कोविड-19 से मुकाबला करने के लिए भारत ने अब तक कई कदम उठाए हैं। 22 मार्च को देश के 1.3 अरब लोगों द्वारा जनता कर्फ्यू के दौरान 14 घंटे तक सोशल डिस्टेंसिंग के दो दिन बाद 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की। उनकी घोषणा ने कोविड-19 महामारी के खिलाफ भारत की लड़ाई को एक नया मोड़ दे दिया। फिर पांच अप्रैल की रात भारतीयों ने नौ मिनट तक घर की रोशनी बुझाकर बाहर दीया जलाया।
ऐसी ही एक महत्वपूर्ण पहल 15 मार्च को की गई थी, जब नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के नेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की थी। लॉकडाउन के बाद भारत में कई तरह के उपायों की घोषणा की गई। राज्य सरकारों ने सिनेमाघर व शैक्षणिक संस्थान बंद कर व सार्वजनिक समारोहों की मनाही कर सोशल डिस्टेंसिंग को लागू किया। लंबी दूरी की ट्रेनों, उपनगरीय ट्रेनों, मेट्रो और रिक्शा सहित सार्वजनिक परिवहन पर रोक लगा दी गई तथा दुकानें, कारखाने, पूजा स्थल और कार्यालय बंद कर दिए गए गए। भारत आने वाले लोगों के लिए एक महीने के लिए वीजा निलंबित और रद्द किया गया और विदेश से आने वालों के लिए 14 दिन का क्वारंटीन लागू किया गया।
कोविड-19 प्रभावित देशों से आने वाले लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई, अंतरराज्यीय यात्रा रोक दी गई और पड़ोसी राज्यों की सीमाएं भी बंद कर दी गईं। लेकिन इन सभी उपायों में से सार्क की बैठक बुलाने का मोदी का निर्णय सबसे अप्रत्याशित और महत्वपर्ण था। इस मोड़ पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्क देशों की उपलब्धियों या विफलताओं पर नजर डालना प्रासंगिक है। अपनी स्थापना के बाद से ही सार्क सबसे कम सफल क्षेत्रीय संगठन साबित हुआ, जबकि आबादी के लिहाज से यह सबसे बड़ा संगठन है।
उल्लेखनीय है कि 2003 में सार्स महामारी के तेजी से प्रसार के मद्देनजर माले (मालदीव) में सार्क देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों की आपात बैठक बुलाई गई थी। उस बैठक के परिणामस्वरूप, दक्षिण एशिया में सार्स के प्रसार को रोकने और नियंत्रित करने के साथ कई व्यापक निवारक उपायों को अपनाने के लिए कदम उठाने का निर्णय लिया गया। इनमें प्रवेश द्वारों पर स्क्रीनिंग, संभावित सार्स रोगियों को क्वारंटीन करने की व्यवस्था और उनके संपर्क में आने वाले लोगों की पहचान सुनिश्चित करना था।
विगत 15 मार्च को सार्क देशों की वर्चुअल बैठक चार वर्षों में सार्क की पहली बड़ी बैठक थी, जिसमें दक्षिण एशिया के अधिकतर निर्वाचित नेताओं ने हिस्सा लिया। इसमें सार्क के महासचिव के साथ सार्क आपदा प्रबंधन केंद्र के निदेशक भी उपस्थित थे। भारत ने संयोजक के तौर पर इस बैठक का एजेंडा तय किया। मोदी ने कहा, 'हम एक साथ आकर कोरोनो वायरस से बेहतर ढंग से निपट सकते हैं, अलग-अलग रहकर नहीं।'
उन्होंने इस संदर्भ में भारत द्वारा उठाए गए सभी कदमों की जानकारी भी सबको दी। जैसे कि भारत ने जनवरी से ही विदेश से आने वालेलोगों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी। मोदी ने कोविड-19 आपातकालीन कोष का सुझाव दिया और भारत की ओर से उसमें एक करोड़ डॉलर का योगदान दिया। इसने कोविड-19 प्रभावित देशों से पड़ोसी देशों के नागरिकों को निकालने में भी मदद की। यह बताता है कि संकट की घड़ी में भी भारत ने 'पड़ोसी पहले' की नीति का पालन किया। भारत ने अपने नागरिकों के साथ बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और नेपाल के लोगों को भी निकालने में मदद की। भारत-पाकिस्तान तनाव के बावजूद भारत ने चीन के वुहान में फंसे पाकिस्तानी छात्रों को निकालने का प्रस्ताव दिया, जिसे पाकिस्तान ने ठुकरा दिया।
वर्चुअल बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह प्रस्ताव बेहद महत्वपूर्ण था कि एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम(आईडीएसपी) यानी सभी प्रकार की बीमारी के प्रसार का पता लगाने और मॉनिटर करने वाला सॉफ्टवेयर सार्क के सदस्य देशों को उपलब्ध कराया जाएगा। उन्होंने दक्षिण एशिया में भावी महामारियों पर समन्वित अनुसंधान के लिए एक साझा अनुसंधान मंच शुरू करने का भी प्रस्ताव रखा और आईसीएमआर द्वारा सार्क देशों को सहायता की पेशकश की।
मोदी ने बैठक में शामिल देशों को सूचित किया कि परीक्षण किट और उपकरण के साथ डॉक्टरों और विशेषज्ञों की एक त्वरित प्रतिक्रिया टीम सार्क सदस्यों के लिए उपलब्ध है। भारत ने मालदीव के स्वास्थ्य सेवा अधिकारियों की सहायता के लिए पहले ही चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति करने के अलावा एक मेडिकल टीम भेजी है। विपत्ति का सामना करते हुए भी सहायता करने का भारत का उदार प्रस्ताव महामारी के मौजूदा प्रसार से बहुत आगे है। भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.66 प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च करता है और इसके पास एक कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा है।
फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में स्वास्थ्य पर खर्च की तुलना में तो भारत का स्वास्थ्य सेवा पर खर्च कम है ही, उसका यह खर्च अन्य सार्क देशों के बराबर या उससे भी कम है। इसलिए भारत और उसके साथी दक्षिण एशियाई देश सीमित संसाधनों के साथ महामारी से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं।लेकिन बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे की इन सीमाओं के बावजूद भारत ने दिखाया है कि सफलता फिर भी संभव है।
सख्त निगरानी उपायों के जरिये वह एचआईवी/एड्स और एच1 एन1 स्वाइन फ्लू के प्रसार को नियंत्रित करने में सक्षम रहा है और कोविड-19 की भीषणता को देखते हुए फिलहाल वह परीक्षण क्षमता बढ़ाने के साथ अपनी परीक्षण सुविधाओं का विस्तार भी कर रहा है।
कोरोना के खिलाफ भारत और सार्क के प्रयास पर्याप्त हैं या नहीं, यह वक्त बताएगा, पर इस संकट के समय मोदी की पहल और सार्क देशों के लिए चिंता का सार्वजनिक प्रदर्शन सकारात्मक राजनीतिक घटना है। यह मोदी और भारत का छोटा-सा कदम भले था, पर दक्षिण एशिया के लिए लंबी छलांग थी।
-लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ फ्रीबर्ग (जर्मनी) में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता हैं।