मिर्जा अब्बास कहते हैं, 'यदि अवामी लीग सत्ता में बनी रहती है, तो देश में केवल एक दल का शासन होगा। इसलिए यह आंदोलन सिर्फ अवामी लीग को सत्ता से बेदखल करने के लिए नहीं है, बल्कि बांग्लादेश के नवोदित लोकतंत्र को बचाने के लिए है।'
अवामी लीग की केंद्रीय समिति की सदस्य तराना हलीम प्रतिवाद करते हुए कहती हैं : 'बीएनपी-जमात लोकतंत्र के विरोधी हैं। 2001 में जब वे सत्ता में आए, तो मेरे अलावा हमारे कई नेताओं पर उन्होंने हमले किए। उन्होंने 2004 में शेख हसीना सहित हमारे पूरे केंद्रीय नेतृत्व को खत्म करने तक की कोशिश की। वे विरोधियों को खत्म करने की पाकिस्तानी शैली के सैन्यवाद में विश्वास करते हैं।'
अवामी लीग के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है, जैसा कि विपक्षी इस्लामी गठबंधन के लिए भी है। बांग्लादेश पर कई किताबें लिखने वाले सुखरंजन दासगुप्त कहते हैं, 'यदि अवामी लीग जनवरी में होने वाले संसदीय चुनाव में हार जाती है, तो 2001-06 की तरह बीएनपी-जमात शासन के दौरान खून-खराबा होगा। हजारों पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपना कार्यक्षेत्र छोड़कर देश से भागना होगा। यदि विपक्ष सत्ता हासिल करने में सफल नहीं होता, तो यह निश्चित रूप से एक पार्टी के रूप में बीएनपी का अंत होगा।'
दासगुप्त कहते हैं, 'पारंपरिक रूप से लंबे समय तक विपक्षी आंदोलनकारी भूमिका के कारण अवामी लीग सड़कों पर उतरने वाली एक शक्तिशाली पार्टी है। पर करीब 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के कारण अब यह सांगठनिक रूप से कमजोर हो गई है, भ्रष्टाचार आम बात हो गई है और जमीनी स्तर पर पार्टी का जुड़ाव कम हो गया है।'
तराना हलीम का आरोप है कि विपक्ष की योजना हिंसा के जरिये पुलिस और सुरक्षा बलों को हतोत्साहित करने और फिर सार्वजनिक परिवहन एवं यात्रियों पर हमला करके आम लोगों को आतंकित करने की है। वह कहती हैं कि उनकी सरकार को दोतरफा हमले का सामना करना पड़ रहा है-एक, अमेरिका द्वारा संचालित पश्चिमी शासन परिवर्तन ऑपरेशन और दूसरा, लोकतांत्रिक आंदोलन के मुखौटे के पीछे योजनाबद्ध हिंसा के जरिये सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तान के समर्थन से चलने वाला हिंसक विपक्षी आंदोलन।
अमेरिका ने दिसंबर, 2021 में पूर्व पुलिस प्रमुख बेनजीर अहमद सहित सात वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के खिलाफ प्रतिबंध जारी किए और बांग्लादेश को अपने लोकतंत्र शिखर सम्मेलन से भी बाहर रखा। बेनु घोष का कहना है कि बीएनपी-जमात गठबंधन ने सत्ता हासिल करने की लड़ाई को लोकतंत्र बचाने की लड़ाई की तरह दिखाने के लिए अमेरिका में राजनीतिक रूप से अच्छे संपर्क वाले लॉबिस्टों को काम पर लगाया है। लेकिन बीएनपी के अब्बास ने, जिन्हें 'हिंसा भड़काने' के आरोप में पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ हिरासत में लिया गया, जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री हसीना ने आंदोलन के बाद भय का माहौल बनाने के लिए कार्रवाई का आदेश दिया है, जिसका उद्देश्य 'चुनाव में धांधली के लिए अभी से मंच तैयार करना' है।
अब्बास ने मीडियाकर्मियों को बताया कि हसीना निष्पक्ष चुनाव नहीं जीत सकतीं। अगर तटस्थ कार्यवाहक सरकार के अधीन चुनाव कराया जाए, तो अवामी लीग 10 फीसदी सीटें भी नहीं जीत सकतीं, क्योंकि भारी भ्रष्टाचार के कारण सत्ता विरोधी लहर मजबूत है और जरूरी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से लोग बुरी तरह प्रभावित हैं। यही वजह है कि वह सत्ता में वापसी के लिए सुरक्षा बलों का इस्तेमाल करना चाहती हैं। लेकिन कट्टरवादियों का विरोध करने वाले धर्मनिरपेक्ष राजनेता 'नरम इस्लाम को बढ़ावा देने' के लिए अवामी लीग को दोषी मानते हैं। अवामी लीग को सहयोग करने वाली एक पार्टी के वरिष्ठ वामपंथी राजनेता ने बताया कि 'यह न केवल पार्टी की धर्मनिरपेक्ष परंपराओं से विचलन है, बल्कि इससे इस्लामी कट्टरपंथियों को राजनीतिक वैधता हासिल करने में मदद मिली है।'
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कट्टर इस्लामवादियों और अमीर व्यावसायिक साथियों ने हसीना को घेर लिया है और एक मंडली तैयार की है। इससे एक ओर राजनीति का इस्लामीकरण हुआ, दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार बढ़ा। इससे भारत खुश नहीं है। नई दिल्ली ने इस्लामवादी-व्यापारी लॉबी को खत्म करने और अवामी लीग नेतृत्व को अपनी पारंपरिक बंगाली मध्यवर्ग की जड़ों में लौटने के लिए दबाव बनाया है, पर इसमें बहुत सफलता नहीं मिली है। अब जब अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी लोकतंत्र और मानवाधिकार के मुद्दों पर हसीना पर निशाना साध रहे हैं और चीन बांग्लादेश की घरेलू राजनीति से सख्ती से दूर रह रहा है, तब 'आयरन लेडी' शेख हसीना को या तो नई दिल्ली की 'सलाह' माननी होगी या फिर इसकी उदासीनता का जोखिम उठाना होगा।
भारत और अमेरिका रणनीतिक सहयोगी हैं और आक्रामक चीन को रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन बांग्लादेश के मुद्दे पर दोनों में पारंपरिक रूप से तीव्र मतभेद रहे हैं। सुखरंजन दासगुप्त कहते हैं, 'बांग्लादेश का अधिकांश राजनीतिक भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि दक्षिण एशिया में भारत-अमेरिका समीकरण किस तरह आकार लेता है।'