गोस्वामी तुलसीदास के संबंध में कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। यह तो सभी जानते हैं कि दूसरों के प्रति उनके मन में अपार करुणा थी। एक किंवदंती के अनुसार, उनकी करुणा से प्रभावित होकर विष्णुलोक से एक देवदूत आया। उसने कहा, भगवान राम ने मुझे आपके पास भेजा है।
वह आपसे बहुत प्रसन्न हैं और आपको दिव्य शक्ति देना चाहते हैं। उस शक्ति को पाने के बाद आप लोगों को रोगमुक्त कर सकेंगे। क्या आप वह शक्ति पाना चाहेंगे?
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तुलसीदास जी ने तत्काल इन्कार कर दिया और कहा, मैं तो यही चाहूंगा कि मेरे राम खुद निर्णय करें कि किसे रोगमुक्त किया जाए। देवदूत ने फिर कहा, तो आप पापियों को सद्मार्ग पर वापस ले आने की शक्ति स्वीकार कर लें। गोस्वामी जी ने जवाब दिया, मैं नहीं चाहता कि लोग उद्धारक जानकर मेरा सम्मान करें।
देवदूत अब थोड़ा परेशान-सा दिखा। उसने कहा, आपको कोई शक्ति दिए बिना मैं लौट नहीं सकता। यदि आप नहीं लेंगे, तो विवश होकर मुझे खुद तय करना पड़ेगा कि आप किस चमत्कारी शक्ति से संपन्न हों।
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तुलसीदास जी ने कहा, ठीक है, यदि ऐसा है, तो मैं चाहता हूं कि प्रभु राम मुझसे जो भी शुभ कर्म करवाना चाहते हैं, वे अपने आप होते जाएं। किसी को पता न चले कि मेरी वजह से वे कर्म हुए हैं। यहां तक कि मुझे भी नहीं। इससे मुझमें अहंकार नहीं पैदा होगा।
देवदूत 'तथास्तु' कहकर गायब हो गया। उसने तुलसीदास जी की परछाईं को रोगमुक्त करने की शक्ति से संपन्न कर दिया, परंतु केवल उसी समय के लिए, जब उनके चेहरे पर सूर्य की किरणें पड़ रहीं हों। इस प्रकार, वे जहां कहीं भी गए, वहां लोग रोगमुक्त हो गए और दुखियों के जीवन में वसंत आ गया।