आजकल चिंता व्यक्त करना मॉडर्न ट्रेंड हो गया है। जिसे देखिए, वह बस चिंता व्यक्त करता नजर आता है। टीवी हो या गली-मुहल्ले में चल रही बातचीत हर कोई चिंतित है। मामला महंगाई का हो, देश के हाल का या फिर नौकरी, शिक्षा आदि कोई भी विषय हो, हर तरफ बस चिंता ही चिंता व्याप्त है।
सोशल मीडिया में एक वर्ग कविता के माध्यम से खेती-किसानी और बेमौसम बारिश पर घोर चिंता व्यक्त कर रहा है। उसी तरह टीवी पर ढेर सारी इमोशनल रिपोर्टें कभी सीमा की, कभी समाज की, कभी खेत-खलिहान की चिंताजनक स्थिति दिखाकर हमको-आपको ड्राइंग रूम में चिंतित बनाए रखती हैं।
चिंता का आलम बहुत विस्तृत है। जैसे क्रिकेट एक्सपर्ट्स क्रिकेटर के खराब फॉर्म की चिंता कर डालते हैं। ऐसे में टीवी पर टाइम स्लॉट बदलने पर पता ही नहीं चल पाता कि कौन-सी चिंता ज्यादा गंभीर है। मुझे लगता है एक चिंता शब्द हर तरह की चिंता को परिभाषित करने में सक्षम नहीं है। हमें चिंता में भी कैटेगरी डालनी चाहिए। जैसे फसल खराब होने की चिंता विश्व कप में भारत के प्रदर्शन पर होने वाली चिंता से अलग है। इसी तरह कांग्रेस की कमजोरी या आप में पड़ी फूट से पैदा चिंता परीक्षा में हो रही धुआंधार नकल पर ईमानदार छात्रों की बढ़ती चिंता से अलग है।
किसी जमाने में चिंता बड़ी प्रभावशाली हुआ करती थी। लेकिन अब तो चिंता पर चिंतन करते हुए भी यह सोचा जाता है कि यह चिंता किस स्तर की है। सामूहिक चिंता व्यक्त करते-करते सदियां बीत गईं, इसके बावजूद जिनकी चिंता की गई, उनकी हालत तो बद से बदतर होती गई है। जैसे-किसानों की चिंता के बावजूद उनकी हालत नहीं सुधरती। विश्व कप में विराट कोहली के खराब फॉर्म पर क्रिकेट प्रेमियों ने जितनी चिंता की, अपनी बल्लेबाजी सुधारने के लिए खुद कोहली अगर उसका दस फीसदी ही चिंता व्यक्त करते, तो उनका प्रदर्शन सुधर जाता। यानी चिंता पर सिर्फ चिंतन करना काफी नहीं है। इसके बावजूद हम चिंतन करने के सिवाय और कर भी क्या सकते हैं!