धर्म क्या है? इसे स्पष्ट करते हुए धर्मग्रंथों में बताया गया है कि प्रभु की आराधना के साथ जो व्यक्ति दूसरों की सेवा-सहायता करता है और ईमानदारी से अपना काम करता है, वही धार्मिक कार्य में संलिप्त है। इससे जुड़ी एक कहानी भक्त जाजलि की है। वह धर्मशास्त्रों के ज्ञाता थे। अधिकांश समय भगवान की आराधना में लगाते थे। उसके बावजूद सच्चा धर्म क्या है, उनके हृदय में यह जिज्ञासा बनी रहती थी।
उन्होंने जब अपने गुरु के समक्ष यह जिज्ञासा व्यक्त की, तो गुरुजी ने कहा, जनकपुर में तुलाधार वैश्य नाम का परम भक्त व्यापारी रहता है। वही इसका समाधान कर सकता है।
जाजलि जनकपुर जा पहुंचे। तुलाधार की दुकान पर पहुंचे, तो देखा कि वह ग्राहकों को माल तोलकर दे रहा है। जाजलि ने विनम्रता से पूछा, सेठ जी, आपका गुरु कौन है? धर्म किसे कहते हैं? तुलाधार ने उत्तर दिया, व्यापार ही मेरा गुरु है।
ग्राहकों को ठीक तोलकर माल देना ही मेरा धर्म है। मैं ईमानदारी से किए गए व्यापार कार्य से निवृत्त होने के बाद घर पहुंचकर अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करता हूं, यह मेरी कर्तव्य भावना है। सवेरे शैया त्यागते ही परमात्मा का स्मरण करता हूं। दुकान खोलने से पहले अपनी कमाई का एक अंश गरीबों में वितरित करता हूं। इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता। तुलाधार वैश्य के इन शब्दों ने जाजलि की जिज्ञासा का समाधान कर दिया।