अपने ही देश में 2012-13 में प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत करीब 914 किलो वाट थी, जो 2019-20 में करीब 12 सौ किलोवाट हो गई। मतलब सीधे करीब 32 प्रतिशत ऊर्जा की खपत बढ़ गई। अब बढ़ती आबादी और इसके लिए ऊर्जा की अवश्यकता अभी अनुत्तरित है। भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी बसती है, लेकिन हम आज दुनिया की पूरी ऊर्जा खपत का सिर्फ छह प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग करते हैं। अगर यही हालात रहे, तो 2040 तक हमारी ऊर्जा की खपत दोगनी हो जाएगी और इसके लिए जो भी स्रोत टटोले जाएंगे, उनकी क्षमता को समझने के लिए उनकी वर्तमान स्थिति पर गौर करने की जरूरत है। उनके दोहन से उत्पन्न अन्य संकट भी अनदेखे नहीं किए जा सकते। आज ऊर्जा के लिए मुख्य रूप से कोयला बायोमास, ऑयल आदि संसाधनों का उपयोग होता हैं, जिनकी स्थितियां बहुत स्थिर नहीं कही जा सकतीं। असल में एक तरफ अस्थिर स्रोत व दूसरी तरफ बढ़ती खपत ने चरमराहट पैदा कर दी है।
दुनिया भर में 54 प्रतिशत शहरी क्षेत्र 70 प्रतिशत ऊर्जा की खपत का कारण बनते हैं और अकेले 20 प्रतिशत कार्बन फुट प्रिंट शहरों के कारण हैं। 1950 में 7.5 करोड़ लोग शहरों में थे और 2018 के आते-आते 4.6 अरब लोग शहरों में आ चुके हैं। अपने देश में 2040 तक 27 करोड़ लोग और शहरों में पहुंच जाएंगे, क्योंकि शहरों को ही विकास का केंद्र माना गया है। शहर सुविधाओं के अलावा रोजगार का गढ़ भी बन गए हैं। बढ़ती शहरी आबादी के लिए आवास, पानी, भोजन की आवश्यकताएं सीधे ऊर्जा पर निर्भर होंगी। विडंबना यह है कि शहरी आबादी बढ़ती चली जाएगी और शहर भविष्य में भी ऊर्जा खपत का सबसे बड़ा केंद्र बन जाएंगे।
अगर सेंट्रल एनर्जी अथॉरिटी का आंकड़ा देखें, तो 2019 में 1.37 करोड़ ऊर्जा यूनिट की आवश्यकता थी और 2030 तक 2.51 करोड़ ऊर्जा यूनिट की आवश्यकता पड़ेगी। हमारी ऊर्जा निर्भरता कोयले पर ज्यादा रही है और आने वाले समय में हमें किसी भी हालत में अपनी इस निर्भरता को घटाकर 63 प्रतिशत से 56 प्रतिशत पर लाना होगा, क्योंकि यह हमारा संकल्प अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। पर क्या ऐसा संभव होगा, यह एक बड़ा सवाल इसलिए भी है कि हम जिस देश में रहते हैं, वहां ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत कोयला ही है। यही संसाधन देश में सबसे ज्यादा है और बड़ा देश होने के नाते व हर घर-गांव तक ऊर्जा पर आधारित सुविधाएं पहुंचाने के लिए हम कोयले के उपयोग पर ज्यादा अंकुश नहीं लगा पाएंगे।
आज हमारी 60 प्रतिशत से ऊपर निर्भरता कोयले पर है, जो हमारी करीब 72 प्रतिशत ऊर्जा अवश्यकता की आपूर्ति करता है। 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, आज हमें करीब 53 करोड़ टन कोयले का उपयोग करना पड़ रहा है। और उसमें भी 40 प्रतिशत कोयला निम्न गुणवत्ता का होने के कारण प्रदूषण जैसी गंभीर स्थिति पैदा करता है। ऐसे में वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर हमें गंभीर हो जाना चाहिए। आज दुनिया और अपना देश ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों को लेकर बड़ी पहल में जुटा है। इसके लिए जहां देश ने बेहतर बजट का प्रावधान रखा है, वहीं विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मदद से ऊर्जा के नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं। हाइड्रो पावर, बायो पावर के साथ ही एटॉमिक एनर्जी को एक बड़े स्रोत के रूप में देख रहे हैं। वैसे हम लगातार न्यूक्लियर एनर्जी को लेकर वाद-विवाद में पड़ रहे हैं, पर शायद हम यह नहीं जानते कि इस पृथ्वी का जन्म ही एक न्यूक्लियस सिंथेसिस के कारण हुआ है। सूर्य जो हमें इतनी ऊर्जा प्रदान करता है, वह न्यूक्लियर सिंथेसिस के माध्यम से ही देता है।
अब सवाल यह है कि हम ऐसे विकल्प में अगर प्रकृति और पर्यावरण के सवाल खड़े करें, तो हम पहले ही सब कुछ बर्बाद कर चुके हैं। फिर आने वाले समय में जिस तरह से ऊर्जा की लगातार आवश्यकता पड़ने जा रही है, हमें सभी तरह के ऊर्जा के स्रोतों के आगे वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों के चलते घुटने नहीं टेकने पड़ेंगे। वर्ष 2022 में हमने 167.57 गीगावाट ऊर्जा वैकल्पिक श्रोतों से प्राप्त की, जिसमें अकेले 63.3 गीगावाट सोलर से मिली और हाइड्रो से 66.85 गीगावाट। इसी तरह वायु ऊर्जा ने 41.93 गीगावाट ऊर्जा पैदा की। आने वाले समय में अगर हम इसी तरह बढ़ते चले, तो बायोमास भी ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत होगा, जो आज करीब 10.73 गीगावाट वैकल्पिक ऊर्जा का स्रोत है।
इन सबमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह से हमारी आबादी 142.67 करोड़ हो गई है और अब भी गांव कई तरह के विकास से वंचित हैं, ऐसे में शायद दो बड़े कदम हमें उठाने ही पड़ेंगे। पहला, वैकल्पिक ऊर्जा को प्रोत्साहन और दूसरा, अपनी अति ऊर्जा की आवश्यकताओं पर अंकुश, क्योंकि अगर एक तरफ शहर जगमगाते रहें और गांव अंधेरे में डूबे रहेंगे, तो कई अन्य तरह की असमानताएं हमें घेर लेंगी। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि हम ऊर्जा उपयोगों को लेकर गंभीर नीति भी बनाएं और प्रति व्यक्ति उसकी खपत की सीमा तय कर दें।
चाहे वह गांव हो या शहर, उसका आधार मात्र यह नहीं होना चाहिए कि किसकी आर्थिक क्षमता कितनी है, बल्कि ये क्षमताएं देश की ऊर्जा के उत्पाद और जनसंख्या की आवश्यकता के आधार पर तय होनी चाहिए। वैसे हमने ऊर्जा का दुरुपयोग आवश्यकताओं से ज्यादा विलासिताओं में खर्च किया है। हमारे चारों तरफ ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन के नाम से जो घट रहा है, उसका श्रेय बढ़ती विलासिताओं को जाता है। आने वाले कुछ दशकों में अगर हम सुधरे नहीं, तो हमारी बुनियादी आवश्यकताएं भी संकट में पड़ जाएंगी। जब तक हम ऊर्जा के उपयोग की सीमाएं तय नहीं करेंगे, तब तक हम ऊर्जा सुरक्षित नहीं रह सकते।