प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में मई, 2014 में एनडीए अपने घोषणा पत्र के जिन वादों के साथ सत्ता में आया था, उसमें हिमालय के विषय पर एक अलग यूनिवर्सिटी की स्थापना करने की घोषणा भी शामिल थी। यद्यपि देश के प्रायः सारे विश्वविद्यालयों में हिमालय के नाम पर कोई न कोई शोध कार्य होते रहते हैं।
गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान तो केवल हिमालय के विषय पर ही केंद्रित होकर काम करता रहा है। यह संस्थान एक ऐसा स्रोत है, जहां पर भारत ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के हिमालय की जलवायु, पर्यावरण और यहां के निवासियों के बारे में पूरी जानकारी मिलती है।
पिछली यूपीए सरकार के हिमालय ईको मिशन कार्यक्रम के तहत जी बी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान ने हिमालय के विषय पर आंकड़ों सहित जो दस्तावेज सामने लाए थे, वह हिमालय विकास के नए मॉडल की तरफ ध्यान आकर्षित करता है।
यदि हिमालय के विकास के बारे में केंद्र की सरकार भविष्य में कुछ नया करना चाहती है, तो हिमालय बचाओ आंदोलन का घोषणा पत्र और महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन द्वारा लिखी गई 'पर्वतीय विकास की सही दिशा और हिमालय लोक नीति' के दस्तावेज का भी अवलोकन करना चाहिए।
नीति आयोग को एक टास्क फोर्स का गठन करना चाहिए, जो इन दस्तावेजों के आधार पर हिमालय विकास की सही दिशा निर्धारित कर सके। हिमालय यूनिवर्सिटी द्वारा भी केंद्र सरकार यही करना चाहती थी कि हिमालय विकास की तरफ नई सोच के लिए कदम आगे बढ़ाया जा सके।
संसद में 11 जुलाई, 2014 को वर्तमान कैबिनेट मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने हिमालय के विकास के नए मॉडल पर पर्याप्त सबूतों के साथ अलग मंत्रालय बनाने की जोरदार पहल की थी। संसद में हुई इस बहस के नतीजे किताब के पन्नों की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित रहे। इस विषय पर पक्ष-विपक्ष को संसद में पुनः विचार करना चाहिए।
सितंबर, 2010 से उत्तराखंड में हिमालय दिवस इसलिए मनाने का निर्णय हुआ था कि केंद्र और हिमालयी राज्यों की सरकारें अलग से हिमालय की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति को ध्यान में रखकर कोई ऐसा विकास का मॉडल तैयार करेंगी, जिससे हिमालय का विनाश रुक सके।
लोगों की आजीविका के साधनों का संरक्षण हो, जिसके विषय पर पिछले दस वर्षों में केंद्र सरकार को सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों और आम जनता ने कई सुझाव पत्र भेजे हैं। जिसमें कई लोगों के हस्ताक्षर हैं, इस पर भी सरकार का ध्यान जाना चाहिए था।
अब स्थिति यह है कि हिमालय दिवस हो या साल के अन्य दिनों में हिमालय के नाम पर होने वाली बैठकें चिंता तक सिमट रही हैं। इन बैठकों में मुख्यमंत्री, मंत्री, सचिव स्तर के प्रतिनिधि भी भाग लेते हैं। फिर भी आधुनिक विकास में निर्माण कार्यों के जो मानक मैदानों के लिए बनाए गए हैं, उसमें थोड़ा भी बदलाव नहीं किया जा रहा है।
नतीजतन ग्लेशियरों के निकट बेहिचक भारी निर्माण कार्य हो रहे है। लाखों दुर्लभ वन प्रजातियां, जैव विविधता, आदि नष्ट हो रही हैं। नदियों के दोनों किनारों पर निर्माण कार्यों का मलबा पड़ा है। बाढ़ और भूस्खलन कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं।
निर्माण कार्यों के ढांचे इतने कमजोर बने हैं कि उनकी बुनियाद हिल रही है। मीडिया और पर्यावरण कार्यकर्ता इन गंभीर समस्याओं की ओर लगातार ध्यानाकर्षित कर रहे हैं। अब यह बात हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्री भी कहने लगे हैं। यानी सरकारें समस्या का समाधान ढूंढ भी नहीं पा रही हैं।
पिछले दिनों उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के दौरान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर से कहा कि हिमालयी राज्यों के विकास का पृथक मॉडल बनाना चाहिए। पिछले 2-3 वर्षों से मसूरी में हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधि चिंतन-मनन कर रहे हैं।
वे भी हिमालय के लिए अलग विकास नीति की मांग कर रहे हैं। जब मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री हिमालय के लिए अलग मंत्रालय, हिमालय नीति आदि की बात करने लगे हैं, तो इसे बनाएगा कौन? (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)